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क्या उम्मीद करें, और कहां जाकर रोयें ? कमलेश पारे की कलम से

Posted on: 13 Jun 2018 08:33 by krishna chandrawat
क्या उम्मीद करें, और कहां जाकर रोयें ? कमलेश पारे की कलम से

मेरी बातों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होती होगी, मुझे नहीं मालूम. लेकिन, मेरे एक अग्रज डॉ.कपूरमल जी जैन रोज पूछते हैं कि इसका हल भी तो तुमने सोचा ही होगा. वह जरूर बताओ. मैंने भी ठान ली है कि जरूर जरूर बताऊंगा. हालांकि इसका छोटे में यही जवाब है कि समाज के स्तर पर हममें बुद्धि और ज्ञान तो रोज बढ़ रहे हैं, किन्तु विवेक ज्यादा ही तेजी से घट रहा है.विवेक बढ़ाने का जिम्मा जिन भी धर्माचार्यों का है,वे निराश ही नहीं कर रहे, हमें धोखा भी दे रहे हैं.वरिष्ठ पत्रकार श्री विजय मनोहर तिवारी कहते हैं कि चूँकि चीजों को बीमार चेहरे पर सौंदर्य सामग्री लगाकर अलग तरह से पेश किया जा रहा है,इसलिए यह सब दिखता नहीं, पर दुखता जरूर है. हम सब छोटे-बड़े प्रतिदिन कहते हैं कि ‘शिक्षा’ भविष्य निर्माण की पहली सीढ़ी है. आप देश-प्रदेश तो छोड़िये सारा जग घूम आइये. जीवन के सभी पहलुओं में ‘शिक्षा’ सबसे ज्यादा अरक्षित (अनप्रोटेक्टेड) पहलू है. स्कूल सरकारी सनक से रक्षित नहीं हैं, विद्यार्थी शिक्षकों के अज्ञान और अकर्मण्यता से रक्षित नहीं हैं, शिक्षक अपने मालिकों से अरक्षित हैं, और मालिक सरकार से. विद्यार्थियों के पालक तो इस पूरे जंगल में रोज के शिकार हैं. कोई भी उनकी ‘बोटी’ कहीं भी और कभी भी नोंच सकता है.via

अपने मध्य प्रदेश में ही सत्तावन प्रतिशत शिक्षक अप्रशिक्षित हैं. शिक्षकों के शिक्षण की जिम्मेदारी जिन-जिन संस्थाओं के हाथ में है, वे सब स्वयं ही बीमार हैं. बरसों स्कूलों में प्राचार्य रहे श्री खेमराज शर्मा तो कहते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे कई बड़ों को ‘ट्रेनिंग-लॉस’ क्या होता है, मालूम ही नहीं है. प्रशिक्षण के दौरान सिखाई गई बातें जब शिक्षक अपनी कक्षा में पढ़ाते समय भूल जाता है,तो वह ट्रेनिंग लॉस कहलाता है.आप किसी से भी इसकी बात करो,तो वह शिक्षकों के वेतनमान,सेवा-शर्तों,सेवाओं के स्थाईकरण या आंदोलन की बात कर  मामले को ही घुमा देता है. अध्यापक, गुरूजी, शिक्षा-कर्मी, संविदा-शिक्षक आदि इत्यादि नामों के ही फेर में पड़े शिक्षकों को क्या मालूम कि वे शिक्षा के मौलिक संवैधानिक अधिकार के ‘दाता’भी हैं. वे बेचारे तो साल के नौ महीने धरने-प्रदर्शन और आंदोलन में व्यस्त रहते हैं. इनके मामलों को देखने वाली अफसरशाही ‘राम जाने काहे में मगन है’ ?via

मध्य प्रदेश के ही एक मंत्री को मैंने एक जन सभा में खुद यह कहते सुना है स्कूलों की दीवालों पर विज्ञापन पुतवाने से पैसे आएंगे और शिक्षा का स्तर सुधरेगा या ऊँचा होगा. मुझे भरोसा है कि मंत्रीजी उस समय नशे में नहीं थे. इनके पहले भी शिक्षा को बेसहारा, लाचार, मजबूर और बेबस समझकर उसे ऊपर उठाने वालों ने एक पुनर्घनत्वीकरण (रीडेंसीफिकेशन) की योजना बनाई थी. चूँकि सभी महानगरों, जिला स्तर के शहरों, और तहसील स्तर के कस्बों में स्कूल मौके की जगह, बीच बाजार में बने थे. पैसे के चक्कर में अफसरों ने उनके आसपास एक एक इंच में दुकानें बनवा दीं. इससे पैसा आया होगा, किन्तु कहां गया, अब तो भगवान भी नहीं बता सकता. प्रयोग के तौर पर पूछ देखें कि बारहवीं कक्षा में भौतिक शास्त्र में कितने प्रैक्टिकल हैं, और कितनों के उपकरण स्कूलों की प्रयोगशालाओं में हैं. यही पुनर्घनत्वीकरण का भूत बाद में स्वास्थ्य और पशु चिकित्सालयों पर भी चढ़ा था, पर सरकार दीवालिया थी व आज भी है. चीजें उन विभागों में भी बर्बाद हैं.

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शिक्षा विभाग को तो मालूम ही नहीं कि किन स्कूलों की कितनी जमीनों पर अतिक्रमण हो चुके हैं. कितने ही खेल मैदानों पर भक्त-नुमा अफसरों की मिली भगत से मंदिर बन गए हैं. बात मानिये कई स्कूलों में आर्ट्स के शिक्षक कॉमर्स पढ़ा रहे हैं, कॉमर्स के शिक्षक गणित पढ़ा रहे हैं,और बारहवीं के कई विद्यार्थी तो ठीक से ‘प्रतिशत’ भी नहीं बता पाते. फिर भी बलिहारी है अपने बच्चों की, कि वे अस्सी-अस्सी,नब्बे-नब्बे प्रतिशत नंबर ला रहे है.आप ही बताएं मुझे क्या उम्मीद करना चाहिए?

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