अष्टविनायक: थेऊर में विराजमान है श्री चिंतामणि जी

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ashtavinayak, chintamani ji tempal in theur.

भारतीय दर्शन और जीवन पद्धति में चित्त स्थिर करना एक बड़ी साधना माना जाता है वर्तमान युग में यह अत्यंत कठिन है। इसलिए चित्त की स्थिरता प्राप्त करने के उद्देश्य से थेउर की यात्रा की जाती है यहां के बारे में ऐसी मान्यता है कि प्रजापति ब्रह्मा जी के मन में एक बार चंचलता उत्पन्न हुई उन्होंने अपना चित्त स्थिर करने के लिए श्री गणेश जी की आराधना की और इसके बाद जिस स्थान पर उनका चित्त स्थित हुआ। उसी का नाम थेऊर नाम से प्रसिद्ध हो गया। मुंबई से खंडाला का बोर घाट पार करके पुणे में प्रवेश करते ही थेऊर के चिंतामणि जी का भव्य मंदिर दिखाई देने लगता है।

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इस स्थान से जुड़ी एक प्राचीन कथा भी प्रचलित है। प्राचीन युग में अभिजीत नाम का एक राजा था इसकी कोई संतान नहीं थी राजा ने अपनी पत्नी के साथ जाकर वन में घोर तपस्या की। इसके पश्चात उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम गणराजा रखा गया। गणराजा अत्यंत वीर और पराक्रमी थे लेकिन उनके उग्र स्वभाव के कारण लोग उस से भयभीत रहते थे। गणराजा एक बार कपिल मुनि के आश्रम में गये वहां मुनि ने उनका आदर सत्कार करते हुए, चिंतामणि रत्न की सहायता से 5 पकवानों का स्वादिष्ट भोजन कराया। चिंतामणि एक अद्भुत रत्न था गणराजा इस रत्न से बेहद प्रभावित हुए और उसने मुनि से यह रत्न देने की मांग की मुनि ने इनकार कर दिया। तब राजा ने जबरदस्ती वह रत्न कपिल मुनि से छीन लिया।

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इस घटना से मुनि बेहद दुखी हुए और उन्होंने दुर्गा देवी की आराधना की और उनसे यह कहा कि वह चिंतामणि रत्न वापस दिलाएं। इस पर दुर्गा जी ने मुनि से विनायक जी की उपासना करने के लिए कहा। मुनी ने विनायक जी की उपासना करके उन्हें प्रसन्न कर लिया और वरदान के रूप में चिंतामणि रत्न वापस दिलाने की प्रार्थना की इसके बाद विनायक जी और गणराजा का कदंब वृक्ष के निचे घमासान युद्ध हुआ। जिसमें गणराजा मारा गया विनायक जी ने कपिल मुनि को चिंतामणि रत्न सौंप दिया लेकिन मुनि की रत्न प्राप्ति की इच्छा तब तक समाप्त हो चुकी थी। इसलिए उन्होंने इस रचना को गणेश जी के गले में बांधकर उसी स्थान पर मूर्ति की स्थापना की तबसे यह स्थान चिंतामणि के रूप में विख्यात हो गया।

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थेऊर में विराजमान चिंतामणि जी की मूर्ति स्वयंभू होकर बायीं सूंडवाली है और उनका मुंह पूर्व की ओर है मूर्ति की आंखों में रत्न और मानिक जड़े हैं। कहा जाता है कि सच्चे मन से इस स्थान पर चिंतामणि जी की आराधना की जाए तो मनुष्य के सभी दुख दूर होते हैं। यहां के मंदिर का सभामंडप लकड़ी का बना हुआ है जो अत्यंत भव्यतम दिखाई देता है । मंदिर में ध्यान धारणा करने के लिए स्थान बनाए गए हैं, जिन्हें ओवरी कहा जाता है। यहीं पर भगवान भोलेनाथ भी विराजमान है। इस मंदिर के निर्माण के साथ मोरया गोसावी जी की वंशज धरनीधर महाराज देवजी का नाम भी जुड़ा हुआ है। इसके बाद माधवराव पेशवा जी ने मंदिर सभामंडप बनवाया ऐसा भी उल्लेख मिलता है। माधवराव पेशवा के बारे में कहा जाता है, कि उनके आराध्य देवता चिंतामणि जी ही थे पेशवा ने मंदिर में अनेक धार्मिक कार्यक्रमों के साथ ही पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार भी किया अंत में उन्होंने अपने प्राण गजानन गजानन करते हुए चिंतामणि जी के चरणों में ही त्याग दिए। पेशवा जी की समाधि चिंतामणि मंदिर के प्रांगण में ही बनी हुई है। इस महान देशभक्त की गाथा हमें यही संदेश देती है कि सच्चे मन से गणेश जी की आराधना करने पर उनकी कृपा का प्रसाद मिल ही जाता है।

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थेऊर में भाद्रपद में प्रतिपदा से सप्तमि तक और माघ में अष्टमी तक प्रमुख त्यौहार मनाया जाता है। इस समय यहां पर लाखों गणेश भक्त एकत्रित होकर द्वारयात्रा में भी शामिल होते हैं। इस स्थान की देखरेख चिंचवड देवस्थान ट्रस्ट द्वारा की जाती है।

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