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सनसनी और गुदगुदाहट का फर्जीवाड़ा आखिर कब तक ? कमलेश पारे की कलम से

Posted on: 13 Jun 2018 07:31 by krishna chandrawat
सनसनी और गुदगुदाहट का फर्जीवाड़ा आखिर कब तक ? कमलेश पारे की कलम से

मुझे नहीं मालूम कि देश व प्रदेश के कर्णधार,निर्वाचित जनप्रतिनिधि तथा अगली बार निर्वाचित होने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे राजनेता व प्रबुद्ध जन,जिनमें नयी नयी ख़बरों के लिए बेचैन सभी पत्रकार और समाज को दिशा देने या नींद से जगाने वाले सभी मेधावी संपादक भी शामिल हैं,अभी भी प्रणब दा के नागपुर जाने के दुःख या सुख से फारिग हुए या नहीं.किसी रिश्तेदार की शादी में किसी प्रोफेसर के नाच,टीवी वालों के इस पर,फिल्म अभिनेता श्री गोविंदा से विदेश में ही इंटरव्यू लेने और अपने मुख्यमंत्रीजी द्वारा उन प्रोफ़ेसर साहब को विदिशा जिले का ‘ब्रांड-एम्बेसेडर’बनाने की मस्ती और खुमारी से सब लोग मुक्त हुए हैं या नहीं.क्योंकि,इन दो राष्ट्रीय महत्व की ख़बरों के बीच मेरी ‘तूती-नुमा’बात दब जायेगी.मेरी बात न तो आपको सनसनी देगी,और न ही गुदगुदाएगी.इसकी ‘टीआरपी’शून्य से भी कम है,और मैं,कोई एजेंडा चलाने की हैसियत भी नहीं रखता. हालाँकि इससे उन लोगों को कोई फरक नहीं पड़ेगा जिनके नाम मैंने ऊपर गिनाये हैं.समाज में उनकी प्रतिष्ठा का सूर्य वैसे ही चमकेगा जैसे आदि-अनादि काल से चमकता आ रहा है.

मैं आपका ध्यान,मेरे लिए एक दुखभरी खबर की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ.संभव है इसका असर हम सब की जिंदगी पर जरूर पड़े.इसमें बेशक आप भी शामिल हैं. भले ही उतना प्रभाव न पड़े,जितना प्रणब दा के नागपुर जाने और प्रोफ़ेसर के नाच से पड़ा होगा. आप जान लें कि भारत की मेडिकल कौंसिल ने देश के 82  मेडिकल कॉलेजों में वर्ष अठारह-उन्नीस के लिए दाखिले रोक दिए हैं.छात्रों से इनमें भरने वाली 10 000 सीटें ब्लॉक कर दी गई हैं. दाखिलों से रोके गए कॉलेजों में अपने शहडोल,शिवपुरी,विदिशा,खंडवा,रतलाम और छिंदवाड़ा के कॉलेज भी हैं.जिनके समय पर खुलने में अपनी सरकार की इज्जत दांव पर लगी है.Image result for medical council of india

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यही नहीं, देश के सभी राज्यों से गए, नए मेडिकल कॉलेज खोलने के 687 प्रस्ताव तो ख़ारिज ही कर दिए गए हैं.विश्व में जनता के स्वास्थ्य का ध्यान रखने वाले संगठनों का कहना है कि प्रति एक हजार व्यक्तियों पर एक डॉक्टर तो होना ही चाहिए.जबकि भारत में डेढ़ हजार पर भी एक नहीं है. अभी भी हमें प्रति वर्ष नए 600000 डॉक्टर और 1000000 प्रशिक्षित नर्सें चाहिए. उसी हिसाब से कॉलेज और प्रति कॉलेज सौ करोड़ रुपये भी चाहिए.भारी-भारी बहुमत से जीती सरकारों से कौन पूछेगा कि इस पर क्या हुआ ? आप ही पढ़ देखें सबके घोषणा-पत्र.संकल्प और उनकी भाषा देखकर तो लगेगा कि बस अब स्वर्ग धरती पर आ ही रहा है.

आपको मालूम है कि भारत में कुल 370 मेडिकल कॉलेज हैं. इनमें 50,000 सीटें हैं. कहने को तो हम दुनिया के सबसे बड़े डॉक्टर उत्पादक देश हैं, पर अपने ही देश में डॉक्टरों का ‘टोटा’ है. इन 50000 सीटों में से 25000 के आसपास सीटें मोटी फीस या दूसरे तरीकों से बिकती हैं. कमो-बेश पचास लाख से डेढ़ करोड़ रुपये प्रति सीट के हिसाब से यह व्यापार भी 12 से 15 हजार करोड़ का है.शायद इतना ही पैसा भारत के किसी बड़े या भारी,उत्पादक उद्योग में भी लगा हो.इस पर कुछ भी कहने की पात्रता मेरी नहीं है.लेकिन,बावजूद इसके,देश में डॉक्टर की भारी कमी है.

अपने देश की मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया का एक काम है ‘इंडियन मेडिकल रजिस्टर’रखना.वह रखा भी गया है, उसमें कुल 7 लाख 50 हजार डॉक्टर भी रजिस्टर्ड हैं. पर इनका शहर और गाँव का अनुपात बहुत ही खतरनाक और चिंता जनक है.देश के साठ प्रतिशत डॉक्टर शहरों में हैं, जबकि अपनी सत्तर प्रतिशत जनता गाँवों में रहती है. बचे चालीस प्रतिशत डॉक्टर गाँवों में हैं तो जरूर,पर वहां साधन और दवाएं नहीं हैं. इसी कारण सब जगह लाखों की संख्या में नकली डॉक्टर खूब फल-फूल रहे हैं.विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि भारत के साठ प्रतिशत नकली डॉक्टर तो स्कूल की परीक्षाएं भी पास नहीं हैं. ऐसा नहीं कि ये सिर्फ गाँवों में ही हैं. देश की राजनैतिक और व्यापारिक राजधानियों सहित महानगरों में भी ये भारी संख्या में हैं. एक सचमुच के असली डॉक्टर का कहना है कि यदि ये नकली डॉक्टर न हों, तो और भारी तबाही मच जाए. सर्दी-जुकाम,बुखार-दस्त-उलटी या चोट पर, ये चालू-चलती या नामी दवाएं (भले ही वे प्रतिबंधित ही क्यों न हों) देकर अस्पतालों पर आने वाले मरीजों का दबाव कम कर देते हैं. वरना तो तूफ़ान ही आ जाए.

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आप तो जानते ही हैं कि समुद्र में विशालकाय बर्फीली शिला को ‘आइसबर्ग’कहते हैं.उसका सिर्फ ऊपरी कोना ही हमेशा दिखाई पड़ता रहता है,और उससे टकराकर बड़े-बड़े जहाज भी बर्बाद हो जाते हैं.भारत की स्वास्थ्य-सेवाओं के समुद्र में,मेरी बात उसी तरह के ‘आइसबर्ग’के ऊपरी कोने जैसी हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि,या इन जैसे देशों को छोड़कर दूसरे देशों से अपनी तुलना करेंगे तो बहुत-बहुत निराशा हाथ न्यूरोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, गायनेकोलॉजी, पीडियाट्रिक्स आदि चिकित्सा-क्षेत्र की विशेषताओं के विशेषज्ञों की संख्या,उनके इलाज के लिए उपलब्ध साधन और अपने देश में उनके मरीजों की संख्या के आंकड़े आप देख लेंगे तो आप अपने देश के सभी फर्जी नायकों की फर्जी बातें और उनकी फर्जी चिंताएं भूल ही जाएंगे.याद रखें मैंने दवाओं और अस्पतालों की संख्या की बात नहीं की है.

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