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चाँद देख कर ही क्यों मनाई जाती हैं ईद

Posted on: 14 Jun 2018 09:36 by shilpa
चाँद देख कर ही क्यों मनाई जाती हैं ईद

नई दिल्ली : रमज़ान के महीने की आखिरी रात चांद रात के रूप में मनाई जाती है।  चांद रात में ईद का चांद देखकर मुसलमान अगले दिन “ईद-उल-फित्र” मनाते हैं। ईद-उल-फित्र इस्लाम के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। इसे मीठी ईद भी कहते हैं।

रमज़ान के महीने में रोज़े रखना अनिवार्य माना गया है। इस महीने सभी मुसलमानों को अपनी चाहतों पर नकेल कसकर अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। यह महीना सब्र का महीना माना जाता है।

इसका वर्णन इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक कुरान में किया गया है। रमज़ान के महीने में मुसलमान शिद्दत से नमाज़ पढ़ते हैं और कुरान-शरीफ की तिलावत करते हैं।

रमज़ान के महीने में केवल बीमार, बूढ़े या सफर कर रहे लोगों को ही रोज़े रखने से छूट दी गई हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं को भी रोज़ें रखने या ना रखने की आजादी दी गई है।

रमजान में कुछ कार्य प्रतिबंधित कहे गए है जैसे रमजान में रोजा रखने वालों को कई नियमों का पालन करना चहिए। एक सच्चे मुसलमान को रोजे के दौरान खानेपीने से बचना चाहिए ,लड़ाई झगड़े नहीं करना चाहिए और सादगी से रहना चाहिए। समय पर रमजान पढ़नी चाहिए और कुरआन के पदों को जीवन में उतारनेका प्रयास करना चाहिए

“ज़कात” उस धन को कहते हैं जो अपनी कमाई से निकाल कर अल्लाह या धर्म की राह में खर्च किया जाए। रमज़ान के महीने में जकात अदा करना बेहद जरूरी माना गया है।इस धन का प्रयोग समाज के गरीब तबके के कल्याण और सेवा के लिए किया जाता है।

ईद-उल-फित्र

ईद-उल-फित्र

हदीस के अनुसार ईद उल फित्र अल्लाह की दी हुई पेशकश या भेंट हैं। रमज़ान के पूरे महीने रोज़े रख मुस्लिम मन और तन से पवित्र हो जाते हैं और अल्लाह को लगातार याद कर एक आध्यात्मिक संबंध का अनुभव करते हैं। ईद उल फित्र इस अनुभव को और भी यादगार बनाने का काम करता है।

ईद-उल-फित्र कैसे मनाई जाती है
ईद-उल-फित्र के दिन सुबह की नमाज़ का खास महत्व होता है। लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर मस्जिद या ईदगाह में नमाज़ पढ़ने जाते हैं।

आमतौर पर इस वक्त मस्जिदों में इतनी भीड़ होती है कि लोगों को खुले मैदान में भी नमाज़ अदा करनी पड़ती है। सभी मुसलमानों को ईद उल फित्र के मौके पर फ़ितरा यानी ज़कात अदा करना आवश्यक माना गया है। नमाज के बाद लोग एक-दूसरे से गले मिलकर ईद मुबारक कहते हैं। इस परंपरा के कारण ईद-उल-फित्र भाईचारे का भी प्रतीक बन चुका है।

इस दिन बड़े अपने छोटों को ईदी के तौर पर कोई तोहफ़ा या कुछ रकम भी अदा करते हैं।इस दिन घरों में मीठी सेवईं और तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और इन्हें दोस्तों, परिजनों और सगे-संबंधियों में बांटा जाता हैं।

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