देशमध्य प्रदेश

‘बसों की राजनीति’ में प्रवासी मजदूरों की बेइज्जती…

अजय बोकिल

अपन देश कोरोना के साथ-साथ राजनीति का ग्राफ भी फ्लैदटन (सपाट) होने के बजाए उल्टा और कर्व (तिरछा) होता जा रहा है। जहां मु्ल्क की एक बड़ी आबादी जिंदा रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष कर रही है, वहीं हमारे राजनेता बसों को लेकर राजनीति में मस्त हैं। वो भी इस मुद्दे पर कि प्रवासी मजदूरों को कौन लाए और किस माध्यम से ले जाया जाए। उत्तर प्रदेश में बसों की राजनीति परवान पर है। विपक्षी कांग्रेस और सत्तारूढ़ भाजपा के बीच प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने को लेकर इतनी ज्यादा राजनीतिक चिंता है कि बेबस मजदूर इस तमाशे से ऊबकर फिर पैदल ही घरों को निकल पड़े हैं। मानों बसें न हुईं उस दुल्हन की डोली सी हो गईं, जिसे उठना ही नहीं था। इस पूरे तमाशे को सहानुभूति की आंच पर पकाने की कोशिश हुई और ‍िजसे महीन सियासत की फुंकनी से बुझा दिया गया। यानी ये ऐसी लड़ाई थी, जो सिर्फ एक-दूसरे को नीचा दिखाने और एक-दूसरे की सियासत को बेनकाब करने के मकसद से लड़ी गई और अब मामला एफआईआर तक पहुंच गया है। कोरोना पीरियड में सियासत के ग्राफ को हम बारीकी से देखें तो पहले यह ‘जनता कर्फ्यू’ से शुरू होकर जमातियों तक पहुंचा। फिर इसकी कमान शराबियों की हाथ आई।

वो चेप्टर ढीला पड़ा तो प्रवासी मजदूर फोकस में आए और अभी भी बने हुए हैं। इसकी आख्या न के क्षेपक के रूप में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के लिए कांग्रेस ने ‍िसर्फ उत्तर प्रदेश में खाली बसों का कारवां खड़ा किया। वैसे तो ये यूपी के प्रवासी मजदूरों की घर न पहुंच पाने की पीड़ा से उपजी पहल थी, साथ ही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का योगी सरकार की नाकामी उजागर करने का यह पहला तगड़ा दांव भी था। प्रियंका गांधी ने यूपी में प्रवासी मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए 16 मई को योगी सरकार के सामने कांग्रेस की तरफ से 1 हजार बसों की व्यवस्थाप करने का प्रस्ताव दिया था। इससे चौंकी यूपी की योगी सरकार ने रक्षात्मक खेल खेलते हुए प्रियंका और कांग्रेस से उनके द्वारा भेजी जाने वाली बसों और ड्राइवरों की लिस्ट मांग ली। फिर कहा गया कि बसें राजधानी लखनऊ भेजी जाएं। कांग्रेस ने एक लिस्ट सौंप भी दी। इस पर योगी सरकार ने दावा किया कि जो लिस्ट हमे मिली है, उसमें तो ( बसों के बजाए) उसमें ऑटो रिक्शा, टू व्हीलर और माल ले जाने वाले अन्य वाहनों के नंबर हैं। इसके बाद प्रियंका गांधी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सोशल मीडिया में कहा कि हम नई लिस्ट देने को तैयार हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि 9 सौ बसें यूपी के गाजियाबाद पहुंचा दी गई हैं। अगर ये बसें चल जाएं तो प्रवासी श्रमिक अपने घरों तक पहुंच जाएं। प्रियंका ने दावा किया कि कांग्रेस ने यूपी में अबतक 60 लाख लोगों की मदद की है। इस पर योगी सरकार ने यह कहकर फच्चर मारा कि भेजी गई कई बसों के दस्तावेज ही पूरे नहीं है तो कई बसों में ट्रक, ट्रॉली, बाइक और स्कूटर की नंबर प्लेट लगाई गई है। ऐसे फर्जीवाड़े के बीच बसो को आगे जाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है? इस पर प्रियंका ने नसीहत के अंदाज में कहा कि हमे इस वक्त राजनीति से परहेज करना चाहिए हमारी पेशकश केवल मदद के लिए है, इसमें सेवा भाव ‍निहित है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर यूपी सरकार को भाजपा के झंडे-बैनर और पोस्टर लगा के बसें चलानी हैं, तो चलाएं। लेकिन मजदूरों की खातिर बसें तो चलने दें। आशय यह था कि भाजपा अगर इस मजदूर वापसी का राजनीतिक लाभ लेना चाहती है तो ले ले। पर मजदूरों को घर तक तो जाने दे। उधर कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया कि यूपी सरकार बिना कारण बसों को रोके हुए है जबकि बीजेपी का कहना है कि फर्जी बसों को चलने देना गैर कानूनी होगा। और तो और योगी सरकार ने बसों के बारे में गलत जानकारियां उपलब्ध कराने के आरोप में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और प्रियंका गांधी के सचिव के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर की और अजय कुमार को हिरासत में भी लिया गया।

उधर बसें हैं कि जहां के तहां खड़ी हैं। इस बीच भाजपा और कांग्रेस दोनो ने एक-दूसरे पर राजनीति करने के आरोप लगाए। जबकि वास्तव में दोनो यही कर रहे थे। कांग्रेस उत्तर प्रदेश के मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए बेताब थी तो भाजपा नहीं चाहती कि कांग्रेस को इसका कोई राजनीतिक क्रेडिट मिले। बीजेपी के राज्य प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने फ़र्जीवाड़ा किया है और सरकार ऐसी बसों में मज़दूरों को बैठाकर उनकी सुरक्षा को ख़तरे में नहीं डाल सकती है।

अब प्रवासी मजदूरों की प्रायोजित बसों के जरिए यूपी में घर तक प्रवास की हकीकत समझें। प्रवासी मजदूर, वे चाहें रेलगाडि़यों से लाए जा रहे हों अथवा बसों से या अन्य किसी साधन से, उन्हें एक निश्चित जगह पर लाकर छोड़ा जा रहा है। अपने गांव या घर तक पहुंचाने की कोई ठीक व्यवस्था नहीं है। लाॅक डाउन में पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद हैं। ऐसे में ज्यादातर मजदूर तो पैदल चलकर ही घर पहुंचने के लिए मजबूर हैं। यूपी उन राज्यों में है, जो मजदूर निर्यातक प्रदेश है। ऐसे में वहां बड़ी तादाद में मजदूरों का गृह राज्य लौटना स्वाभाविक है। इसकी सरकारी स्तर पर शुरूआत भी सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ही की थी। लेकिन छोटे गांवों तक उन्हें पहुंचाने की व्यवस्था वहां भी नहीं है। तब भी इस पर सियासत हुई थी। कई राज्यों ने पहले तो इन मजदूरों को अपनी गाडि़यों से घरों तक पहुंचाने से इंकार किया, लेकिन जब मामला उछलने लगा तो अलग-अलग राज्यों ने बसों की व्यवस्था की

इस घर वापसी अभियान के महिना भर बाद कांग्रेस को ध्यान आया कि यूपी में तो मजदूर फंसे पड़े हैं। उन्हें घर पहुंचाना जरूरी है। वैसे भी घर तक वो मजदूर ही पहुंच पा रहे हैं, जिन्हें अपने पैरों पर ज्यादा भरोसा है। । ऐसे में अचानक प्रियंका गांधी को यूपी के मजदूरों की याद आ जाना दरअसल कोरोना काल में सिलेक्टिव सहानुभूति का ही नमूना है। क्योंकि यूपी से ज्यादा परेशान तो उस महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूर हैं, जिनके लिए राज्य सरकार कोई ठीक से व्यवस्था नहीं कर पा रही है और जहां कांग्रेस सत्ता में भागीदार है। अगर कांग्रेस को यूपी में योगी सरकार को प्रवासी मजदूरों के प्रतिक बेदर्द ही साबित करना है तो पहले महाराष्ट्र में फंसे मजदूरो को तो गंतव्य तक पहुंचाए। उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रवासी मजदूर वापसी को लेकर दोनो पार्टियों पर घिनौनी राजनीति करने का आरोप लगाया तो सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा पहले बीजेपी सरकार अपने फिटनेस का सर्टिफिकेट तो दे।

प्रवासी मजदूरों के लिए राज्य बसें चलाए न चलाए, कांग्रेस सिर्फ यूपी को ही पकड़े बैठी रहे, योगी सरकार बसों को हिलने न दे या हिलने दे, इन सब मातों से उन प्रवासी मजदूरो के पैरों के छालों पर कोई मरहम नहीं लग रहा, जिसकी आज पहली जरूरत है। अफसोस इस बात का है कि इन बेहाल मजदूरों के प्रति सहानुभूति भी सत्ता की अनुकूलता और राजनीतिक सुभीते के हिसाब से प्रकट हो रही है। यह कोरोना काल का बड़ा राजनीतिक मजाक है और प्रवासी मजदूरों की मजबूरी का अपमान भी है। रहा सवाल मजदूरों को ढोने वाली बसों पर भाजपा के झंडे-बैनर लगाने का तो मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार ने कोरोना के इलाज के लिए आयुर्वेदिक त्रिकटु चूर्ण के लाखों पैकेट भी मोदी और शिवराज के फोटो लगाकर बांट दिए। अब इसमें ‍तीसरा राजनीतिक ‘कटु’ कौन है, यह मप्रवासी अभी तक समझ नहीं पाए हैं।

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