मध्य प्रदेश

मजदूरों के लिए 16 दिन में खर्च किए आधा करोड़ रुपए

भूख से तड़प रहे बच्चे को देखकर बिस्कुट बांटना शुरू किए थे। पहली मई की दोपहर थी, युवा उद्योगपति अनूप अग्रवाल अपने घर से बायपास की ओर जा रहे थे। जैसे ही बायपास पर पहुंचे तो देखा कि हजारों की संख्या में लोग पैदल चले जा रहे हैं। मजदूरों के बच्चे भूख से तड़प रहे हैं उनके पास पानी तक नहीं है। तत्काल वो घर पहुंचे। पहले तो पानी भरकर ले आए, फिर बिस्कुट का इंतजाम किया और बायपास पर पहुंच गए।

थोड़ा पानी और पांच सौ बिस्कुट के पैकेट खत्म होने में कुछ मिनट भी नहीं लगे। उसके बाद उनसे रहा नहीं गया और फिर वो अपनी टाउनशिप न्यू यॉर्क सिटी पहुंचे, वहां मौजूद अपने स्टाफ को साथ में लेकर सामान लेने निकल पड़े। बिस्कुट, चॉकलेट, पानी की बोतलें, सेंव के पैकेट बांटना शुरू किए। उसके बाद क्रेडाई एसोसिएशन के वॉट्स-एप ग्रुप पर मैसेज डाला कि हजारों मजदूर बायपास से गुजर रहे हैं, पैरों में इनके छाले पड़ गए हैं, भूख से तड़प रहे हैं, हम सबको बड़ा काम करना चाहिए। लगभग सत्तर बिल्डर, कालोनाइजर क्रेडाई में हैं। सबने फिर मजदूरों की मदद करने का फैसला किया और उसके बाद न्यू यॉर्क सिटी के बाहर भोजन बनाना शुरू किया।

अनूप अग्रवाल के साथ फिर सब जुड़ते गए। मजदूरों को सेंव-परमल, बिस्कुट के पैकेट, पानी की बोतलें, सोहन पपड़ी, तरबूज, केले, खरबूजा देना शुरू किया। 2 मई से चल रहा सिलसिला लगातार जारी है। गोडाउन में माल भर दिया। 25 कर्मचारियों की ड्यूटी लगा दी। अनूप अग्रवाल सुबह दस बजे वहां पहुंच जाते हैं और रात तीन बजे तक घर आते हैं। अनूप बताते हैं कि शुरुआत के तीन दिनों में ही कम से कम चार लाख मजदूर यहां से गुजरे होंगे। अब ये संख्या कम होती जा रही है। दो-तीन दिन से सरकार इन्हें बसों में बैठाकर ले जा रही है।

हालांकि अभी भी कई मजदूर पैदल जा रहे हैं। हम ट्रक, रिक्शा और बसें रोककर सबको खाना दे रहे हैं, नाश्ता भी दे रहे हैं। खाना यहां मजदूर खाते हैं और मांगते हैं तो पैक करके देते हैं। मजदूरों की भीड़ इतनी ज्यादा हो गई थी कि न्यू यॉर्क सिटी के बाहर माइक सिस्टम लगाना पड़ा था। क्रेडाई एसोसिएशन के सहयोग से अभी तक पचास लाख रुपए से ज्यादा का खर्च सामान लाने पर हुआ है। ये सिलसिला लॉक-डाउन तक चलता रहेगा। वो कहते हैं कि मजदूरों के हालात देखकर कई बार आंसू आ जाते हैं। नंगे पैर जाते मजदूरों और उनके बच्चों को चप्पल-जूते भी पहनाए। जो मदद हो सकती थी वो की। ग्लूकोज, इलेक्ट्रॉल और कुछ दवाइयां भी बांटी।
राजेश राठौर

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