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भारत में चीनी कंपनियों की जड़े है काफी मज़बूत

भारत और चीन के बीच लद्दाख के गलवान में चल रहे टकराव ने एक बार फिर भारत में चीनी कंपनियों के बिजनेस को लेकर चर्चायें शुरु हो गई है। चीन के लिए भारत एक बहुत बड़े बाजार है।हलाकि दोनों देशों की विशाल आबादी के कारण एक बहुत बड़ा कंज्यूमर बेस है। भारत में चीनी उत्पादों की संख्या बहुत ज्यादा हैं | दरअसल, चीन की कंपनियों के सस्ते उत्पादों के कारन चीन ने भारत मे अपनी जेड बहुत मजबूत और फैली हुई बना ली है जिसके कारन उन्हें उखाड़ पाना बेहद मुश्किल है| हलाकि चीनी कंपनियां भी भारत में अपना निवेश कर रही है लेकिन जितना भारत चीनी कंपनी में निवेश करता है उससे बेहद काम चीन भारत की कंपनियों में निवेश करता है|
हालांकि, चीन का भारत में आक्रमण देख भारतीय जनता चीनी सामानो का बहिष्कार कर रही और साथ ही चीनी उत्पादों को जलाकर प्रदर्शन भी कर रही है| साथ ही कुछ दिन पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण मे भारतीय जनता को लोकल सामान को ज्यादा खरीदने के लिए कहा था| बहरत सर्कार भी अपने बाजार को एक हतियार की तरह इस्तेमाल करने की सोच रहा है|
चीनी कंपनियों के बंद करने और बहिष्कार करने के सवाल पर सीएनआई रिसर्च के सीएमडी, किशोर ओस्तवाल का कहना है कि भारत किसी भी देश का इंपोर्ट या अन्य बिजनेस को बंद नहीं कर सकता। इसका कारण विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) है। डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, किसी देश की सरकार आयात या बिजनेस को बंद नहीं कर सकती। अगर ऐसा होता है तो फिर चीन भारत के व्यापार को रोकेगा। ऐसे में ग्लोबलाइजेशन ही खत्म हो जाएगा। हमारे प्रधानमंत्री ने जो कहा, वह लोग समझ नही नहीं पाए। उन्होंने कहा था कि देश आत्मनिर्भर बने। उन्होंने बहिष्कार की बात नहीं की।
वही प्रधानमंत्री का कहना है कि आत्मनिर्भर का मतलब यह है कि आप अपने से किसी चीज का बहिष्कार कर सकते हैं। ग्राहक और कंपनी यह दोनों चाहें तो कर सकते हैं लेकिन सरकार नहीं कर सकती। इसलिए यह कंपनियों और जनता को सोचना होगा कि वह किस तरह से चीन के सामानों की खरीदी बंद करे। जैसे बीएसएनल और रेलवे ने कदम उठाया है।
इकोनॉमिस्ट अरुण कुमार का कहना है कि चीन से भारतीय आयात कई तरह का है। पिछले कई सालों से ऐसे अभियान रह-रह के सुनाई पड़ते रहते हैं। इसका असर नहीं होता क्योंकि हमें जो प्रोडक्ट बाजार में 10 रुपए में मिल रहा है, वही चीन 5-6 रुपए में देता है। यह जनता के ऊपर है, चाहे तो सभी प्रोडक्ट का उपयोग बंद कर दे। आधिकारिक तौर पर इस तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। यह डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन होगा। बहिष्कार या बॉयकॉट का पूरा मामला इंडस्ट्री और जनता पर है।