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कहा तक ये मन को अंधेरे छलेंगे… अलविदा योगेश जी

लगता है समय ही खराब है…बुरी खबरों के दौर में एक और मनहूस खबर आई कि हम सब के पसंदीदा गीतकार योगेश नहीं रहे.. 70 के दशक में कई सुमधुर गीतों को रचने वाले योगेश का एक गीत इस कोरोना काल में भी बहुत शेयर किया जा रहा है …कहां तक ये मन को अंधेरे छलेंगे.. कभी तो उदासी के दिन बीतेंगे… यूं तो योगेश जी कई उम्दा गीत लिखे है..जिसमें उनके प्रेम गीतों का भी कोई जवाब नहीं….रिमझिम गिरे सावन … आए तुम याद मुझे …कई बार यूं ही देखा है ,यह जो मन की सीमा रेखा है…

कहीं दूर जब दिन ढल जाए …न जाने क्यों होता है इस जिंदगी के साथ… बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी ये जिंदगी ..जैसे कई अनमोल गीतों का खजाना योगेश जी हमारे लिए छोड़ गए हैं …सीधी सरल भाषा में लिखे उनके गीत दिल में उतर कर वही घर कर गए है…क्या हम किसी ऐसे सावन की कल्पना कर सकते है जिसमें घुँघरुओं सी बजती बूंदे न हो ..या इस कल्पना को क्या कहेंगे …जिस पल नैनों में सपना तेरा आए…उस पल मौसम पर मेहंदी रची जाए ….!अलविदा योगेश जी …आप हमारे साथ थे और सदैव रहेंगे ..अपने तमाम अनमोल गीतों के साथ जो हम सदा गुनगुनाते रहेंगे।