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ईश्वर दिखाई नहीं देता पर तुम उसे अनुभव कर सकते हो।

Posted on: 19 Jun 2018 04:52 by shilpa
ईश्वर दिखाई नहीं देता पर तुम उसे अनुभव कर सकते हो।

नई दिल्ली : भगवान सर्वत्र है। कण-कण में ,हमारे आसपास ,सब जगह ।… अगर है तो दिखता क्यों नहीं देता ? और हमारे आसपास है तो हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते है ?… संत नामदेव ने अपने भक्तों की शंकाओं का निरसन करने के लिए बहुत सुंदर उदाहरण इस कहानी से दिया है।

महाराष्ट्र को संतों की भूमि कहा गया है। अनेक बड़े संतों ने वह की भूमि को पवित्र किया है ,ऐसेही एक प्रसिद्ध संत थे जिनका नाम था संत नामदेव। कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटे थे तभी से भगवान की भक्ति में डूबे रहते थे। बाल -काल में ही एक बार उनकी माता ने उन्हें भगवान विठोबा को प्रसाद चढाने के लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ के आगे भगवान को स्वयं प्रसाद ग्रहण करने के लिए आना पड़ा था। ऐसी एक नहीं अनेक कथाएँ वह प्रसिद्ध है। आज हम संत नामदेव से संबधित एक प्रसंग बता रहे है।

एक बार संत नामदेव अपने शिष्यों को ज्ञान -भक्ति का प्रवचन दे रहे थे। तभी श्रोताओं में बैठे किसी शिष्य ने एक प्रश्न किया , ” गुरुवर , हमें बताया जाता है कि ईश्वर हर जगह पर मौजूद है , पर यदि ऐसा है तो वो हमें कभी दिखाई क्यों नहीं देता , हम कैसे मान लें कि वो सचमुच हमरे आस पास ही है , और यदि वो है तो हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?”

संत नामदेव जटिल ज्ञान को सामान्य भाषा में उदाहरण दे के समजाते थे ताकि सामान्य लोगों तक उनकी बात पहुँच सके। भक्त के प्रश्न के बाद नामदेव मुस्कुराये और एक शिष्य को एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने का आदेश दिया। शिष्य तुरंत दोनों चीजें लेकर आ गया।

वहा बैठे भक्तजन और शिष्य सोच रहे थे की भगवान का का भला इन चीजों से क्या सम्बन्ध तभी संत नामदेव ने पुनः उस शिष्य से कहा ,
” पुत्र , तुम नमक को लोटे में डाल कर मिला दो।” शिष्य ने ठीक वैसा ही किया।

संत बोले , ” अब बताइये , क्या इस पानी में किसी को नमक दिखाई दे रहा है ?”

“ठीक है !, अब कोई ज़रा इसे चख कर देखे , क्या चखने पर नमक का स्वाद आ रहा है ?”, संत ने पुछा।

“जी ” , एक शिष्य पानी चखते हुए बोला।

“ठीक है !, अब कोई ज़रा इसे चख कर देखे ,“अच्छा , अब जरा इस पानी को कुछ देर उबालो।”, संत ने निर्देश दिया। क्या चखने पर नमक का स्वाद आ रहा है ?”, संत ने पुछा। “जी ” , एक शिष्य पानी चखते हुए बोला।

कुछ देर तक पानी उबलता रहा और जब सारा पानी भाप बन कर उड़ गया , तो संत ने पुनः शिष्यों को लोटे में देखने को कहा और पुछा , ” क्या अब आपको इसमें कुछ दिखाई दे रहा है ?”

” जी, हमें नमक के कुछ कण दिख रहे है। ” एक शिष्य बोला।

संत मुस्कुराये और समझाते हुए बोले ,” जिस प्रकार तुम पानी में नमक का स्वाद तो अनुभव कर पाये पर नमक को देख नहीं पाये उसी प्रकार इस जग में तुम्हे ईश्वर हर जगह दिखाई नहीं देता पर तुम उसे अनुभव कर सकते हो। और जिस तरह अग्नि के ताप से पानी भाप बन कर उड़ गया और नमक दिखाई देने लगा उसी प्रकार तुम भक्ति ,ध्यान और सत्कर्म द्वारा अपने विकारों का अंत कर भगवान को प्राप्त कर सकते हो।”

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