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तो क्या हमे भावी प्रधानमंत्री इसी ‘कसौटी’ पर चुनना होगा ? अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 13 Jun 2018 06:51 by krishna chandrawat
तो क्या हमे भावी प्रधानमंत्री इसी ‘कसौटी’ पर चुनना होगा ? अजय बोकिल की टिप्पणी

क्या इस देश में प्रधानमंत्री बनने का एक जरूरी क्वालिफिकेशन अब तथ्यात्मक अज्ञानता बन गया है? यह सवाल इसलिए क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में आयोजित अोबीसी सम्मेलन में देश का ज्ञान वर्द्धन करते हुए कहा कि कोका कोला कंपनी शुरू करने वाला पहले शिकंजी बेचता था। मैकडाॅनल्ड शुरू करने वाला पहले ढाबा चलाता था। कुछ साल पहले उन्होने दलितों के उत्थान के लिए ‘एस्केप वेलोसिटी’ वाला सिद्धांत दिया था। इसी तरह इलाहाबाद में आयोजित एक सामाजिक विज्ञान सम्मेलन में राहुल बाबा बोले थे कि गरीबी एक ‘मानसिक‍ स्थिति’ है। राहुल के ताजा बयानों पर वो सोशल मीडिया में खूब ट्रोल हुए। यह बात दूसरी है कि बड़े नेताअों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे अपना ‘अज्ञान’ को भी ज्ञान का नया रूप मानते हैं।rahulइस मामले में अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बिंदास हैं। अपने जुमलेदार भाषणों में वो तथ्यों को ऐसे निचोड़ देते हैं कि ज्यादातर मामलों में हकीकत कुछ होती है और वे बताते कुछ और हैं। ऐसे सार्वजनिक भाषणों का उद्देश्य केवल राजनीतिक पाॅलिशिंग होता है, जमीनी सच्चाई से उसका ज्यादा लेना देना नहीं होता। अधिकांश राजनेता आजकल तथ्यों की प्रामाणिकता को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं होते। क्योंकि उन्हें तो दशहरे का रावण भर मारना होता है और वह किसी भी आतिशी बाण से मर जाता है।modiपहले राहुल की बात। राहुल गांधी ने अोबीसी सम्मेलन में जो कहा, उसकी जानकारी उन्हें कहां से मिली या किसने दी, पता नहीं। क्योंकि अमेरिका में कोका कोला शुरू करने वाला पहले शिंकजी बेचता था, यह जानकारी खुद कोका कोला के मालिकों के लिए भी नई है। तथ्य यह है कि 132 साल पहले अटलांटा के जाॅन पेम्बर्टन नामक फार्मासिस्ट ने सोडा मिले पानी से एक नया तरल पदार्थ तैयार किया, जिसे कोका कोला नाम दिया गया। चूंकि इसमें कोका नामक पौधे का अर्क भी था। इसलिए वह कोका कोला कहलाया। पेम्बर्टन कोई नींबू की शिकंजी नहीं बेचता था। इसी तरह मैकडाॅनल्ड कंपनी शुरू करने वाले अमेरिका के रिचर्ड और मौरिस मैकडॉनल्ड पहले हाॅट डाग स्टैंड लगाते थे। बाद में उन्होने 1940 में मैकडाॅनल्ड नाम से रेस्टाॅरेंट की शुरूआत की। तब अमेरिका में ढाबा क्या होता है, यह कोई जानता भी नहीं होगा।Rahul Gandhi addresses mediaअब प्रधानमंत्री मोदी की बात। मोदी के भाषण आम लोगों को प्रभावित करते हैं, लेकिन अपनी बात लोगों के गले उतारने के लिए वो तथ्यों को मनमाफिक तरीके से पेश करने में संकोच नहीं करते। उदाहरण के लिए लाल किले से अपने एक भाषण में मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि देश की राजधानी के पास स्थित एक गांव नगला फतेला में बिजली पहुंचने में 70 साल लग गए। हमारी सरकार ने वहां बिजली पहुंचाई। यह सुनकर खुद गांव वाले भी हैरत में पड़ गए। हकीकत में गांव में बिजली 1985 से है। यह आंकड़े भी सरकारी ही हैं। इसी तरह एक भाषण में मोदी ने दावा किया कि उनकी सरकार आने के बाद देश में हाइवे यूपीए सरकार की तुलना में तीन गुना रफ्तार से बन रहे हैं। जबकि खुद ट्रांसपोर्ट विभाग के आंकड़े बताते हैं कि हाइवे निर्माण की गति बढ़ी है। लेकिन थोड़ी सी। यूपीए-2 के समय यह 13 किमी प्रतिदिन थी, जो अब 17 किमी प्रतिदिन हो गई है। मोदी विदेश में दिए जाने वाले तकरीबन हर भाषण में प्रधानमंत्री जन धन खाते का जरूर जिक्र करते हैं। वे बताते हैं कि देश में 21 करोड़ जन धन खाते खोले गए। जबकि वास्तविकता यह है कि इनमें से 24 फीसदी खातो में रकम शून्य है और बैंकों को यह खाते मेंटेंन करना भारी पड़ रहा है। इसकी कीमत वो हमसे वसूल रहे हैं। यही नहीं लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने एक बार ‘लिज्जत पापड़’ को गुजरात की आदिवासी महिलाअों की मेहनत का फल बता दिया था। इसे गुजराती महिलाअों ने शुरू जरूर किया था, लेकिन वो आदिवासी नहीं थी। यही नहीं कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस पर हमला करते हुए उस पर राज्य के निवासी रहे जनरल करियप्पा और जनरल थिमैया के अपमान का आरोप लगाया। जबकि दोनो को कांग्रेस राज में ही जनरल का अोहदा दिया गया था। कांग्रेस शासन में ही जनरल करियप्पा को फील्ड मार्शल का सम्मान भी दिया गया।modi jiकहने का आशय यह है तथ्या और संदर्भ कुछ और होता है और उसका इस्तेमाल अपने ढंग और नीयत से किया जाता है। और फिर जब शीर्ष स्तर पर गलत तथ्यों से भरी बातें कहीं जाती हैं तो उसका आम लोगों पर ज्यादा असर होता हो या न होता हो, राजनेताअों की सत्यनिष्ठा पर प्रश्नचिह्न जरूर लगाता है। आप पब्लिक के सामने अपना राजनीतिक हित सिद्ध करने के लिए कुछ भी फेंकिए, कुछ भी पेलिए और कुछ भी साबित करने की कोशिश कीजिए। आप चाहें तो बिल्ली को बाघ और बाघ को बिल्ली बता दें। क्योंकि आप ऐसी ऊंची मीनार पर बैठे हैं, जहां से जमीनी सच्चाई की आवाज सुनाई ही नहीं देगी और देगी भी तो आप उसे उसी तरह सुनें यह जरूरी नहीं है।

तथ्यों को ट्विस्ट करना सियासत का पुराना खेल है। लेकिन उसके प्रति सौ फीसदी लापरवाही भी अक्षम्य नहीं है। क्योंकि आप देश के प्रधानमंत्री हैं या बनने की कोशिश कर रहे हैं। इतिहास या घटनाअों की प्रामाणिकता आपसे सर्वाधिक अपेक्षित है। चिंता की बात यही है कि राहुल गांधी भी इसी रेस में उतर गए हैं। दोनो नेता अपनी बातों से यही साबित करने की परोक्ष कोशिश कर रहे हैं कि आप उनकी बातों को ‘ब्रह्म सत्य’ की तरह लें। उस पर अविश्वास करने का महापाप न करें। कोई प्रतिप्रश्न न करें। करेंगे तो नर्कवास आपको ही भोगना पड़ेगा। इस अर्थ में यकीनन राहुल गांधी मोदी को ‘टक्कर’ देने की स्थिति में हैं। मोदी के पास किताबी ज्ञान कम हो, लेकिन व्यावहारिक ज्ञान ज्यादा है। वे तथ्यों की प्रामाणिकता को बुद्धिजीवियों के चोचले मानते हैं। जबकि राहुल गांधी के पास दोनो प्रकार के ज्ञान का टोटा है। इसी चक्कर में वो तथ्यात्मकता और व्यवहार ज्ञान दोनो को गड्डमड्ड कर जाते हैं। एक आम आदमी के नाते अपनी चिंता केवल नेताअों की उस मनोवृत्ति को लेकर है, जिसका मूल भाव ‘मेरी मरजी’ का है। मैं जैसा कहूंगा, वही सच है और मैं जैसा करूंगा वही कृत्य है। यह मूर्खता से जन्मा अहंभाव है। लेकिन दुर्भाग्य से आज का यही सत्य है। तो क्या हमे भावी प्रधानमंत्री भी इसी ‘कसौटी’ पर चुनना होगा

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