देसी धान की किस्मों को सहेज रहे बाबूलाल, मिल चुके कई अवॉर्ड

समिति के बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि इन दिनों लोक अनाजों को बचाने–सहेजने की बहुत ज़रूरत है। देसी किस्में हमारे आसपास से तेज़ी से गायब होती जा रही है।

0
51
babulal

सतना: सतना के एक शख्स बाबूलाल दाहिया ने धान की विलुप्त हो चुकी 200 से ज्यादा किस्मों को खोज कर सहेजने का काम किया है। इस काम के बाद अब देसी गेहूं सहित अनेक प्रकार की जड़ी बूटियों, पेड़ पौधे वनस्पति व सब्जियों की प्रजातियों के संरक्षण का काम किया जा रहा है। इनकी जैव विविधता प्रबंध समिति के इस काम को कई अवॉर्ड चुके हैं।

समिति के बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि इन दिनों लोक अनाजों को बचाने–सहेजने की बहुत ज़रूरत है। देसी किस्में हमारे आसपास से तेज़ी से गायब होती जा रही है। हमारे किसान दो–चार किस्मों पर ही निर्भर रहने लगे हैं। जुवाँर को छोड़कर बाकी सभी अनाजों की यही स्थिति है। अकेले जुंवार की दस–बारह किस्में हैं, जिन्हें मिलकर बोया जा सकता है। पर बड़ा संकट परम्परागत देसी धान की खेती के साथ है। एक दौर में देसी धान की करीब दो से ढाई सौ तक प्रजातियाँ हुआ करती थी। अब इलाके के लोग इन्हें भूल ही गए हैं।

वे बताते हैं कि बीते कुछ सालों में विपुल मात्रा में उत्पादन देने का लालच देकर किसानों को भ्रमित किया गया है। उन्हें ऐसा झांसा दिया गया है कि आयातित किस्म की धान बोने पर ही उन्हें फायदा होगा लेकिन ये किस्में हमारे यहाँ सूखे और पानी के संकट के कारण लाभकारी नहीं है, बल्कि किसानों को इनके लिए पानी का इंतजाम करना महंगा पड़ रहा है। पानी हमारे पीने के लिए कम पड़ रहा है लेकिन लोग ज़्यादा उत्पादन के लालच में इसका धान की सिंचाई में दुरुपयोग कर रहे हैं।

उन्होंने जब इसकी पहल की तो पहले दस–बारह, फिर खोजते हुए 30–40, फिर 60-70 का यह आंकड़ा पंहुचते–पंहुचते अब दो सौ से ऊपर तक जा रहा है। इनमें कुछ प्रजातियाँ महज 70 से 90 दिनों में पक जाती है तो कुछ सौ से सवा सौ दिनों में। लेकिन कुछ (30 से 40) किस्में 130 से 140 दिनों में भी पकती है। ये सभी सुगंधित और पतले धान की किस्में हैं। दाहिया हर किस्म की धान के रूप–रंग, आकार–प्रकार और उसकी प्रकृति से भली–भाँती परिचित हैं।

उन्होंने इलाके में देसी धान की किस्मों को बचाने–सहेजने के लिए बीड़ा उठाया हुआ है। वे अपने गाँव के दूसरे किसानों को भी यह सलाह दे रहे हैं। उनसे प्रेरित अन्य किसान भी अब इस बात को समझने लगे हैं। हालाँकि वे खुद बघेली बोली के अच्छे साहित्यकार है और देश के कुछ विश्वविद्यालयों में उनकी किताबों पर शोधार्थी पीएचडी कर रहे हैं लेकिन अब उन्होंने अपना पूरा ध्यान देसी किस्मों को पुनर्जीवित करने पर लगा दिया है। वे अब प्रदेशभर में इसका प्रचार–प्रसार भी कर रहे हैं। बाबूलाल दाहिया को जैव विविधता के क्षेत्र में उनके इस अभूतपूर्व काम के लिए मुंबई और भोपाल में सम्मानित भी किया जा चुका है। उनके काम की कई जगह प्रदर्शनी भी लगाई जा चुकी है।

उनकी जैव विविधता प्रबँध समिति को इस वर्ष राज्यस्तरीय वार्षिक जैवविविधता पुरस्कार से भी नवाजा गया है। इसके पहले भी समिति को जैवविधिता प्राधिकरण द्वारा हैदराबाद में इंडिया बायोडायवर्सिटी आवार्ड 2018 मिल चुका है। उनकी यह समिति सतना जिले के उचेहरा ब्लाक के पिथौराबाद में है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here