narendra saluja

नितिनमोहन शर्मा

पीएम के सामने भी टांग पर टांग रखकर बैठने वाले कमलनाथ की अकड़ ने कांग्रेस के एक और मैदानी सिपहसालार को भाजपाई बना दिया। सिपहसालार भी नाथ का खासमखास। बरसो से उनके लिए किला लड़ाने वाला। ठंड गर्मी बरसात की परवाह किये बगेर पलटवार करने वाला। बगेर बिजली वाले दफ्तर में बैठकर किला लड़ाने वाला। तब से, जब नाथ एमपी में आये ही नही थे। सुबह से लेकर शाम तक सोशल मीडिया पर कमलनाथ के बचाव और उनके बयानों की तोप दागने वाला। नाम नरेंद्र सलूजा। काम कांग्रेस के मीडिया को-आर्डिनेटर, मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष।

सलूजा ने ऐसे वक्त भाजपा का दामन थामा है जब कांग्रेस के राजकुमार राहुल अपनी भारत जोड़ो यात्रा के साथ मालवा के मुहाने पर खड़े है। वे भारत जोड़ने निकले है लेकिन उनके ही दल के इंदौर के नेता, उनके इंदौर आने के पहले ही कांग्रेस छोड़ गए। नेता भी कोई ऐसे वैसे नही। कमलनाथ के खास। नाथ ने ऐसे मौके पर एक ‘ असरदार ‘ ‘सरदार’ खो दिया, जब उन पर सिख दंगो का भूत फिर आकर चिपका है। वह भी राहुल की यात्रा के ठीक पहले।

सलूजा की कांग्रेस से बिदाई की पटकथा में भी ये सिख दंगे की कहानी है जिसे गुरुनानक जयंती के समारोह में ख़ालसा कॉलेज में लिखा गया। यहाँ नाथ दिवान पर शीश नवाने पहुंचे थे। कीर्तनकारों ने इसका विरोध कर दिया कि सिख दंगो के आरोपी का सिख संगत में क्या काम? मामला तूल पकड़ गया। ठीकरा सलूजा के माथे फोड़ दिया गया। ‘कच्चे कान’ के कमलनाथ ने फ़ौरन मान लिया कि सब किया धरा सलूजा का ही है।

नतीजतन आहत सलूजा का मानस भाजपा ने पड़ लिया और मीडिया प्रभारी लोकेन्द्र पराशर ने बाकी की भूमिका सरपट निभाई ओर सलूजा मुख्यमंत्री की मौजूदगी में ये कहते हुए भाजपाई हो गए कि 1984 के आरोपी का साथ अब संभव नही। यानी नाथ जिस मसले को दबाना चाहते थे, राहुल के आने के ठीक पहले वो फिर उछलकर उनके मुंह के सामने खड़ा हो गया है। अब भले ही कांग्रेस पुरानी तारीख का पत्र जारी कर सलूजा को निष्कासित बताए या कांग्रेस के सिख नेता सलूजा को दोगला कहे, जनाधार विहीन कहे, तीर तो कमान से अब निकल गया।और निकलते ही वह कांग्रेस की तरफ आ गया।

आज सुबह ही सलूजा ने भारत जोड़ो यात्रा के टी ब्रेक में हुई घटना के साथ अपनी मुखरता वाली तोप का मुहाना कांग्रेस की तरफ मोड़ दिया। जो सलूजा अलसुबह से देर रात तक कांग्रेस के पक्ष में क़िला लड़ा रहे थे, वे अब भाजपा की तरफ़ से कांग्रेसी किलेबंदी से लड़ेंगे। वो भी मिशन 2023 के ठीक पहले। सलूजा को कांग्रेसी किले की मजबूती, कमजोरी सब पता है। अब कांग्रेस कैसे अपने इस मुखर पूर्व प्रवक्ता का मुकाबला करेगी? जो कांग्रेस ही नही…कमलनाथ के बारे में भी ‘ राई रत्ती ‘ तक का जानता हो। अब वो मुंह खोलेगा तो कितनो की बोलती बंद होगी? वक़्त बताएगा। लेकिन सवाल वही है- नाथ की अकड़ का।

…तो किसने रोका..उतर जाओ सड़क पर…!! ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए बोली गई इस एक लाइन ने नाथ ही नही, 15 साल बाद प्रदेश की सत्ता में आई कांग्रेस को भी सड़क पर ला दिया था। उम्मीद थी कि इसके बाद नाथ के मिजाज में नरमी आएगी लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ। आज हकीकत ये है कि वे चन्द्रप्रभाष शेखर तक नाथ के रवैये से दुःखी है, जिनके बारे में कहा जाता है कि ये नाथ के आंख कान ओर नाक है।

सज्जनसिंह वर्मा से लेकर अरुण यादव और अजयसिंह से लेकर दिग्विजयसिंह तक नेताओ की कतार है जो नाथ के ‘ एटीट्यूड ‘ से आजिज आ चुके है। भारत जोड़ो यात्रा के मुख्य सूत्रधार एमपी के दिग्विजयसिंह को, एमपी में यात्रा के आने के ठीक पहले ये क्यो कहना पड़ता है कि मेरे फोटो किसी भी प्रचार सामग्री पर नही होना चाहिए..? जबकि असली पसीना तो राघोगढ़ का राजा का ही बह रहा है। ऐसे कई उदाहरण है।

सलूजा तो चावल की उस हांडी का एक दाना है जो एक बार फिर से नाथ के रवैये से खदबदा रही है। समय रहते नाथ अपने रवैये में नथनी नही पहनाते तो…ऐसे और कई सलूजाओ की कतार है जो कमलनाथ का साथ छोड़कर कमलदल के हो जाएंगे।

बचे कितने है जनाधार वाले?

सलूजा के भाजपा में जाने पर कांग्रेस नेता तंज कस रहे है कि सलूजा का जनाधार है क्या? वे एक पार्षद तक का चुनाव नही जीत सकते। उनके जाने से कोई फर्क नही पड़ेगा…ऐसा कहने वालों को ये भी बताना चाहिए कि अब कांग्रेस में जनाधार वाले नेता है ही कितने? 1989 के बाद से कांग्रेस इंदौर लोकसभा सीट नही जीत पाई। 23 साल से नगर निगम से दूर है। 15-17 साल से प्रदेश की सत्ता से दूर है। सत्ता आई भी तो 13 महीने में धराशायी भी हो गई। उसके बाद जितने उपचुनाव हुए, पार्टी का ग्राफ़ नीचे ही गिरता गया।

नेताओ का पार्टी छोड़कर जाना बदस्तूर जारी है। ऐसे में निष्ठावान कांग्रेसी का आहत मन से दल बदलना…कांग्रेजनो के लिए दुःख का कारण होना चाहिए। ना कि जो गया उसकी जमीनी हैसियत पर हंसी ठिठोली करने के। सलूजा ने सोशल मीडिया में भोपाल में बैठकर कांग्रेस को उस भाजपा के मुकाबले खड़ा किया हुआ था, जो साधन सम्पन्न है। जिसके पास एक से बढ़कर एक ‘थिंक टैंक’ है।

इन सबसे सलूजा अपनी ‘ दो नाली ‘ बंदूक के साथ वैसे ही क़िला लड़ा रहे थे…जैसे तारागढ़ की लड़ाई में बहादुर सिख, हजारों की संख्या वाली क्रुर अफगानी सेना से लड़ते है। भोपाल का सोशल मीडिया मैदान भी किसी युद्ध भूमि से कम नही। अब फायदे में भाजपा है। डॉ हितेश वाजपेयी, लोकेंद्र पराशर के साथ साथ अब सलूजा की मारक क्षमता भी उसके पास आ गई है जिसका मुज़ाहिरा शनिवार सुबह ही सलूजा के जरिये कांग्रेस ने देख भी लिया भारत जोड़ो यात्रा के टी ब्रेक की ब्रेकिंग के जरिये…!! अभी तो ये आगाज़ है। अंजाम रामजी जाने…!!