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अष्टविनायक: त्रेतायुग में लिया था मोरेश्वर गणेश ने अवतार, वाहन था मोर.

Posted on: 10 Sep 2018 13:21 by shilpa
अष्टविनायक: त्रेतायुग में लिया था मोरेश्वर गणेश ने अवतार, वाहन था मोर.

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भगवान गणेश हिंदुओं के लिए प्रथम पूजनीय भगवान माने जाते हैं। उन्हें रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि का देवता माना जाता है। महाराष्ट्र की संस्कृति में गणपति का विशेष स्थान है। हिंदुओं में शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन मंगलकारक माना गया है। महाराष्ट्र में मंगल कार्य से पहले काफी श्रद्धालु अष्टविनायक दर्शन करते हैं। जिस प्रकार भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है वैसे ही गणपति उपासना के लिए महाराष्ट्र के अष्टविनायक का विशेष महत्व है। इनका पौराणिक महत्व और इतिहास है।

मोरगांव पुणे से लगभग 80 कि.मी. की दूरी पर है। यह क्षेत्र भूस्वानंद के नाम से भी जाना जाता है। जिसका अर्थ होता है- “सुख समृद्ध भूमि”। मयूरेश्वर या ‘मोरेश्वर’ भगवान गणेश के अष्टविनायक मंदिरों में से एक है। यह मंदिर महाराष्ट्र राज्य के मोरगांव में करहा नदी के किनारे बसा है।

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भगवान ब्रह्मा ने श्रीगणेश के हर युग के अवतार की भविष्यवाणी की थी, मयूरेश्वर भगवान गणेश का त्रेतायुग का अवतार है। इस अवतार में भगवान का वाहन मोर था इसलिए इस मूर्ति को मयूरेश्वर के नाम से जाना जाता है। इसलिए इस गांव का नाम पड़ा मोरगांव। मोरगांव का मयूरेश्वर मंदिर अष्टविनायक के आठ प्रमुख मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि यहां मूर्ति पहले छोटी थी, लेकिन सालों से भगवान को सिंदूर लगाएं जाने की वजह से आज मूर्ति बड़ी दिखाई देती है।

माना जाता है कि यहां भगवान गणेश ने सिंधुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। उन्होंने मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर से युद्ध किया था। इसी से इसका नाम मयूरेश्वर पड़ा। मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें हैं और लम्बे पत्थरों की दीवारें हैं। यहां चार द्वार हैं जो चारों युगों सतयुग,त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के प्रतीक हैं। इसके द्वार पर शिवजी के वाहन नंदी की मूर्ति स्थापित है जिसका मुंह भगवान गणेश की ओर है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में शिव जी और नंदी इस मंदिर क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके थे, बाद में नंदी ने यहां से जाने से इंकार कर दिया। तभी से नंदी यहीं विराजे हैं। नंदी और मूषक दोनों ही मंदिर के रक्षक के रूप में तैनात हैं। यहां गणेश जी बैठी मुद्रा में विराजमान हैं उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं और सूंड बाईं ओर है।

इस जगह का नाम मोरगांव इसलिए पड़ा क्योंकि एक समय पर यह क्षेत्र मोर के जैसा आकार लिए हुए था। इसके अलावा कहा जाता है कि एक समय पर इस क्षेत्र में बडी संख्या में मोर पाए जाते थे। इसी कारण से यह जगह मोरगांव के नाम से प्रसिद्ध हुई।

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