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न भय न लोभ सिर्फ महाकाल

कोरोना के शुरुआती दौर की बात है, जब संक्रमण के लिए मरकज को ही दोषी ठहराया जा रहा था। इंदौर के एक इलाके में खूब सारे नोट बिखरे मिले। हालत यह हुई कि नोटों के लिए दिन-रात भागते लोग, उन्हें चप्पल सहित पैर से भी छूने को तैयार नहीं हुए। बड़ी सी लकड़ी से उन्हें इधर-उधर खिसका कर साइड में करते रहे। उन पर पत्थर रख दिए ताकि प्रशासन की टीम आकर उन्हें देख सके। कहानी का सार यह है कि माया के पीछे लोग भागते जरूर हैं, लेकिन जैसे ही प्राणों का संकट दिख जाए तो उससे पल्ला झाड़ने में भी देर नहीं करते।

दूसरी कई कहानियों या जनश्रुतियों का जोड़ है। बचपन में सुना था कि जब दूरदर्शन पर रामायण आती थी तो लोग टीवी पर हार-फूल चढ़ाते थे। आरती उतारते और उसी श्रद्धाभाव से प्रसारण देखते गोया सच में ही राम और सीता उनके सम्मुख उपस्थित हों। ऐसा एक-दो नहीं बल्कि कई गांवों-शहरों में लगातार दोहराया गया। हर हफ्ते ही कहीं न कहीं से ऐसा कोई किस्सा कानों में पड़ जाता था। यह श्रद्धा का एक अलग रूप था, जिसने टीवी, जिसे उन दिनों बुद्धू बक्सा कहा जाता था, उसे भी कुछ समय के लिए पूजनीय बना दिया था।

इन दो कहानियों काे कहने का मकसद बताता हूं, दरअसल आज महाकाल की शाही सवारी थी। वही जिसका इंतजार लोग उसके अगले दिन से ही करने लगते हैं। हाथी-घोड़ों, बैंड-बाजों, झांकी-अखाड़ों और भक्तों के सैलाब से सजा-धजा महाकाल के नगर भ्रमण का महोत्सव। कोरोना के कारण इस बार बेहद सादगी से भरा था। छोटा सा रास्ता, सीमित संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति और बिना किसी अतिरिक्त तामझाम के यह कारवां मंदिर से रामघाट और फिर वापस मंदिर पहुंच गया। तय तो यही था कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाएगा, भीड़ नहीं होने दी जाएगी और भी न जाने क्या-क्या।

लेकिन टीवी पर इसका सीधा प्रसारण देखते हुए मैंने पाया कि लोग कोरोना के डर के बावजूद महाकाल की एक झलक पाने के लिए उतने ही उतावले नजर आए, जितने वे हमेशा हुआ करते थे। एक-दो लोग तो बैरिकेंडिंग छोड़कर सवारी में शामिल होने की कोशिश करते नजर आए। महाकाल की कृपा के साथ उन पर पुलिस की कृपा भी बरसी। बावजूद इसके उनके चेहरे पर कोई शिकवा-शिकायत नजर नहीं आई। वे पुलिस की मार झेलने के बाद भी वापस वैसे ही नत भाव से खड़े हो गए। चेहरे पर समीप से दर्शन करने का विजय भाव भी दमक उठा। हालांकि इतना जरूर है कि इस बार सावन और भादौ मिलाकर पांच सवारियां उन रास्तों पर जरूर भारी गुजरीं, जिनसे हर साल महाकाल गुजरते थे। इस बार उनके हिस्से में सिर्फ इंतजार आया है।

इधर, रामघाट पर कोरोना की वर्जनाएं टूटना ही थी। पूजा-अर्चना के बीच लोग बहुत करीब खड़े थे। सबका मकसद महाकाल की कृपा प्रसाद था। जिसमें सबसे बड़ा भरोसा यही कि उनके रहते कोरोना तो क्या संसार की कोई भी विपदा उन्हें छू भी नहीं सकती। आस्था का यही चमत्कार है कि वह आपके भीतर इतना साहस भर देती है कि फिर आप बड़े से बड़े जोखिम उठाने को भी तैयार हो जाते हैं। अगर भगवान नहीं होते वहां तो शायद ही कोई सिर्फ वादियां देखने वहां तक जाता। ऐसी ही स्थिति अमरनाथ स्थित बाकी दुर्गम तीर्थों की है। श्रद्धा की डोर पकड़ कर बुजुर्ग और बच्चे तक वहां पहुंच जाते हैं।

शाही सवारी के प्रसारण के बीच-बीच में कुछ क्लिपिंग भी आ रही थी। दुनिया के अलग-अलग देशों में जो भक्त सवारी का प्रसारण देख रहे थे, वे अपने वीडियो बनाकर भेज रहे थे। कोई आस्ट्रेलिया में परिवार के साथ था तो कोई कैलिफोर्निया, लंदन आदि जगह पर अपने घर से ही बाबा के दर्शन कर रहा था। इन सबके बीच फिर वही दृश्य उभरे। एक परिवार ने एलईडी को फूलों की माला पहनाई, सजी थाल से आरती की और जयकारे लगाए। यानी धर्मचक्र फिर घूमकर 30 साल पीछे पहुंच गया। आस्था के वे ही क्षण आनंद से भर गए।

आस्था का अपना विज्ञान, साहित्य और दर्शन है। यहां न माया है, न भय है और न ही किसी तरह के लौकिक संकोच और झिझक हैं। वह अपनी दुनिया खुद बनाती है। जिसमें पहुंचकर फिर किसी और बात का भान नहीं रहता। इसका आनंद ही ऐसा है, जो बार-बार आमंत्रित करता है, सबकुछ छोड़कर उसमें डूबने को विवश करता है। कोरोना के दौर भगवान महाकल की शाही सवारी ने बरसों से जमे इस विश्वास को फिर पुष्ट किया है। इस पर मुहर लगाई है। जय श्री महाकाल
अमितमंडलोई

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