अश्वत्थामा: जिसे आज भी यातना का अमरत्व प्राप्त है| Ashwaththama Even today, the immortality of torture is attained

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Anagha Joglekar

यह कहने में मुझे संकोच नहीं है कि मैंने साहित्य की बहुत सी समकालीन श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ी नहीं हैं। इसी तरह जो हमारे क्लासिक ग्रंथ हैं उनसे गुजरने का योग भी बना नहीं और नहीं पढ़ने के कोई खास प्रयास किये। घर में ‘रामचरित मानस’ जरूर हुआ करता था,जिसके कुछ अंश प्रतिदिन दादाजी और बाद में दादीजी रोज के पूजा पाठ के समय पढ़ते थे। मां के समय गीताजी के अध्याय पढ़े जाने लगे। रामचरित मानस से केवल ‘सुंदर कांड’ का सस्वर पाठ होता रहा। एकबार अखंड रामायण का पारायण सतत 24 घण्टों हुआ था घर में खूब आनन्द रहा।

दूसरा हमारा क्लासिक ‘महाभारत’ पुस्तक के रूप में उन दिनों घर में रखने का प्रचलन नहीं था। वह मंदिरों में जरूर रखी जाती थी। भागवत कथा आदि बरसात के चौमासे में होती तो कुछ महाभारत के अंश कान में पड़ जाते थे। कथा के बाद वितरित होने वाला प्रसाद और कथा का वाचन खास अंदाज में करते फूलों,गजरों से श्रंगार किये वृंदावन महाराज का अवलोकन हमारे आनन्द का विषय हुआ करता था। बाद में ‘बाल महाभारत’ जरूर काकाश्री ने ‘बुक क्लब’ के अंतर्गत उपलब्ध कराई थी।
ये बचपन की यादें हैं। बाद में दूरदर्शन के सीरियलों,फिल्मों और पत्र पत्रिकाओं में छूट पुट पढ़ते हुए महाभारत आदि के प्रसंगों को जाना। ये कथाएं हमारे लोक में इतने गहरे से व्याप्त है कि बगैर कुछ खास पढ़े भी बच्चा बच्चा बहुत कुछ जानने लगता है। महाभारत के संदर्भ में अपनी इस पृष्ठभूमि को बताने का प्रयोजन इसलिए है कि पिछले दो दिनों में मैंने सुश्री अनघा जोगलेकर के उपन्यास ‘अश्वत्थामा यातना का अमरत्व’ को पढ़ा है।

पढ़ना इसलिए भी जरूरी था कि मैं जानना भी चाहता था कि वर्तमान समय में इस पौराणिक महत्व के विषय पर कोई समकालीन रचनाकार आखिर किस दृष्टि से इसका निर्वाह किस तरह करता है।अनघा जोगलेकर ने वस्तुतः उस दौर के एक सामान्य पात्र के माध्यम से अश्वत्थामा की कहानी का पुनरप्रस्तुतिकरण किया है। जो पाठक को बांधे रखता है। उनकी भाषा और रचना विषय के उपयुक्त और सुंदर है। समकालीन साहित्य के मेरे जैसे सामान्य पाठक के लिए इसे पढ़ना बहुत कुतूहल पूर्ण और अलग अनुभव से गुजरना भी रहा। अच्छा लगा, देखी गई कई पौराणिक फिल्मों की तरह आनन्द भी आया। अश्वत्थामा का चित्रण करते हुए अनघा ने पात्र की यातना के कई जीवंत घृणा और वित्रश्ना से भरे प्रभावी दृश्य रचे हैं।
इस रचना में अनघा के लेखकीय कौशल को देखने के अवसर मिलते हैं। बहुत से पाठकों के भीतर इस रचना से ईश्वर विशेषतः कृष्ण के प्रति अपने विशेष अनुराग और आस्था की खुशबू बिखेरने में भी वे सफल होती नजर आती हैं।मुझे जो इस पुस्तक में सबसे महत्वपूर्ण लगा वह इसका ‘उपसंहार’ अध्याय है, जिसमें लेखिका अश्वत्थामा सहित महाभारत के अन्य पात्रों का तालमेल और उनकी उपस्थिति को युक्तियुक्त सिद्ध करती हैं कि किस तरह अश्वत्थामा इस आधुनिक समय में आज भी जीवित है और यातना को अभी भी अमरत्व का अभिशाप प्राप्त है।

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