साहब की छुट्टी

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mukesh nema

साहब होने के वैसे तो कई फ़ायदे है ! मनचाही छुट्टी मनाना उनमें से एक है ! वैसे छुट्टी तो हर सरकारी बंदा मनाता ही है पर साहब को छुट्टियाँ मनाती हैं ! किसी भी ऐसे दिन जब बादल छाये हों ,चटखदार धूप खिली हो या कुनकुनी ठंड पड रही हो ,छुट्टी हाथ जोड़कर निवेदन करती है साहब से कि आप आज ऑफिस ना जाने पर विचार कर लें ! उदारमना साहब आग्रह का कच्चा होता है ! मन रख लेता है छुट्टी का ! ऑफिस जाना मुल्तवी करता है वो ! भरपेट भोजन करता है ,कुर्ता पायजामा पहनता है और अपने डबलबैड पर औंधा लेट कर टीवी देखता है !

साहब सरकारी कैलेंडर मे लगे लाल नीले गोलों का मोहताज नही होता ! खुदा ने यह ताक़त तो ईसवी कैलेन्डर बनाने वाले को भी नही बख़्शी ! साहब जिस किसी दिन वो ऑफिस नही जाना चाहता वो दिन साहब के हुकुम के मुताबिक संडे हो जाता है !
ऑफिस जाना या ना जाना ! कब जाना और कब लौट आना ये साहब के मूड पर निर्भर होता है ! अपने ऑफिस का बडा साहब होना उसे यह मूड बनाने का अधिकार देता है ! और यही अधिकार उसे बाबुओं से अलग करता है ! ये वाली छुट्टी लेने के लिये उसे किसी को एप्लीकेशन नही देनी होती ! महँगाई की ही तरह उसकी छुट्टियाँ कभी ख़त्म नही होती !

साहब कब छुट्टी मनाने के मूड मे आ जाये इसे साफ़ साफ़ बताना तो बहुत मुश्किल है ! मेम साहब को शॉपिंग करना है ! कुत्ता बीमार है ! साले साहब सपरिवार पधारे हैं ! ट्वंटी ट्वंटी मैच है ! बस जाने का मन ही नही है ! क्या करेगे जाकर ! आज करने जैसा कुछ है नही ! शुक्रवार है आज ! सोमवार दुखी कर देता है ! उपकृत लोग साहब से घर पर ही मिलना चाहते हैं ! ज़रूरी फाईले घर भी आ सकती हैं ! जैसे सैकड़ों कारण होते है जो साहब को छुट्टियाँ मनवा देते है !

यदि साहब लगातार तीन चार दिन लगातार ऑफिस चला आये तो बाबू चपरासी सब हैरान हो जाते है ! साहब के इस अप्रत्याशित बर्ताव को लेकर अटकलें लगाने लगते है ! उन्हे साहब और मेम साहब के बीच खटखट हो जाने का अंदेशा होने लगता है ! उन्हे लगने लगता है कि साहब का ट्राँसफर आदेश आया ही चाहता है वग़ैरा वग़ैरा ! साहब इन अफ़वाहों से बचा रहना चाहता है इसलिये छुट्टियाँ मनाता है !

बेमतलब की छुट्टियाँ मनाने वाले साहब मातहतो मे लोकप्रिय होते है ! वो बाबुओं के देरसबेर आने पर झिकझिक नही करता ! मातहत ऐसे ही साहब के अभिलाषी होते है ! ऑफिस ना आने वाला साहब राहत भरा होता है मातहतो के लिये ! सास के घर ना रहने पर बहुयें खुश हो ही जाती है ! हर वर्किग डे पर साढे दस बजे चले आने वाले ,शाम छह बंदे तक अपने चैम्बर मे जमे रहने वाले साहब खड़ूस माने जाते है ! बेवजह छुट्टियाँ मना कर आया साहब ज्यादा खुशमिजाज ,और उदार हो जाता है ! साहब लोकप्रिय होना चाहता है इसलिये छुट्टियाँ मनाता रहता है !

अब यह भली पूछी आपने की साहब के ऑफिस मे ना आने पर जनता जनार्दन का क्या होगा ! क्या होगा ? कुछ नही होगा ! सरकारी दफ्तर स्किन स्पेशलिस्ट के क्लिनिक की तरह होते है ! डॉक्टर की गैरहाजरी कभी किसी मरीज़ के लिये जानलेवा नही होती ! मरीज खुजली करता आता है और खुजली करता ही वापस हो लेता है ! पब्लिक धैर्यवान होती है ! साहब के ऑफिस मे ना होने पर हल्ला नही मचाती ! साहब के कल आने की उम्मीद मे लौट ही जाती है !

साहब भी जानता है ये बात और इत्मिनान से वैसी वाली बहुत सी छुट्टियाँ भी मनाता रहता है जो सरकारी कैलेन्डर मे दर्ज नही होती !