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जानिए ऐसी धरती जहासे भगवान झांकते है …

Posted on: 22 Jun 2018 06:18 by shilpa
जानिए ऐसी धरती जहासे भगवान झांकते है …

नई दिल्ली :हिमालय प्रकृति का महामंदिर है ,और यहाँ हर एक धर्मस्थल एक महत्वपूर्ण स्थान है । जी हा केदारनाथ तीर्थ उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है। यहा जाते समय पैरों के निचे हिमराशी खिसकती दिखाई पडती है।

युग-युगांतर से उत्तराखंड भारतीयों के लिए आध्यात्मिक शरणस्थल और शांति प्रदाता रहा है। अनंत काल से ऋषि-मुनियों और साधकों के लिए यह आकर्षित करता आ रहा है। हिमालय प्रकृति का मंदिर है। यहाँ केदारनाथ तीर्थ उत्तराखंड का महत्वपूर्ण स्थल है।उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है |

यह जाते समय अपने पैरों के निचे से बर्फ खिसकती प्रतीत होती है। बर्फ के आसपास सिरंगा पुष्पकुंज मिलते है जिनकी खुशबु अत्यंत मादक होती है और झा ये खत्म होते है वह चारों और हरी दूब मिलती है। और फिर केदारनाथ के हिमनद से निकलती मन्दाकिनी झरनों के जल को समेटे उद्दाम गति से प्रवाहित होती है दिखाई देती है। केदारनाथ का 6 हजार 940 मीटर ऊँचा हिमशिखर दिखता है जो देवताओ का स्वर्ग से पृथ्वी लोग पर देखने के लिए बना झरोखा प्रतीत होता है।

केदारनाथ की ऋषिकेश से दुरी 223 किमी है। यात्रा का अंतिम पड़ाव गौरीकुंड से केदारनाथ है जो पैदल ,पालखी या घोड़े से जाना पड़ता है या फिर रानीखेत कर्णप्रयाग,चमोली ,उखीमठ , गुप्तकाशी से केदारनाथ जाता दूसरा मार्ग है ।

केदारनाथ यह उत्तराखंड का सबसे विशाल शिवमंदिर है जो विशाल शिलाखंडो को जोडकर बनाया गया है।  इसका गर्भगृह प्राचीन है , जिसे 12वीं ,13वीं शताब्ती का माना जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में चारों कोनो पर चार पाषाण स्तंभ है जहा से प्रदक्षिणा होती है। सभा मंडप विशाल एवं भव्य है। उसकी छत चार विशाल पाषाण स्तंभों पर टिकी है।
गवाक्षों में अत्यंत कलात्मक आठ पुरुष प्रमाण मुर्तिया है और पीछे की और भगवान ईशान का मंदिर है और शंकराचार्य का समाधि स्थल है।

केदारनाथ से 20 किमी पहले गंगोत्री, बुढाकेदार सोनप्रयाग के रास्ते पर एक प्रसिद्द धार्मिक स्थल है जिसका नाम त्रियुगी नारायण है। मंदिर के गर्भगृह में नारायण भगवान की सुंदर मूर्ति है। भूदेवी तथा लक्ष्मी की मुर्तिया है। यहाँ ब्रम्हा कुंड ,रूद्र कुंड ,और सरस्वती कुंड के साथ अनेक कुंड है  इस मंदिर में अखंड धूनी जलती रहती है। किंवदंती है कि यह वही अग्नि है, जिसकी साक्षी कर शिव ने पार्वती से विवाह किया था। पार्वती का मायका अर्थात हिमालय नरेश का निवास भी यही बताया जाता है।

केदारनाथ में 6किमी पहले पैदल चलने वालों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है जो तीर्थ एवं विश्राम स्थल है ।उसकी ऊंचाई केवल 1982 मीटर है.यहाँ गर्म पानी और ठंडे पानी के दो बहुत ही उत्तम कुंड हैं। यहाँ गौरी मंदिर है, कहा जाता है महादेव को पाने के लिए माँ पार्वती ने यहा तपस्या की थी ।

दीपावली के दुसरे दिन याने गोवर्धन पड़वा के दिन शीत ऋतू के लिए मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते है। उस समय एक दीपक प्रज्वलित किया जाता है जो 6 माह तक जलता रहता है। मंदिर बंद करते समय भारतीय सेना द्वारा उपस्थित श्रद्धालुओं को भोज दिया जाता है। भोज का खर्च भारतीय सेना उठाती है। होटल,लॉज, धर्मशाला बंद हो जाते हैं।

यहासे 5 किमी दूरी पर एक स्थान है वासुकी ताल जो अपने पारदर्शी जल और उसमे डूबते हिमखंडों के अद्भुत दृश्यों के लिए विख्यात है। भीम गुफा और गुग्गुल कुंड जैसे और भी दर्शनीय स्थल है। आधा किमी दूर पर भैरवनाथ मंदिर है ,जहाँ केवल केदारनाथ के पट खुलने और बंद होने के दिन ही पूजन किया जाता है। भैरव का स्थान उत्तराखंड में क्षेत्रपाल अथवा भूमिदेव के रूप में महत्वपूर्ण है।

पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह और दंडीको 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। सेना के जवान भगवान की पालकी को बैंडबाजे से लाते हैं।उत्तराखंड की यात्रा मई माह आरंभ होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के प्रतीक केदारनाथ के कपाट खुलने का समय भी मई माह में होता है।

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