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अणु-अणु हुई दुनिया, नोबेल पुरस्कार मिला नादिया को

Posted on: 23 Oct 2018 10:01 by Ravindra Singh Rana
अणु-अणु हुई दुनिया, नोबेल पुरस्कार मिला नादिया को

इस बार का नोबेल शांति पुरस्कार मिस नादिया मुराद एवं डॉ. डेनिस मुकवेज को संयुक्त रूप से दिया गया है। दोनों का ही लक्ष्य था अपनी-अपनी तरह से दुनिया की इस खौफनाक रिवायत पर अंगुली रखना, जिसके तहत युद्ध, गृहयुद्ध, दंगों आदि में दुश्मनी का निशाना स्त्री के जिस्म को बनाया जाता है। डॉ. मुकवेज एक गाइनिक सर्जन हैं और युद्ध में बलत्कृत हुई नन्ही बच्चियों और स्त्रियों का इलाज करते हैं। इराक की नादिया मुराद स्वयं एक शिकार रही हैं।

नादिया यजदी समुदाय से आती हैं चूंकि यजदियों के मजहबी तौर-तरीके इस इलाके (और विश्व के) एक अन्य मजहब से अलग हैं अत: इस अन्य मजहब के लोग यजदियों से नफरत करते हैं और इस धरती से उनका सफाया कर देना चाहते हैं। मगर अब इस सदी में आई एस (तथाकथित इस्लामिक स्टेट) ने अधिक क्रूरता के साथ विधर्मियों का सफाया करने की ठान ली है।

2014 में, यजदियों के प्रांत में आई एस ने एक आक्रमण किया उसमें हजारों निहत्थे पुरुषों, बूढ़ी स्त्रियों को मार गोलियों से भून दिया गया और करीब तीन हजार किशोरियों-युवतियों को सेक्स स्लेव बना लिया गया। आई एस के सामान्य लोग तो इनका शोषण करते ही थे, इन्हें नए रंगरुटों को इनाम के तौर पर भी दिया जाता था। नाजिया को भी यह सब भुगतना पड़ा। किस्मत से वे भाग निकलने में कामयाब हुईं। और उन्होंने किताब लिखकर, अभियान चलाकर और संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत होकर मुद्दा उठाया।

उन्होंने अपना चेहरा प्रस्तुत करने का साहस किया ताकि क्रूरता की कोई कथा फर्जी ना लगे, एक विश्वसनीय आंखों देखी वे बता सकें ताकि दुनिया का ध्यान फिर एक बार फिर इस बात पर जाए कि कैसे स्त्री की देह युद्ध का हथियार बन जाती है। कई युद्धों और गृहयुद्धों में यह हो चुका है। भारत-पाक बंटवारे के समय भी यह हुआ था और दोनों ओर से हुआ था। कोई भी एक ही धर्म या मजहब इसका कुसूरवार नहीं था। ये बातें एक और बात सोचने में मजबूर करती है। एक इंसान ने दूसरे इंसान का कुछ नहीं बिगाड़ा फिर भी वह उसका दुश्मन है क्योंकि वह अलग धर्म, जाति या समुदाय में पैदा हुआ है। ऐसा क्यों ? दुनिया और छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रही है। धर्म, जाति, समुदाय, प्रांत, रंग, भाषा, उपसमुदाय उसका भी उपसमुदाय। लगता है हम अणु बम से मरें उससे पहले अणु-अणु में बंटकर मर जाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार निर्मला भुराड़िया

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