जानिए सिंधु दर्शन यात्रा के बारे मे | Know about the Sindhu Darshan Yatra…

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नीरज राठौर की कलम से

भारत का पश्चिमी हिमालय कम से कम 2100 वर्षों से भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति की छाया से वीरान हो चुका है । वह पश्चिमी हिमालय जो वास्तव मे भारत की उत्तरी रक्षा प्राचीर होने का गौरव रखता है या हम भारत के लोगों का ऐसा विश्वास है कि पश्चिमी हिमालय भारत की उत्तरी रक्षा प्राचीर का कार्य करता है वही भारत की रक्षा प्राचीर सबसे पहले सिकन्दर के सैनिकों द्वारा उद्वेलित किया गया था, तथा उसके कुछ क्षेत्रों पर पर्वतेश्वर पुरु को सुरक्षा देने के नाम पर शासित किया गया था ।

लेकिन चौथी सदी ईस्वी पूर्व मे आचार्य विष्णु गुप्त व सम्राट चंद्रुगुप्त के द्वारा यवनों के विरुद्ध खड़े किए गए स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद सिंधु, वाह्लीक, पंचनद, कश्मीर, मालव, शूद्रक व गंधार यवन सत्ता से पूर्णतः स्वतंत्र हो गए थे । इसी स्वतंत्रता आंदोलन मे सम्पूर्ण यवन सेनापतियों को मार दिया गया था तथा सेना के सामान्य जन सनातन संस्कृति को अपना चुके थे ।

यवन विनाश के बाद लगभग 250 वर्ष तक पश्चिमी हिमालय भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म को पालता रहा जब तक कि की भारत पर शक व कुषाण का आक्रमण नहीं हुआ । सबसे पहले इसवी पूर्व 176 में पश्चिम उत्तर भारत पर शकों ने आक्रमण किया । शकों का यह आक्रमण खैबर एवं बोलन दर्रे को पार करके कश्मीर होते हुए भारत पर हुआ । शकों की ही एक शाखा ने कश्मीर एवं उसके समस्त लेह – लद्दाख क्षेत्र पर भी चीन के शिनझियांग प्रदेश की तारिम द्रोणी से होते हुए काराकोरम दर्रा पार करके आक्रमण किया और लेह लद्दाख क्षेत्र जो कि भारत की प्राचीन वैदिक संस्कृति तथा वेदों की प्रथम रचनाओं का अवतरण का केंद्र है व शप्तऋषिओं का तपस्या स्थल एवं क्रीड़ा स्थल है, उनका यज्ञ स्थल है तथा भारतीय सनातन संस्कृति का वैश्विक केंद्र है वहां की संस्कृति को नष्ट किया ।

शकों के बारे में इतिहास यह है कि वह रघुवंशी राजा नरिष्यन्त के वंशज थे और शकों की ही एक शाखा कुषाण वंश के नाम से भी जानी जाती है जिसमें राजा कनिष्क हुए । 1400 भी पूर्व जब मिस्र की रानी हतशेपसुत की सेना ने सम्पूर्ण पश्चिमी एशिया को रौंदते हुए भारत के गांधार प्रदेश पर आक्रमण किया था तो रघुवंशी राजकुमार नरिष्यन्त ने गांधार पहुंचकर उस प्रथम विदेशी आक्रमण का प्रतिकार किया था और मिस्र की रानी हतशेपसुत की सेना को परास्त करने के बाद गांधार से लेकर हिंदूकुश पर्वत पार करते हुए समस्त उत्तरी पश्चिमी प्राचीन भारत अर्थात ताशकंद तक अपनी विजय पताका फहराई और अपने साम्राज्य को कजाखस्तान, ईरान तथा गांधार और चीन के शिनझियांग प्रांत मे स्थापित किया।

भारत की वैदिक संस्कृति का केंद्र सुरक्षा की दृष्टि से एवं आध्यात्मिक चिंतन की दृष्टि से प्राचीन ऋषियों द्वारा लेह – लद्दाख को चुना गया था। काराकोरम दर्रा के पार उत्तर में चीन की तारिम द्रोणी से लेकर ताशकन्द तक, गांधार इरान एवं संपूर्ण शेष भारत तक पिता की ओर से जो वंशक्रम व डीएनए है वह एक ही है जिसे हम R1A1A के नाम से जानते हैं, जो यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि लेह – लद्दाख भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति का केंद्र था और भारतीय संस्कृति ताशकंद से लेकर कन्याकुमारी तक और संपूर्ण बंगाल की खाड़ी के द्वीपीय प्रदेशों एवं वर्तमान देशों से लेकर इरान तक फैली थी।

राजा नरिष्यन्त के वंशज जो कि बाद में शक एवं कुषाण के नाम से जाने गए, तथा महाराज कुश के वंश में आते हैं जिससे उन्हें कुशाण कहा गया और जिनका राज्य वर्तमान हिंदूकुश को केंद्र बनाकर उसके के चारों ओर स्थापित था । शक व कुषाण लगभग 1200 वर्षों तक भारत की संस्कृति से दूर रहने के कारण धर्म से पतित एवं भ्रष्ट हो चुके थे, भारतीय संस्कृति का इनको ज्ञान नहीं रह गया था, इसलिए जब इन्हीं लोगों ने इन्हीं भारतीय रक्त के अपने सहोदरों व समान वंशजों पर भारत आकर आक्रमण किया तो इन्होंने अज्ञानता बस भारत की संस्कृति के मूल केंद्र लेह – लद्दाख की उस पवित्र सांस्कृतिक यज्ञशाला एवं ऋषियों के ज्ञान के केंद्र को नष्ट कर दिया, लेकिन जलवायु कठिन होने व अपने लिए अनुकूल वातावरण न होने के कारण ये शक या कुषाण और उनमें से कोई भी वहां अपना शासन स्थाई रूप से स्थापित नहीं रख सका और इन सभी को कालांतर में लेह लद्दाख को छोड़ना पड़ा और यह भारत के मैदानी क्षेत्रों में आकर बस गए और सनातन हिंदू संस्कृति में सम्मिलित हो गए।

विशाल जनसंख्या स्थानांतरण एवं लेह क्षेत्र को इन लोगों के छोड़ने के बाद लेह लद्दाख अधिकांश रूप से बाद मे खाली हो गया जिसको बाद में तिब्बत के वर्तमान भारतीय वंसज लोगों द्वारा एवं बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा ईस्वी सन के प्रारंभ के 400 वर्षों बाद अपना शासन स्थापित करके भरा गया । यह इतिहास लेह लद्दाख क्षेत्र से भारत की सनातन संस्कृति के समाप्ति का इतिहास है, लेकिन फिर भी भारत को यह इतिहास जानना चाहिए, भारत के लोगों को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक और धार्मिक जड़ों और मूल स्थान को जानना चाहिए और वहां पर जाकर अपने प्राचीनतम उद्गम के साथ जुड़ने को अनुभव करना चाहिए।

1997 से प्रारंभ हुआ सिंधु दर्शन यात्रा समिति का यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक तथा धार्मिक अभियान संभव है भारत के इतिहास का एक सारगर्भित और अतुलनीय प्रयास है जो शेष भारत को अपने मूल उद्गम स्थल से जोड़ने का प्रयास करता है ।इसमें धर्म और जाति अथवा समुदायों की भेदपूर्ण विभिन्नता से हटकर अंतरराष्ट्रीय स्तर से सभी प्राचीनतम हिंदुत्व के तत्वों को सिंधु दर्शन उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया जाता है, और समिति के द्वारा प्रारंभ किए गए सिंधु उत्सव में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ संपूर्ण देश के समस्त प्रदेशों के चुने हुए लोगों के साथ आपस में एक साथ एकत्रित करके परिचित करने का प्रयास प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।

हिंदू शब्द जो कि भारत के वैदिक ग्रंथों में अनेक स्थानों पर आया है और जिसको अधिक स्पष्ट रूप से व्याकरण के महान ग्रंथ बृहस्पति आगम में लिखा गया है, किसी भी विदेशी विचार से न तो प्रभावित है और नहीं इसकी स्थापना किन्ही विदेशियों ने की थी, न ही यह किसी “स” को “ह” उच्चारण करने वाले विदेशी प्रयासकर्ता या विदेशी समुदाय के द्वारा भारतीय इतिहास को प्रदान की गई है ।

हिंदू शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग भगवान राम के पुत्र महाराज कुश ने किया, और ऐसी संभावना है कि उनके द्वारा अपने राज्य की स्थापना वर्तमान हिंदूकुश पर्वत के उत्तर एवं दक्षिण, पश्चिम एवं पूर्व चारों ओर की गई थी, जिससे उन्हीं के नाम पर उनके राज्य का नाम हिंदूकुश राज्य पड़ा जिसमें वर्तमान “हिंदू – कुश पर्वत” राज्य की स्थापना के उदाहरण को स्पष्ट करने के लिए हमारे सामने है।

एक विशाल क्षेत्र जो भारतीय रक्तवंश की R1A1A डीएनए परंपरा से है उसी के हम सब लोग वंशज हैं चाहे हम आज भले ही अपने आप को हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, मुसलमान या ईसाई कहते हैं लेकिन भारत मे बसे हुए सभी समुदाय मूलरूप से हम भारतीय इसी डीएनए के लोग हैं जो कि मूल रूप से हिंदू संस्कृति से निकले हुए भी कहे जाते हैं, अर्थात उनके मूल में हिंदू है और वह हिंदू से निकले हुए तत्व हैं, इसलिए हम उनको हिंदुत्व का हिस्सा मानते हैं अर्थात जो हिंदू का तत्व है वह हिंदुत्व का भाग हैं और यही हमारी परिभाषा का हिंदुत्व है।

इसी भावना के अंतर्गत हम हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन व बौद्ध सभी को इस पवित्र सांस्कृतिक और सामाजिक व धार्मिक आयोजन में सम्मिलित करने के लिए प्रयासरत रहते हैं और यात्रा को सारगर्भित सामुदायिक और सामाजिक एकता के उदाहरण के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

इस यात्रा का उद्देश्य पूरे विश्व के भारतीय मूल के प्राचीन सनातन हिंदू समाज को जोड़ने के प्रयास का यह 23वां वर्ष है जो कि 1997 में भारत रत्न स्व0 अटल बिहारी वाजपेई जी के समय में माननीय लालकृष्ण आडवाणी जी एवं समाज के अनेक वरिष्ठ तथा श्रमशील, कर्तव्यनिष्ठ समाजसेवियों द्वारा प्रारंभ किया गया था ।

यह सिंधु उत्सव अब अपने एक परिपक्व पड़ाव की ओर आ चुका है और एक परंपरा के रूप में स्थापित हो चुका है, जिसमें भारत के सभी प्रदेशों के मुख्य – मुख्य सांस्कृतिक व सामाजिक संगठनों के लोगों के साथ साथ, लोक गायक, लोक संगीतज्ञ, लोक नृत्य के ज्ञाता और लोक कलाओं के ज्ञाता सम्मिलित होकर एक साथ कार्यक्रम मे मंत्रमुग्ध प्रस्तुति देकर यशस्वी बनाते हैं और संपूर्ण भारत को कुछ दिन के लिए लेह – लद्दाख क्षेत्र में स्थापित करके एक सुंदर सीमित भारत के रूप में संयोजित करके अपना योगदान देते हैं।

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी 23 जून से 27 जून तक यह कार्यक्रम पूर्व की भांति ही लेह जनपद में सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन के साथ – साथ गर्मी की भीषणता से छुटकारा दिलाने मे आपके लिए के बहुल उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है ।

अतः इस उत्सव में आकर पुनः एक बार संपूर्ण भारत को एक रूप व एक साथ देखने के सौभाग्य के लिए हम आपको आमंत्रित करते हैं ।

सिंधु दर्शन यात्रा समिति ।

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