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जोगी से विद्याचरण ने वादा किया था, बाद में निभाया नहीं

वरिष्ठ पत्रकार संजीव आचार्य

बात 1980 के लोकसभा चुनाव की है। उस समय अजीत जोगी कलक्टर थे। विद्याचरण शुक्ल का नामांकन आया। उस समय किस्सा कुर्सी का जैसे कई मामले अदालत में चल रहे थे। रिटर्निंग अफसर यानी कलक्टर पर राजनीतिक दबाव था कि उनका नामांकन रदद कर दिया जाए।

अजीत जोगी ने कानून की बहुत सी किताबें पढ़ने के बाद जो निर्णय लिया वह विद्याचरण शुक्ल के पक्ष में गया। एक शादी समारोह में विद्याचरण शुक्ल मिले। उन्होंने कहा, मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूं अजीत। कभी आवश्यकता पड़े तो इस एहसान का बदला चुकाना चाहूंगा। एक दशक बाद इसका मौका आ गया। अजीत जोगी भी राजनीति में आए थे।

1992 में अजीत जोगी की राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा था। मध्यप्रदेश से एक सीट ही कांग्रेस उम्मीदवार को मिलने वाली थी। नरसिम्हा राव उस समय प्रधानमंत्री थे और अर्जुन सिंह से घनिष्ठता की वजह से अजीत जोगी राव विरोधी खेमे के प्रमुख सांसदों में से एक थे। ऐसे में राव उनको दोबारा राज्यसभा भेजे जाने के पक्ष में नहीं थे। जोगी ने विद्याचरण शुक्ला को उनका वादा याद दिलाकर मदद मांगी।

कुशाग्र विद्याचरण शुक्ल ने छूटते ही कहा, वह वादा तो उन्होंने ब्यूरोक्रेट अजीत जोगी से किया था, न कि सांसद अथवा पॉलिटिशियन अजीत जोगी से। अब इस वादे को निभाना असंभव है। सवाल ही नहीं उठता। इसके बाद नरसिंहराव के मित्र और वरिष्ठ नेता देवेंद्र द्विवेदी ने अजीत जोगी की जोरदार पैरवी की। उन्होंने राव से कहा कि -“जब अजीत राजनीति में आये तो अर्जुन सिंह जी मुख्यमंत्री थे। आप खुद ही बताइये, जोगी उनके साथ नहीं तो किसके साथ रहते? अब सिर्फ इसलिए एक योग्य और दिमागदार व्यक्ति के साथ अन्याय करना ठीक नहीं है।”

जोगी फिर से राज्यसभा के लिए प्रत्याशी घोषित हुए। निर्वाचित होने के बाद वो राव के समर्थक जरूर हो गए लेकिन कभी अर्जुन सिंह के लिये विरोधी बात नहीं कही।