लखनऊ में पूनम का उजास या नाथ बनेंगे राज

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rajnath singh poonam sinhaa

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ अपनी खास तहजीब हुजुर पहले आप.. के लिए भी पहचानी जाती है। फिर भी बात चुनाव जीतने की हो तो कौन पीछे हटता है। इसके लिए तो सारे जतन किए जाते हैं। वैसे एक दशक पहले तक लोकसभा में यहां का प्रतिनिधित्व देश के प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी किया करते थे। उन्होंने राजनीति छोड़ी तो लखनऊ भी छोड़ दिया। यहां से तीन बार शीला कौल सांसद चुनी गई तो हेमवतीनंदन बहुगुणा को भी लखनऊ ने ही दिल्ली की राह बताई। 1991 से 2004 तक नौवीं से चौदहवीं लोकसभा तक लगातार छह बार अटलजी यहां से जीते। उनके बाद पार्टी ने लालजी टंडन को मैदान में उतारा। मोदी लहर में वे ही यहां से चुनाव जीते।

अब पार्टी ने देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता को यहां से दांव पर लगाया है। वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ ही उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। उनके मुकाबले में समाजवादी पार्टी ने बतौर गठबंधन प्रत्याशी पूनम सिंहा को मौका दिया है। उन्होंने हाल ही में ग्लैमर जगत से सियासत में कदम रखा है। उनके पति शत्रुघ्न सिंहा भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए और बिहार की पटना साहिब लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में हैं तो पूनम लखनऊ से। कुछ दिन पहले वे पत्नी के प्रचार के लिए लखनऊ आ गए थे तो कांग्रेस ने शिकायत कर दी थी, क्योंकि यहां कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद कृष्णम अलग से लड़ रहे हैं। यानी पति चाहकर भी पत्नी के लिए प्रचार नहीं कर सकता।

बहरहाल, राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर के सामने चुनाव लड़ने की वजह केवल ग्लैमर नहीं। माना जाता है कि लखनऊ लोकसभा क्षेत्र में करीब दस फीसदी मतदाता कायस्थ हैं औऱ बतौर सिंहा पूनम इसी तबके से आती है। इसके अलावा वे हैदराबाद के सिंधी परिवार में जन्मी हैं और इस तबके के चार फीसदी लोग लखनवी हैं। इसके अलावा सपा-बसपा का पिछड़ों व मुस्लिमों का अपना वोट बैंक और पूनम की ग्लैमर अपील, ये सारे कारण उनके लखनऊ से चुनाव मैदान में उतरने का कारण बने।

हालांकि वे बतौर प्रत्याशी अनुभवहीन हैं, लेकिन उनके आने से मुकाबला त्रिकोणीय तो हो ही गया। ऐसे में कौनसा तीसरा कोण जीत का श्रेय धारण करेगा कहना जरा मुश्किल ही है। भाजपा के पक्ष में परंपरागत सीट होने के साथ एक और बड़ी बात है, पिछले चुनाव में यहां से हारी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रही रीता बहुगुणा जोशी का दलबदल भी है। वे अब भाजपा ममें हैं और प्रदेश मंत्रिमंडल की सदस्य भी। हेमवतीनंदन बहुगुणा के परिवार से होने के चलते राजनीति पर उनका अपना असर है, जिसका लाभ अब तो भाजपा को ही मिलेगा और परेशानी होगी कांग्रेस को।

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