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चित्रकूट की चिंता राम हवाले..!

शब्द यदि वाकय में ब्रह्म होते तो इनकी अवहेलना करने वाले सारे पापी आज नरक में होते और इस धरती का बोझ कुछ कम होता।

जयराम शुक्ल

शब्द यदि वाकय में ब्रह्म होते तो इनकी अवहेलना करने वाले सारे पापी आज नरक में होते और इस धरती का बोझ कुछ कम होता। मैं ये इसलिये कह रहा हूँ कि पिछले तीन दशक में भाई लोगों ने चित्रकूट की चिंता में इतने शब्द खर्च कर दिये गए कि वे अब अपनी अर्थवत्ता, महत्ता ही खो बैठे। कामदगिरि की परिक्रमा और मंदाकिनी में दीपदान देकर अपने पाप धोने आने वालों का पाप यहां के गरीब गुरबों के साथ ऐसे लिपटा है कि ये जीते जी ही नरकवासी बन गए।

सात साल पहले सतना के एक अखबार का संपादन करते हुए मैंने चित्रकूट में गाँजा,चरस और स्मैक से बर्बाद होते परिवारों पर जीवंत स्टोरी करवाई थी। सतना के मेधावी युवा पत्रकार राजेश द्विवेदी ने मध्यप्रदेश- उत्तरप्रदेश के बीच सैंडविच बने इलाके से पच्चीस ऐसे परिवारों को खोजा था जिनके बच्चे स्मैक की लत में फँसे थे। तेरह परिवारों की पहचान के साथ उनका सिलसिलेवार ब्योरा दिया। पिछली मर्तबे चित्रकूट गया तो पता कि इन तेरह परिवारों के कुलदीपक हमेशा के लिए बुझ गए। इनका वंशनाश हो गया। शेष बचे परिवारों में भी एक-एक कर मौत का सिलसिला जारी है। पिछले एपीसोड में..चित्रकूट की राम कहानी..पढने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में अर्चन पंडित ने एक दोहा भेजा है,आप भी उसे पढिए..

चित्रकूट में देखिए धर्म-कर्म का स्वाँग।
गुरू चेलों को बेचते गाँजा, स्मैक,भाँग।।

अर्चन पंडित चित्रकूट के उत्तरप्रदेश के हिस्से में पाठा के वनवसियों के बीच काम करते हैं। उनसे विस्तार से बात नहीं हो पाई लेकिन प्रतिक्रिया बताती है कि धंधा निर्विघ्न जोरदारी से चल रहा है। भगवान राम ने जिस तपोभूमि में तेरह बरस जप-तप करते हुए बिताए आज वह चित्रकूट अपराधियों का सुरक्षित स्वर्ग है। यहां रम रहे अपराधी इच्छाधारी राक्षसों की भाँति बहुरूपिए हैं। किसी भी शक्ल में दिख सकते हैं। कुछ साल पहले एक आश्रम से एक कतली को दिल्ली पुलिस पकड़ ले गई थी। वह यहां साधू बनके रह रहा था। साधुओं के बीच कई बार गैंगवार हो चुका है। गए एक साधू रेप के आरोप में अंदर हुआ है। इनके डेरे में अवैध असलहे मिल जाए तो भी ताज्जुब मत करिए।

हाँ यहां सब ऐसे नहीं हैं, कुछेक पूज्य हैं, पर चित्रकूट अब उनके बस का नहीं रहा। चित्रकूट नशे के कारोबार का हब है। गाँजे की धूनी तो सुलगती ही है, स्मैक का जोर है जो युवाओं की जिंदगी लील रहा है। चित्रकूट अब नशे के कारोबार का टर्मिनल है जिसका कनेक्शन महानगरों से जुड़ा है। दो प्रदेशों के बीच जब कोई हिस्सा फँसता है तो स्थित बड़ी विकट बन जाती है। एक बार रीवा और इलाहाबाद की सीमा पर कतल हो गया। लाश तीन दिन तक इसलिये पड़ी रही क्योंकि उस अभागे का सिर यूपी में था और टाँगें एमपी में। चित्रकूट में ऐसी घटनाएं प्रायः होती हैं। पुलिस हाथ झाड़ती हैं अपराधी मजे मारते हैं।

चित्रकूट की पावनधरा में आकर सभी तरना चाहते हैं। सो जरूरी है कि यहां आश्रम बने। सतना में संपादकी करते हुए एक रिपोर्ट छापी थी कि यूपी की पुलिस में नंबरी नोटेरियस रहे एक अफसर ने रिटायर होकर बीच मंदाकिनी में ही कब्जा करके आश्रम बना लिया था। खुद ही नाम बदलकर 10008 फला महराज, फला सरकार लिखने लगा था। रिपोर्ट छपने के बाद चित्रकूट की नगरपरिषद जागी और उस फर्जी महाराज का बेजा कब्जा हटाया। संभव है वो अब किसी पार्टी का उपदेशक बन चुका हो, राम जाने।

चित्रकूट की एक-एक इंच जमीन पर नजर है। अंदाजा लगा सकते हैं कि एक बार भगवान कामतानाथ के मुखारबिंद की जमीन की रजिस्ट्री हो गई थी। जो पुराने आश्रम हैं धीरे-धीरे उनके मठाधीश बदलते जा रहे हैं। नए महंतों का कारोबार जम रहा है, पुराने सड़कों पर भीख माँगने लगे हैं। कालोनियां बन रहीं, गरीबों की जमीन किस तरह औने पौने बंदूक की नोक पर हड़पी जा रही हैं सबकुछ आन रेकार्ड है। एक बार खबर रुकवाने बंदूक के साथ अटैची भर नोट लेके आए यूपी निवासी लेकिन चित्रकूट में कार्यरत, बाहुबली अपराधी-कम-प्रापर्टी डीलर ने मुँह खोलकर नाम गिनाते हुए बताया कि किस किस नेता को वह प्लाट दिलवा चुका है। वह चाहता था कि अखबार की रिपोर्टिंग उसका धंधा खराब न करे।

चित्रकूट के भूमाफियाओं का दम इसी से पता चलता है कि जमीनों का सौदा तय करवाने वाले पटवारियों का तबादला यूँ चुटकी में कैंसिल हो जाता है और कलेक्टर बगली झाँकते रह जाते हैं। यहाँ पटवारी रहने के बाद आगे नौकरी की जरूरत नहीं रह जाती। वह या तो प्रापर्टी डीलर में बदल जाता है या फिर राजनीति में उतरकर चुनाव मैदान में। चित्रकूट मैं प्लाटों की कीमत लखनऊ, भोपाल से ज्यादा ही हैंं, कम नहीं। एक बार जा के देख आइए प्रापर्टी डीलरों के मोबाइल नंबर पानठेलों में चिपके मिल जाएंगे। जमीन का धंधा करने वाले और खदान खोदने वाले यहां मौसेरे भाई हैं।

सती अनसुइया तरफ मंदाकिनी के कैचमेंट में आने वाले पहाड़ सफाचट हो चुके हैं। जहां कभी विराध जैसे राक्षस विचरते थे वहां पोकलेन, हाइवा, डंपर विचरते हैं। हड्डियों के ढेर पर बने जिस सिद्धा पहाड़ को देखकर भगवान् राम ने रोष में आकर उद्घोष किया था कि..निसिचरहीन करहु महि भुज उठाइ प्रण कीन्ह..। उस सिद्धा पहाड़ का अस्थिपंजर पोकलेन निकाल ले गई क्यों कि उसमें उम्दा किस्म का बाक्साइट था। चौरासी कोसी परिक्रमा, राम वनगमन पथ..वाह वाह बातें हैं बातों का क्या। ये सिर्फ़ प्रवचन,और बुद्धिविलास में बची हैं। सरभंग आश्रम की सभी वेदियां खदान वाले खोद ले गए, ढूंढते रहिये राम वनगमन पथ।

तो जमीन और खदान वाले भाई लोगों का यहां राज है। ये जो कहें वो सही। यही नेता, यही महंत, यही प्रवचनकार, यही जजमान। व्यवस्था भी जाकर इन्हीं के पायताने बैठ जाती है। बोलो सियावर रामचंद्र की जय। अब बचे डकैत। कितना मारो वे बचे रहेंगे। तीस साल में छोटे बड़े कोई तीन हजार मारे गए होंगे। रक्तबीज की तरह फिर जिंदा। यहां डकैत क्यों हैं…?इस यक्षप्रश्न का जवाब सत्तर साल में भी सरकारें नहीं खोज पाई।

चूंकि यहां कोई रोजगार नहीं इसलिए डकैती एक रोजगार है। डाका नहीं डालेंगे तो खाएंगे क्या.। इस पूरे इलाके में पचानवे फीसद जोत की जमीन पाँच फीसद लोगों के पास है। बाकी सब मजदूर। मजदूरी करके या तो दादुओं के जूते खाओ या जंगल भागकर गैंग में शामिल हो जाओ। यहां डकैती की जड़ में चंबल की तरह स्वाभिमान और मूँछ का सवाल नहीं वरन् आर्थिक विषमता है, पापी पेट की जरूरत है। ये डकैत इसलिए भी पलते पुसते हैं क्योंकि ये चुनाव में नेताओं के काम आते हैं।

एक दस्य चक्रवर्ती हुए ददुवा (मुझे एक बार पत्र भेजा था तो लेटर हेड में यही छपा था)। कई सालों तक तो उन्होंने नेताओं का साथ दिया जब तंग आ गए तो अपने परिवार व शागिर्दों को ही राजनीति में उतार दिया। इनमें से कई विधायक, सांसद, ब्लाकप्रमुख, प्रधान हैं या थे। ददुवा मुठभेड़ में मारे गए पर अभी भी उनका नाम वोटों के काम आता है। स्वर्गीय ददुवा का मंदिर भी बना है। ददुवा भी दादुओं के जुल्म से तंग आकर जंगल में कूदे थे। चित्रकूट इलाके में दादू सरहंग इलाकेदारों को कहा जाता है।

सो राम के चित्रकूट में यही सबकुछ बचा है सरहंगई, ढोंग, फर्जीगीरी, गरीबी, बेबसी, कुपोषण,लाचारी और इन सबसे ऊपर मख्खन जैसे शब्दों से कानों में शहद घोलने वाले प्रवचन, भाषण। राम जब चित्रकूट पहुंचे तो वनवासियों ने उन्हें घेर लिया। उनकी दशा पर प्रभु को दया आई और इन्हें अपना संगी साथी बना लिया। इसपर वनवसियों ने कहा- नाथ मोर एतनइ सेवकाई। लेहुं न बासन,बसन चोराई।।..राम ने इन अभागों को अपने साथ बैठाकर जो सम्मान बख्शा था हम भक्तों ने उसे छीन लिया और धकेल दिया भुखमरी के अंधकूप में।

मेरा यकीन न हो तो चले जाइए मझगवां ब्लाक के रामनगर खोखला, कैलाशपुर, पड़मनिया जागीर। कुपोषण और भूख से बिलबिलाते बच्चों की खोजखबर के लिए सुप्रीम कोर्ट यहां अपने आब्जर्वर भेज चुका है। चुनाव में आए हैंं तो लगे हाथ आप भी हो आइए..।

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