नितिनमोहन शर्मा

अस्त-व्यस्त। लस्त-पस्त। आपसी झगड़ो में व्यस्त। लगातार परास्त। गुटों में बटी जबरदस्त। न कोई संगठन। न कोई पराक्रम के बंदोबस्त। गांधी भवन के इसी उजाड़ पड़ी बागड़ के बागबाँ अरविंद बागड़ी बनाये गए है। अब उनके जिम्मे उजाड़ पड़े संगठन को फिर से “हरा भरा” करने की भागीरथी जिम्मेदारी आई हैं। ऊबड़ खाबड़ संगठन को नए सिरे से जोतकर उन्हें नए संगठन समर्पित बीज बोने की चुनोती है। बंजर पड़ी सांगठनिक क्षमता को पार्टी हित में उपजाऊ बनाने का उपक्रम मुंह बाए हैं।

राजनीति की परिभाषा के अनुरूप बागड़ी “युवा” है। पर व्यक्तित्व पर “फूल छाप” के दाग चस्पा है और “कर्मक्षेत्र” भूमाफिया के आरोपो से लथपथ हैं। बावजूद इसके बागड़ी शहर कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गए हैं। पर उनकी ताजपोशी पार्टी में हजम ही नही हुई। उनके नाम का पत्र भोपाल से इन्दौर आने के पहले ही उनके नाम का विरोध शुरू हो गया।

बागड़ी की ताजपोशी के साथ कार्यकारी अध्यक्ष की व्यवस्था के पटाक्षेप की घोषणा भी की गई लेकिन इन्दौर में तो बागड़ी के पगड़ी बांधते ही कार्यकारी अध्यक्ष का राग फिर जोर पकड़ गया हैं। इसके लिए अभी से पार्टी के बड़े नेताओं को आगाह कर दिया है कि जो अध्यक्ष के योग्य थे, उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाये बगेर इन्दौर में कांग्रेस की बात नहीं बनने वाली हैं। इसलिए सूत्र बता रहे है कि बागड़ी के पीछे पीछे जल्द ही शहर कॉंग्रेस में कम से कम दो कार्यकारी अध्यक्ष सामने आएंगे।

दो नए कार्यकारी अध्यक्ष..!!

बागड़ी की सदारत पार्टी की यूथ विंग ने सिरे से खरिज कर दी है। पार्टी के युवा नेताओ का साफ कहना है कि प्रतिकूल हालातो में भी जो बरसो से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें आगे लाये बगेर इस तरह के फैसले पार्टी को और गर्त में ले जाएंगे। यूथ ब्रिगेड का गुस्सा पार्टी विचारधारा को लेकर है कि जिनकी निष्ठाएं कांग्रेस के प्रति अटूट ओर निर्विवाद है, ऐसे नेताओं के हाथ मे कमान दिए बगेर पार्टी के अच्छे दिन नही आएंगे। जिनकी स्वयम की पार्टी के प्रति निष्ठा संदिग्ध है, वे किस मुंह से पार्टी का काम खड़ा कर सकेंगे?

कार्यकारी अध्यक्ष की मांग व्यवस्था खत्म होने के बाद भी अरविंद बागड़ी का नाम उजागर होते ही जोर पकड़ गई। ख़ुलासा के पास कार्यकारी अध्यक्ष के दावेदारो के जो नाम सामने आए है उनमें सबसे अव्वल अमन बजाज हैं। उसके बाद, राजू भदौरिया, टंटू शर्मा, जय हार्डिया का नाम है। प्रबल दावेदार गोलू अग्निहोत्री स्वयम भी स्तब्ध है। अभी उन्होंने पत्ते नही खोले है। कमलनाथ के भरोसे अग्निहोत्री स्वयम को गांधी भवन का मुखिया मानकर ही चल रहे थे।

गुटीय राजनीति में मुफ़ीद

बागड़ी की ताजपोशी में शहर में पसरी गुटीय राजनीति ने अहम भूमिका निभाई। बागड़ी विधनासभा राऊ, क्षेत्र 5, क्षेत्र 2, क्षेत्र 4 में सहजता से हजम हो रहे है। जिस विधानसभा 1 को लेकर लम्बी उलझन थी, वो अब सुलझ गई हैं। विनय बाकलीवाल तो कही भी हजम नही हो पा रहे थे।

सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक आधार

शहर कांग्रेस में बागड़ी की सरदारी में उनका सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक आधार अहम रहा। दुर्दिन के दौर में “गांधी भवन” को “संचालित” करना भी पार्टी के लिए टेडी खीर है। इन्दौर जैसे शहर में पार्टी को ” चलायमान ” बनाये रखने के इसी हुनर ने बाकलीवाल को तमाम ऊंच नीच के बाद भी मुखिया न केवल बनाये रखा बल्कि वे प्रदेश बॉडी का अहम हिस्सा भी हो गए। अरविंद बागड़ी को ये ही सब ” खासियत ” देखकर कुर्सी दी गई हैं। वे आर्थिक रूप से सक्षम है और दिल्ली भौपाल दोनो जगह वे वादा कर के आये है कि संगठन के संचालन में कोई ‘कमी” नही आने देंगे।

कक्कड़-गोयल बने सूत्रधार

बागड़ी की ताजपोशी की अंतिम बाधा कमलनाथ सरकार में ओएसडी रहे प्रवीण कक्कड़ ने दूर की। बागड़ी के समधी गोयल ने भी इसमे अहम भूमिका निभाई। गोयल बागड़ी के समधी है। गोयल के संजय शुक्ला के साथ कारोबारी रिश्ते है। इन दोनों के कारण विधायक संजय शुक्ला को साधा गया और बागड़ी के नाम की घोषणा हो गई।