एमपी कांग्रेस ने निजी स्कूलों पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। प्रदेश प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि निजी स्कूल अभिभावकों को महंगी किताबें और यूनिफॉर्म अपनी पसंदीदा दुकानों से खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इस मुद्दे को उठाते हुए त्रिपाठी ने मुख्य सचिव अनुराग जैन को पीले चावल के साथ एक पत्र भेजा है। उन्होंने पत्र के माध्यम से सभी जिलों के कलेक्टरों को निर्देश जारी कर निजी स्कूलों की अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।
कांग्रेस ने सरकार के सामने रखी यह मांगे
- स्कूलों द्वारा अभिभावकों को चुनिंदा दुकानों से खरीदारी के लिए बाध्य करने पर प्रतिबंध लगाया जाए और इस पर कड़ी कार्रवाई हो। साथ ही, जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा किताबों की सूची तुरंत पोर्टल पर प्रकाशित की जाए।
- कांग्रेस का आग्रह है कि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत गरीब बच्चों को अनिवार्य रूप से प्रवेश दिया जाए और इसके प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी सुनिश्चित की जाए। इसके लिए जिला एवं राज्य स्तर पर उपयुक्त शिकायत निवारण प्रकोष्ठ स्थापित किए जाएं।
- पहली कक्षा से ही NCERT की किताबों को अनिवार्य किया जाए, जबकि नर्सरी, केजी-1 और केजी-2 की किताबों में पांच वर्षों तक कोई बदलाव न किया जाए। इससे अभिभावकों पर बार-बार महंगी किताबों का आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।
- जिला कलेक्टर कार्यालय में शिक्षा से जुड़ी शिकायतों के निवारण के लिए एक विशेष दिन जनसुनवाई आयोजित की जाए।
- फीस में मनमानी बढ़ोतरी करने वाले स्कूलों पर सख्त कार्रवाई की जाए और 10% वृद्धि सीमा के नियम को सख्ती से लागू किया जाए।
पीले चावल देकर जताई नाराजगी
विवेक त्रिपाठी ने मुख्य सचिव अनुराग जैन को पीले चावल के साथ एक स्मरण पत्र भेजकर प्रतीकात्मक रूप से सरकार को चेतावनी दी कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो कांग्रेस पूरे प्रदेश में व्यापक आंदोलन करेगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि समाज का अधिकार है, और इसके व्यवसायीकरण का हम पूरी ताकत से विरोध करेंगे। कांग्रेस हर स्तर पर छात्रों और अभिभावकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी।

RTE नियमों का पालन नहीं कर रहे निजी स्कूल
विवेक त्रिपाठी ने कहा कि कांग्रेस लगातार निजी स्कूलों द्वारा की जा रही अनुचित शुल्क वसूली, महंगे निजी प्रकाशनों की पुस्तकों को अनिवार्य करने और आरटीई नियमों के उल्लंघन जैसी गंभीर समस्याओं को उजागर करती रही है। इन मुद्दों को लेकर शासन और प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को बार-बार शिकायतें दी गई हैं, लेकिन शिक्षा माफियाओं के दबाव में वे कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। इस लापरवाही के कारण मध्यप्रदेश के पीड़ित अभिभावकों में गहरा आक्रोश है।