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दिग्गी राजा को भोपाल की जनता ने हराया, फिर भी बने रहे आदर्श लोकसेवक

Posted on: 22 May 2020 11:29 by Bharat Prajapat
दिग्गी राजा को भोपाल की जनता ने हराया, फिर भी बने रहे आदर्श लोकसेवक

योगेन्द्र सिंह परिहार

भोपाल। मई 2019 में लोकसभा चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह जी को उनकी परंपरागत सीट राजगढ़ को छोड़कर भाजपा की परंपरागत सीट भोपाल से चुनाव लड़ाया। भाजपा ने पहले तो राजनीति के एक से एक धुरंधरों के नाम भोपाल से चलाए लेकिन जैसे ही दिग्विजय सिंह जी का नाम आया तो भोपाल को सेफ सीट समझने वाले सभी दिग्गज पीछे हट गए। फिर क्या था भाजपा ने अपनी असली फितरत दिखाते हुए नफरत के एजेंडे को आगे बढाकर प्रज्ञा ठाकुर को अपना उम्मीदवार बनाया। प्रज्ञा ठाकुर मतलब छद्म हिन्दू वादियों का वो मुखौटा जो धर्म के नाम पर सिर्फ ज़हर उगलता है। मालेगांव ब्लास्ट की प्रमुख आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को मास्टरस्ट्रोक की तरह भोपाल से उतारा गया, उनका उद्देश्य इस सीट पर जीत हार से कतई नही था बल्कि सिर्फ धर्म आधारित विभाजनकारी और नफरत के एजेंडे की राजनीति करना था जिसमें चुनाव प्रचार के दौरान होने वाले इस सीट के विवादित मुद्दों को पूरे देश में भुनाया जा सके।

धर्म की आड़ में आदमी को आदमी से लड़ाने वाली विचारधारा ये अच्छी तरह से जानती थी कि दिग्विजय सिंह जी समता वाद को मानते हैं और हर धर्म के लोगों की लड़ाई लड़ते हैं ऐसे में किसी कट्टर विवादित चेहरे को चुनाव लड़ाने पर कभी न कभी दिग्विजय सिंह जी अपने चिर-परिचित अंदाज़ में प्रतिक्रिया ज़रूर देंगे और जब भी वे बोलेंगे तो उनकी बातों को तोड़ मरोड़कर फ़ासीवादी ताकतें समूचे देश मे भुना लेंगी। लेकिन उनके मंसूबों पर उस वक़्त पानी फिर गया जब दिग्गी राजा ने उनके उकसाने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही की और जो आग पूरे देश में लगानी थी वो भोपाल में ही सिमट के रह गई। चूंकि देश को नफरत की आग में झोंकने के लिए भोपाल के चुनाव की रूप रेखा तैयार की गई थी तो उस आग में सर्वधर्म समभाव को मानने वाली कांग्रेस के प्रत्याशी का झुलसना तय था और वही हुआ, चुनाव का मुख्य मुद्दा हिन्दू मुस्लिम बन गया और जनता ने अनुभवी जन सेवक दिग्विजय सिंह जी को बुरी तरह से हरा दिया।

जनता की आंखों में कट्टर हिंदूवाद व छद्म राष्ट्रवाद की पट्टी बंधी हुई है। ये ऐसी अफीम है जिसका नशा आसानी से खत्म नही होता। लोकसभा चुनाव में पूरा देश इसी नशे की चपेट में था और जीत भी उन्ही की हुई। भोपाल की जनता ने वही किया जो कट्टरवादी विचारधारा ने बुना हुआ था। प्रज्ञा ठाकुर जैसी आपराधिक प्रवृत्ति की महिला भगवा चोला ओढ़कर आसानी से चुनाव जीत गई और दिग्विजय सिंह जी के 40 वर्ष के विशाल जनसेवा के अनुभव को हार मिली। पिछले 6 साल में देश में एक परिवर्तन और हुआ है, मीडिया और जनता अपने सारे सवाल विपक्ष से करता है जबकि जिन्हें जिताया गया है सारी जवाबदेही भी उसी नेता की होनी चाहिए। लेकिन मजाल है उनसे कोई सवाल पूछ सके!

विकास के संकल्प, एक विज़न के साथ भोपाल चुनाव में उतरे दिग्गी राजा को भोपाल की जनता ने हराया, फिर भी वे आदर्श लोकसेवक बन जनता के बीच ही रहे। अपने संकल्प अपने विजन पर काम करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री कमलनाथ जी से अनुरोध किया कि भोपाल के चहुँमुखी विकास के लिए तैयार किये गए “भोपाल विज़न” डॉक्यूमेंट के अनुसार ही भोपाल के सुसंगत विकास में सरकार मदद करे। कमलनाथ जी ने हामी भरी और दिग्विजय सिंह जी ने भोपाल लोकसभा क्षेत्र के विकास की इबारत लिखना शुरू की। भोपाल में मेट्रो ट्रेन चले ये कमलनाथ जी का सपना था लेकिन इस मुहिम को आगे बढाने में दिग्विजय सिंह जी ने अग्रणी भूमिका निभाई।

भोपाल विज़न के एक-एक बिंदुओं पर बड़ी ईमानदारी से काम हुआ। 23 मई 2019 को आए लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से आज तक इस एक साल में दिग्विजय सिंह जी ने भोपाल के लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ जी व अन्य विभाग के मंत्रियों को कई हज़ार चिट्ठियां लिखीं होंगी। भोपाल में सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़क, पानी, बिजली व पुल आदि के लिए सैकड़ों पत्र मुख्यमंत्री जी को लिखे। जिन पर काम भी शुरू हुआ। भोपाल में आई प्राकृतिक आपदा के समय दिग्विजय सिंह जी जनता के साथ खड़े रहे। बाढ़ आने पर रहवासी क्षेत्रों में घुटने-घुटने पानी में चलकर जनता की समस्याओं को सुना और उसका निराकरण करवाया। कोरोना जैसी महामारी में जब हम सब घर में बैठे हैं तो दिग्विजय सिंह जी अपनी टीम के साथ गरीबों और असहाय लोगों की भूख मिटाने के लिए सड़कों पर निकल आए। अभी तक के इस भयावह संकट काल के दौरान करीब 3 लाख भोजन के पैकेट भोपाल के अलग-अलग क्षेत्रों में बंटवाए।

कोरोना संकट में फंसे मज़दूर और छात्रों की आवाज़ उठाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री के साथ निरंतर पत्राचार किया। अपनी और अपने लोगों की जान की परवाह किये बगैर संकट के समर में उतरे दिग्विजय सिंह जी ने जनता की सेवा को ही अपना मूल उद्देश्य बनाया। बड़े महानगरों से अपने घर की ओर पैदल निकले मजदूरों को भोपाल की सीमाओं से लगे बाई पास पहुँचकर अपने हाथों से भोजन व पानी के पैकेट बांटे। दिग्विजय सिंह जी ने भोपाल की जनता की सेवा बड़ी सच्चाई के साथ की है वास्तव में उन्हें ही भोपाल से सांसद चुना जाना चाहिए था।

इस पूरे साल में जनता द्वारा चुनी हुई सांसद प्रज्ञा ठाकुर कहीं दिखाई नही दी। जब कभी जनता के बीच पहुंची भी तो लोगों को दुत्कार दिया, लोगों ने सड़क नाली की समस्या बताई तो कह दिया कि सांसद का काम सड़क नाली बनवाना थोड़ी है। आखिर जनता सवाल क्यों नही करती कि वे सांसद हैं उनका फ़र्ज़ जनता की सेवा करना है और संकट में जनप्रतिनिधि का फ़र्ज़ और बढ़ जाता है। कोरोना महामारी के भयानक संकट में भी वे नही आईं क्योंकि उन्हें फर्क नही पड़ता, क्योंकि उन्हें मालूम है कि जनता विकास और काम के मुद्दे पर वोट नही करेगी। जनता को भगवा रंग दिखाकर, रो-गाकर, झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़कर वोट ली जा सकती है तो फिर क्यों उनके बीच जाकर उनकी समस्याओं से जूझना?

लोकतंत्र की रक्षा करना जनता का भी कर्तव्य है। जनप्रतिनिधि को चुनने में इतनी सावधानी और सतर्कता तो बरतनी चाहिए कि जिसे चुन रहे हैं वो उस योग्य है कि नही? सिर्फ भगवा चोला पहनना जनप्रतिनिधि की पहचान नही हो सकती यदि वो जन भावनाओं को न समझे। जनता के बीच रहकर उन्हें सुनने, समझने और समस्याओं को सुलझाने का माद्दा रखने वाला ही सच्चा जनप्रतिनिधि बन सकता है। इस परिभाषा में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी फिट बैठते हैं। आप उन्हें नकार दीजिये, हरा दीजिये, उनसे नफरत कीजिये लेकिन वे सदैव आपके लिए खड़े रहेंगे और जीवन पर्यंत आपकी लड़ाई लड़ेंगे, ये मेरा दावा है। नर्मदे हर।

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