पहचान : मीना सलोनी

ऑफ़िस में बैठी मेरी नज़र मासिक पत्रिका के कवर फोटो पर गई। 'यह तो आहाना है,शिवानी की बेटी!'

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pehchan

ऑफ़िस में बैठी मेरी नज़र मासिक पत्रिका के कवर फोटो पर गई।
‘यह तो आहाना है,शिवानी की बेटी!’

आहाना की इंटरव्यू इस पत्रिका में छपी थी। अपनी माँ की तरह ही बेहद तीक्ष्ण बुद्धि एवं दृढ़ शक्ति की मिसाल थी आहाना और आज उसी आत्मविश्वास के साथ व्यावसायिक जगत में वह अपनी पहचान की ध्वजा लहरा चुकी थी।

इंटरव्यू के इस प्रश्न पर कि आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देंगी, आहाना के उत्तर ने मुझे हतप्रभ कर दिया था-
‘मेरी माँ मेरी हिम्मत, मेरा आत्मविश्वास है। बचपन की एक दुर्घटना से जब मेरी आधी श्रवण शक्ती जाती रही तब मेरी माँ ने किस्मत से लड़ने का प्रण
लिया था । इसी क्रम में मेरे साथ उसे भी कई अपने, परायों के तीखें शब्द बाण एवं रूखे व्यव्हार का सामना करना पड़ा। मेरे भविष्य को लेकर जहाँ सभी आशंकित थे, माँ ने पग-पग पर एक कुशल शिल्पकार की भाँति छेनी और हथोड़े की दृढ़ शक्ती और अनुशासन से मेरे व्यक्तित्व की हर छोटी-बड़ी पहलू को गढ़ती, संवारती रही। जहाँ सभी अपनी पहचान बनाने की होड़ में थे, माँ मेरे भविष्य को आकार दे, साकार करने में लगी रही। अपने सपनों के पंख देकर मुझे ऊँची उड़ान भरने का हौसला देती रही।

पत्रिका लेकर मैं स्तब्ध ,शिवानी के घर की ओर निकल पड़ी।
‘तूने पढ़-लिखकर भी अपनी जिन्दगी को घर, पति-बच्चों में ही झोंक दिया। क्या रह गई तुम्हारी पहचान? क्या ऐसी ही जिन्दगी चाही थी तूने?’ कितनी बार मैंने ताना देते हुए उसे कहा था।

ख्यालों के बादलों के बीच आज शिवानी का चमकता सूरज सा चेहरा सामने दिख रहा था और उसके चमक से मेरी आँखें चौंधिया रही थी। शायद मातृशक्ति का प्रकाश इतना ही दिव्य होता है। हम अपनी सीमित दृष्टिकोण से कितनी जल्दी दूसरे के प्रति राय रचकर उसे सच्चाई का जामा पहना देते हैं। शिवानी मेरी बचपन की सबसे अभिन्न सहेली थी पर आज मेरे अभिन्न होने का दंभ चकनाचूर हो गया था। यह उसका कुशल परवरिश ही था जो मुझे कभी आहाना के दिव्यांग होने का भान नही होने दिया।

घर पहुँचते ही मेरे हाथ में पत्रिका देख व चेहरे का भाव पढ़कर शिवानी बोली, “जानती हो करुणा, मैं आहाना को सामान्य दुनिया के लिये तैयार करती रही कि कहीं वह अपनों की हमदर्दी और परायों की बेदर्दी के असर से अपने लक्ष्य से ना भटक जाये। मुझे उसका टूटना-बिखरना मंजूर नहीं था। मैं आज गर्व से कहती हूँ ,आहाना ही मेरी सच्ची पहचान हैं”, कहते हुए उसका गला रून्ध गया।

मैं भी आंसुओं से अपनी शर्मिंदगी को धोने की नाकाम कोशिश करते हुए बोली, “मुझे माफ़ कर दो शिवानी।”