राजधानी भोपाल समेत पूरे प्रदेश के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के 15,000 से अधिक डॉक्टरों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पहले दिन, डॉक्टरों ने कार्यस्थल पर काली पट्टी बांधकर अपना आक्रोश जताया। दरअसल, विभिन्न मांगों को लेकर सरकारी डॉक्टरों ने एकजुट होकर आंदोलन तेज करने का निर्णय लिया है।
मांगे नहीं मानी तो और तेज़ होगा विरोध
आंदोलन की शुरुआत राजधानी भोपाल के हमीदिया अस्पताल के ब्लॉक-2 के सामने हुई, जहां डॉक्टरों ने विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में मेडिकल ऑफिसर्स, चिकित्सा शिक्षक, वरिष्ठ चिकित्सक और जूनियर डॉक्टर शामिल रहे।

चिकित्सक महासंघ की प्रमुख मांगों में उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित उच्च स्तरीय समिति का गठन, कैबिनेट से पारित DACP और NPA का उचित क्रियान्वयन, सातवें वेतनमान का वास्तविक लाभ और चिकित्सा क्षेत्र में प्रशासनिक हस्तक्षेप को रोकना शामिल हैं। डॉक्टरों ने सरकार से जल्द निर्णय लेने की मांग की है, अन्यथा आंदोलन और तेज करने की चेतावनी दी है।
पुरानी मांगों के निपटारे की मांग
चिकित्सक महासंघ के मुख्य संयोजक डॉ. राकेश मालवीया ने बताया कि यह आंदोलन प्रदेशभर के 52 जिला अस्पतालों, कम्युनिटी अस्पतालों, सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों द्वारा किया जा रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रदर्शन किसी नई मांग के लिए नहीं, बल्कि लंबित मांगों को पूरा कराने के लिए हो रहा है। कई मांगों पर उच्च न्यायालय के आदेश भी जारी हो चुके हैं, लेकिन अब तक उनका क्रियान्वयन नहीं हुआ है। इसके अलावा, कैबिनेट से पारित DACP का भी डॉक्टरों को पूरा लाभ नहीं मिला है।
डॉ. मालवीया ने सरकार से शीघ्र निर्णय लेने और संबंधित आदेश जारी करने की अपील की, ताकि यह आंदोलन समाप्त हो सके। उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य केवल न्याय पाना है, आंदोलन करना नहीं।”
इन कारणों से कर रहे विरोध
चिकित्सक महासंघ के अध्यक्ष डॉ. राकेश मालवीय ने कहा कि मध्य प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी तय समय सीमा समाप्त होने के बावजूद हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं और उच्च स्तरीय समिति का पुनर्गठन भी नहीं किया गया है।
उन्होंने बताया कि पिछली उच्च स्तरीय समिति के निर्णयों को मंत्री परिषद ने मंजूरी देने के 17 महीने बाद भी कैबिनेट के आदेशों को लागू नहीं किया गया है, न ही विभागीय आदेश जारी कर उनका क्रियान्वयन किया जा रहा है।
इसके अलावा, कोलकाता की वीभत्स घटना के बाद भी महिला चिकित्सकों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल टास्क फोर्स के दिशानिर्देश अब तक लागू नहीं किए गए हैं। डॉ. मालवीय ने कहा कि इन्हीं कारणों से प्रदेश के चिकित्सकों को एक बार फिर मजबूर होकर आंदोलन करने के लिए विवश होना पड़ा है।