एक हारी मैदान में और दूसरी बगैर लड़े ही हार गई | Lok Sabha Speaker: Leaders defeated while contesting Election for Lok Sabha

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meera kumar

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने 1933 में ‘यशोधरा’ में लिखा था ‘अबला तेरी यही कहानी आँचल में है दूध और आखों में पानी…’। आज की नारी भले ही अबला न हो, लेकिन उसे पुरुषों के बराबर अधिकार तो हासिल नहीं है। ऐसा पंद्रहवीं और सोलहवीं लोकसभा की स्पीकर की हालत देखकर भी लगता है। ये दोनों सशक्त नारियां बड़े-बड़े पदों पर रहने के बाद भी असहाय जैसी हो गईं।

2009 में देश की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष बनी मीरा कुमार 2014 में लोकसभा का चुनाव ही हार गईं। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें अपनों ने ही हरा दिया। वे बिहार की परंपरागत सीट सासाराम से मैदान में थी और उन्हें भाजपा के छेदी पासवान ने हराया। हालांकि सासाराम सीट उनके परिवार की परंपरागत सीट थी। उनके पिता बाबू जगजीवनराम आठ बार यहां से सांसद चुने गए।

1985 में जब मीरा कुमार ने संसदीय पारी की शुरुआत बिजनौर सीट से की तब दलित राजनीति के दिग्गज रामविलास पासवान और मायावती भी प्रचार को पहुंचे थे। बहरहाल, एक बार फिर मीरा कुमार संसद में जाने को आतुर हैं। उनका चुनावी मुकाबला उन्हीं छेदी पासवान के साथ है, जिनसे वे पिछला चुनाव हारी थी। अब उनका औऱ उनके पिता का प्रभाव क्षेत्र काम करता है या मोदी लहर और भाजपा के मुद्दे इसका फैसला अगले सप्ताह तक हो ही जाएगा। इसी कड़ी में बात करें मीरा कुमार के ठीक बाद यानी सोलहवीं लोकसभा की अध्यक्ष बनी सुमित्रा महाजन की। उन्हें तो उनकी पार्टी ने इस बार चुनाव ही नहीं लड़ने दिया।

बड़े ही अपमानजनक ढंग से न तो उनका टिकट काटा गया और न ही किसी से कुछ कहा गया। हालांकि वे 1989 से 2014 तक लगातार आठ चुनाव इंदौर सीट से ही जीत चुकी थीं। इस बार भी चुनाव अभियान प्रारंभ कर चुकीं श्रीमती महाजन को अनेक सूचियां जारी होने के बाद भी जब उम्मीदवारी घोषित नहीं की गई तो एक दिन खुद ही पार्टी को पत्र लिखकर चुनाव लडने से इंकार कर दिया।

हालांकि टिकट काटने के बाद चुनाव प्रचार को उनके संसदीय क्षेत्र इंदौर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में उनकी खूब तारीफ की, लेकिन हकीकत तो जनता के सामने ही थी। यह माना गया कि इंदौर क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता को भुनाने और उनके समर्थकों के वोट जुटाने के लिए तारीफ करने की राजनीतिक कवायद करना ही पड़ी। जो भी हो एक के बाद एक दो लोकसभा अध्यक्ष पद से हटने के बाद एकाएक सामान्य नागरिक की श्रेणी में शुमार कर दी गईं। क्या इस तरह का व्यवहार किसी पुरुष लोकसभाध्यक्ष के साथ भी होता? इसका जवाब नकारात्मक ही होगा।

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