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अभी शांत रहें अफसर नई तरकीब सोच रहे हैं; फिर भी अब भगवान ही खेती की रक्षा करके दिखा दें…

Posted on: 05 Jun 2018 14:31 by Mohit Devkar
अभी शांत रहें अफसर नई तरकीब सोच रहे हैं; फिर भी अब भगवान ही खेती की रक्षा करके दिखा दें…

कमलेश पारे:

हम लोग जब किसी भी देव की पूजा करते हैं,तब पहले या आखिर में उस देवता से यह जरूर कहते हैं कि “मैं मन्त्र नहीं जानता,न ही यन्त्र,और स्तुति का तो मुझे बिलकुल ही ज्ञान नहीं है. यह मन्त्र लम्बा चलता है,और सबसे अंत में हम उस देवता से क्षमा माँगते हैं. इसी तरह मैं अपनी बात कहने के पहले,सबसे क्षमा मांगता हूँ कि इस लेख में अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए एक भी आंकड़ा नहीं लिखूंगा. एक भी व्यक्ति का नाम नहीं बताऊंगा और अपनी तरफ से कोई सलाह भी नहीं दूँगा. लेकिन,इसका यह मतलब क़तई नहीं है कि आप अपनी ओर से आंकड़े देखकर इसकी पुष्टि नहीं करें. आजकल तो अपने आप को छोड़कर ‘गूगल’ में सब मिलता है.

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अपने देश में हर दूसरा बड़ा आदमी कहता है कि खेती को लाभ का धंधा बनाना चाहिए. कुछ लोग इस बात पर चुनाव जीत जाते हैं,तो कुछ क़सम खाते-खाते अपना पूरा वक़्त निकाल देते हैं. मैं उनके दिमाग के ‘आइडियाज़’ की बात नहीं करता,बस जमीनी हकीकत पर बात करना चाहता हूँ. यदि आप कोई भी,बुरा न मानें,तो अपन अपने ही मध्य प्रदेश की बात कर लें ? हमारे यहाँ कृषि को लाभ का धंधा बनाने की कसमें रोज खाई जाती है.

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आप तो जानते ही हैं कि दुनिया में कई चीज़ें घटाई या बढाई जा सकती है,जमीन नहीं. आप यह भी जानते हैं कि जनसँख्या में ,हम रोज बढ़ रहे हैं.इस कारण अकेले पिता की भूमि चार या पांच भाइयों में पहले बंटी,फिर वही जमीन उनके पुत्रों,पौत्रों या अगली पीढ़ियों में बंटती गई. हर बार संख्या में जमीन के मालिक बढे,किन्तु उनके स्वामित्व की जमीनें कम होती गई. हमारे गाँव में इसे ‘जोत’ कहते हैं. इन छोटी-छोटी ‘जोतों’के कारण खेती रोज घाटे का सौदा या धंधा हो गई है. यहाँ मैं देश के 75 प्रतिशत किसानों की बात कर रहा हूँ,कम प्रतिशत के बड़े किसानों की नहीं. अब बड़ी संख्या में छोटी जोत वाले किसान जब बाजार में अपनी जरूरत का खाद,बीज,दवाई या यंत्र खरीदने जाएंगे तो सबसे छोटे खेरची दूकानदार के यहाँ ही जाएंगे,क्योंकि बड़ा आदमी इतनी कम मात्रा का व्यापार नहीं करता. उन खादों,बीजों,दवाइयों और यंत्रों के उत्पादक से लगाकर उस अंतिम खेरची दूकानदार तक पांच लोग होते हैं.

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सबका मुनाफा जुड़ते जुड़ते छोटे किसान को अपनी जरूरत का सामान बहुत ही महंगा मिलता है.जबकि वही छोटा किसान अपना माल बेचते समय थोक व्यापारी को बेचता है,जो उसके और उपभोक्ता के बीच के सारे लोगों का मुनाफा और हर बार का भाड़ा जोड़कर ही माल खरीदता है.अब आप ही बताएं किसान को लाभ कैसे हो ? ऐसी हालत में तो भगवान या उनके पिताजी साक्षात ही आ जाएँ,तो भी किसान की मदद तो नहीं हो सकती.इसमें आप वे सब चीजें भी जोड़ सकते हैं,जो मैं भूल गया हूँ.

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भारत में खेती हज़ारों साल से हो रही है.ऐसा क़तई नहीं है कि आपके सामने मैंने ही पहली बार यह बात खोजी हो. हमारे पूर्वजों ने सब महसूस कर,अगले हजारों साल के लिए व्यवस्था सोच ली थी.उन्होंने हर स्तर पर,हर काम के लिए और हर समय के लिए सहकारिता की व्यवस्था बनाई थी.यानी ज्यादा लोग मिलकर,अपनी जरूरत का ज्यादा माल एक साथ और एक बार में खरीदेंगे,तो वे एक ‘शक्ति’बनकर अपनी शर्तों पर खरीदी कर सकते हैं. इसी तरह,एक साथ सबका माल इकठ्ठा कर,वे अपनी शर्तों पर उसे बेच सकते हैं. इसके लिए हमारे पुरखों ने सहकारी समितियां बनाई थीं. आज किसी का भी राज हो,कल किसी का भी राज था,और परसों के लिए कोई भी प्रयास कर रहा हो,लेकिन सबने अपनी अपनी बेवकूफियों,बेईमानी और बेशर्मी से सहकारिता का पूरा ढांचा नेस्त-ओ-नाबूत कर दिया है.

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अब आप ही बताएं कि किसान व्यापारियों के रहम पर रहते हुए कैसे अपने काम को लाभ का धंधा बनाये ? आपको याद है एक बार दाल का संकट आया था. अपने ही प्रदेश के एक मंत्री ने उत्साह में व्यापारियों के यहाँ छापा मारा,और यह कहकर लौट आये कि सात दिनों में अपने कागज़ पत्तर ठीक कर लेना.सरकार बहादुर ने पूछा भी नहीं कि गरीब किसानों से किस भाव में खरीदकर,किस भाव में असहाय उपभोक्ताओं को बेच रहे हो.

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एक बात और, अपनी सरकार बहादुर को पता ही नहीं कि कितने अरब रुपयों की सहकारी संपत्ति अटाले या कबाड़े में पड़ी भंगार हो रही है. जिस संस्था को कृषि यंत्र बनाकर खेती को आसान बनाना था, वह पोषण आहार की लूट में लग गई, जिस संस्था को किसानों का माल खरीदकर गोदामों में पहुँचाना था उसकी कमीज पर सीहोर से खरीदी गई मिट्टी के गहरे दाग हैं. ऊपर से वह मैली कमीज ही कार्पेट के नीचे छुपा दी गई है. इसके आगे भी गिनाने को बहुत-बहुत बातें हैं. आखिर में एक बात जान लें कि गाँवों में किसानों की मदद के लिए कार्यरत सोसाइटियों के छोटे -छोटे कारकूनों के घर छापों में करोड़ों रुपये निकलते हैं. कोई भी सोसाइटी ठीक टाइम पर खाद-बीज,दवाई,यन्त्र और साख नहीं उपलब्ध करा पाती है. पिछले ही साल किसानों ने नसरुल्लागंज में खाद के ट्रक लूट लिए थे.विदिशा और गुना में बीज के लिए आंदोलन हुए थे. मंडियों की बेईमानी के तो हजारों किस्से हैं.

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अब आप ही बताएं खेती लाभ का धंधा कैसे बने. बिजली और उसकी उपलब्धता के कारण सिंचाई न हो पाना भी बड़ी समस्या है ही. एक साल भोपाल की मेयर ने अपनी सनक में कलियासोत का पानी सिंचाई के लिए इसलिए नहीं छोड़ने दिया,क्योंकि भोपाल में पानी की समस्या की आशंका थी. इससे ओबेदुल्लागंज और बाड़ी के आसपास की हजारों एकड़ की फसल बर्बाद हो गई थी. मैंने कोई नई बात नहीं बताई है,सबको सब कुछ मालूम है.सब जानते हैं कि सब कुछ सुधारा जा सकता है.लेकिन वह बाद में, आज तो खेती को लाभ का धंधा बनाएंगे.आंदोलन मत करो. खेती करते न बने,तो भाइयों बहनों,खेती छोड़ दो. भोपाल,इंदौर,ग्वालियर और जबलपुर में मजदूरी के लिए बिल्डर आपका इंतज़ार कर रहे हैं

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