GIS 2025: मेहमानों को उपहार में मिलेगी भारतीय कला की अनमोल कृति, जानिए कौन हैं शाल भंजिका ? कहलाती हैं इंडियन मोनालिसा

ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दौरान मध्य प्रदेश सरकार 70 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेहमानों को विशेष उपहार स्वरूप ‘इंडियन मोनालिसा’ कही जाने वाली शाल-भंजिका की पत्थर से बनी प्रतिकृति भेंट करेगी। इस अनूठी कृति का निर्माण राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा की 15 सदस्यीय टीम कर रही है।

Abhishek Singh
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भोपाल में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दौरान 70 प्रमुख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेहमानों को मध्य प्रदेश सरकार की ओर से विशेष उपहार प्रदान किया जाएगा। अतिथियों को ‘इंडियन मोनालिसा’ के रूप में प्रसिद्ध शाल-भंजिका की पत्थर से बनी प्रतिकृति भेंट की जाएगी। इस अनूठी कृति के निर्माण में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अंतरराष्ट्रीय मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा के नेतृत्व में 15 सदस्यीय टीम लगातार सात दिनों तक कार्य कर रही है।

भोपाल में 24-25 फरवरी को ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS) का आयोजन किया जाएगा। समिट में शामिल होने वाले मेहमानों को विदाई के अवसर पर एक विशेष स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में सभी अतिथियों को ‘इंडियन मोनालिसा’ के रूप में प्रसिद्ध शाल-भंजिका की पत्थर से बनी प्रतिकृति भेंट की जाएगी।

ग्वालियर के मोती महल परिसर स्थित रीजनल आर्ट एंड क्राफ्ट डिजाइन सेंटर में शाल-भंजिका की प्रतिकृतियों का निर्माण किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा अपनी 15 सदस्यीय टीम के साथ लगातार 24 घंटे कार्य कर रहे हैं। ग्वालियर मिंट स्टोन से सात दिनों में 7 इंच लंबी 70 प्रतिकृतियां तैयार की जाएंगी, जिसकी स्थायित्व अवधि 1000 से अधिक वर्ष मानी जाती है।

दीपक विश्वकर्मा के अनुसार, शाल-भंजिका की प्रतिकृति में उसकी मुस्कान को विशेष रूप से उकेरने पर ध्यान दिया जा रहा है, जिस पर अत्यंत बारीकी से काम किया जा रहा है। उन्होंने इसे अपने लिए गर्व की बात बताया कि देश-विदेश के मेहमानों को ग्वालियर में निर्मित शाल-भंजिका भेंट की जाएगी, जिससे ‘इंडियन मोनालिसा’ के रूप में इसकी पहचान वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रचारित होगी।

शाल-भंजिका, भारतीय कला की अनमोल धरोहर

ग्वालियर के गुजरी महल संग्रहालय में रखी गई “शाल-भंजिका” की प्रतिमा अपने अद्भुत सौंदर्य और मोहक मुस्कान के कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा प्राप्त कर चुकी है। यह प्रतिमा विदिशा के पास स्थित ग्यारसपुर गांव में खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। पत्थर से निर्मित होने के बावजूद, इसकी मुस्कान इतनी जीवंत प्रतीत होती है कि इसे “इंडियन मोनालिसा” कहा जाता है। 10वीं शताब्दी की इस दुर्लभ मूर्ति को पहले विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भेजा जाता था, लेकिन सुरक्षा कारणों से पिछले 15 वर्षों से विदेश में इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है। यह मूर्ति कई वैश्विक मंचों पर भारतीय कला और संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर चुकी है।