जानिये क्या है करवा चौथ का ज्योतिषीय महत्व

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इन दिनों आधुनिकता के अंधे उन्माद में हम सदियों से चली आ जानी रहीं देश की सांस्कृतिक मान्यताओं की खिल्ली उड़ाने और अपने आपको मॉड-स्मार्ट सिद्ध करने की व्यर्थ कोशिश में मुब्तला हैं।नए ऐसा करें तो ,तुक भी समझ में आती है, पर जब समाज को दिशा देने और बौद्धिक रूप से उसे आगे बढ़ाने का दावा करने वाले प्रबुद्ध बुद्धिजीवी भी बिना किसी वैज्ञानिक शोध के आज की कथित अधकचरी वैज्ञानिक मान्यताओं के बूते देश की सनातन परम्पराओं को गरियाने का काम करें तो स्थिति चिन्ताजनक हो जाती है। गए साल डाला-छठ पर्व पर एक मॉड हिंदी कथा-लेखिका ने महिलाओं द्वारा माँग में लगाये जाने वाले सिंदूर को लेकर जिस तरह की वाहियात टिप्पणियाँ की गई -वे आधुनिक मूर्खताओं में शुमार होती हैं।

अब मुद्दे की बात की जाए-जिसे हम इन दिनों अंधविश्वास कह कर तर्क-वितर्क करने लगते हैं उसे लेकर आचार्य रजनीश एक गहरी बात कही है।वे कहते हैं किसी बात को ठीक से जाने बिना यदि हम उस पर ऐतबार करने लगें-वह अन्धविश्वास है।जहाँ तक किसी सामाजिक मान्यता की बात है तो उसके पीछे ज़रूर गहरा जीवन दर्शन रहा होगा,हो सकता है आज हमें वह व्यर्थ लगती हो पर किसी आने वाले दिन वह अपनी उपयोगिता सिद्ध करे। हो यह भी सकता है कि जो मान्यता आज हमें परम आधुनिक जान पड़ती है-उसमें आगे चलकर हमें युग सापेक्ष कोई अधूरापन नज़र आये।एक सटीक उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि चंदन का टीका इस गर्म देश में ललाट को शीतल बनाये रखने के लिए लगाया जाता रहा है, पर आज हमें वह अंधविश्वास प्रतीत होता है।उधर ठंडे ईसाई देशों में ईसा को दी गई सूली की प्रतीक और सर्दी से हिफ़ाज़त के लिए ईज़ाद की गई टाई आज हमें आधुनिकता की मिसाल लगती है-जिसे मझ गर्मी में गले मे फाँदे भारत जैसे गर्म मुल्क का आदमी अपने को मॉड मानने की मूर्खता कर रहा है। हमारे लिए पुराना विश्वास तो अंधविश्वास है और आज का अंधविश्वास आधुनिकता का प्रमाण?

जहाँ तक अधिकांश भारतीय पर्व-त्योहारों की बात है तो उनके पीछे गहरे खगोल विज्ञानीय आशय और तदनुकूल उनके लिए व्रत-अनुष्ठान ऋषि मनीषा ने निर्धारित किये हैं। वैदिक मान्यता अनुसार कर्क चतुर्थी अथवा करवा चौथ की बात करें तो यह पर्व खगोलीय वार्षिक गति पर आधारित है।इस तिथि से सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण में आने लगता है।जिससे पृथ्वी पर खासतौर से भारत में शीत-ऋतु का प्रभाव बढ़ता चला जाता है-जो ऊर्जा के क्षय का काल है।उसका सीधा असर पुरुष तत्व पर अधिक पड़ता है।वैदिक मान्यता यह भी है कि स्त्री और पुरुष में कोई मूलभूत अंतर नहीं है।वे जीवन ऊर्जा गोलक के दो पक्ष हैं।जो ऊर्जा प्रकाश में परिवर्तित हो गई वह पुरुष-तत्व है और जो उसकी ओट में बेस का काम कर रही है वह स्त्री तत्व है।इसे ही वैदिक भाषा में सोम- अग्नि या रस-बल का समवाय कहा है।जो एक दूसरे को सहयोग कर जीवन को आगे बढ़ाते हैं। जो ऊर्जा विश्व कल्याण के निमित्त शिव-संकल्प में रूपाँतरित हो गई वही पुरूष तत्व है और जो उसके इस संकल्प में सहयोगी बन रही है वह पार्वती तत्व है।शास्त्र इसे ही ब्रह्माण्ड का मूल आधार या शिव-शक्ति का समवाय कहता रहा है।शीत-ऋतु में सूर्य से चन्द्रमा को मिलने वाली ऊर्जा लगातार क्षीण पड़ने लगती है-ऐसे में इस तिथि को अपने व्रत रूपी मनोसंकल्प के जरिये स्त्री(अग्नि तत्व) पुरुष तत्व(सोम) को संबल प्रदान करती है।।वे एक दूसरे के पूरक हैं-अवरोधी नहीं,जैसा कि आधुनिक विमर्शकार मान बैठे हैं।

इसके साथ आज जो बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद व दिखावा जुड़ता चला जा रहा है उसका इस पर्व से कोई लेना-देना नहीं है। मूलतः यह पत्नी द्वारा पति की सलामती के लिए की जाने वाली मंगल कामना का संकल्प पर्व है।

सवाईसिंह शेखावत की कलम से

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