मध्यप्रदेश के बुनियादी ढांचे को नई मजबूती देने की दिशा में राज्य सरकार एक और बड़ी सड़क परियोजना पर काम शुरू करने जा रही है। भोपाल और ग्वालियर के बीच नया 4-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद दोनों शहरों के बीच की दूरी लगभग 80 किलोमीटर कम हो जाएगी और यात्रा का समय भी काफी घट जाएगा।
मध्यप्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MPRDC) इस महत्वाकांक्षी परियोजना को बीओटी (बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर) मॉडल पर विकसित करेगा। परियोजना की डीपीआर तैयार करने के लिए इसी महीने टेंडर जारी किए जाने की तैयारी है। सरकार का लक्ष्य अगले तीन वर्षों में इस कॉरिडोर का निर्माण पूरा करना है।
सफर होगा आसान
वर्तमान में भोपाल से ग्वालियर की यात्रा में लगभग 7 से 8 घंटे का समय लगता है। नया ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनने के बाद यह सफर करीब साढ़े पांच घंटे में पूरा किया जा सकेगा। इससे यात्रियों को समय की बचत होगी और दोनों शहरों के बीच आवागमन अधिक सुविधाजनक बन जाएगा।
राज्य सरकार ने महाराष्ट्र में विकसित आधुनिक सड़क परियोजनाओं का अध्ययन करने के बाद इस मॉडल को मध्यप्रदेश में लागू करने का निर्णय लिया है। सरकार का मानना है कि ग्रीनफील्ड कॉरिडोर प्रदेश में तेज, सुरक्षित और आधुनिक सड़क कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
कई अन्य ग्रीनफील्ड कॉरिडोर भी प्रस्तावित
भोपाल-ग्वालियर कॉरिडोर के अलावा प्रदेश में कई अन्य महत्वपूर्ण मार्गों पर भी ग्रीनफील्ड सड़क परियोजनाओं की योजना पर काम चल रहा है। इनमें भोपाल-इंदौर, भोपाल-मंदसौर, सागर-सतना, सागर-जबलपुर और जबलपुर-आशापुर मार्ग शामिल हैं। इन परियोजनाओं की डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया भी जारी है।
MPRDC के प्रबंध संचालक भरत यादव के अनुसार जिन मार्गों पर वाहनों का दबाव सबसे अधिक है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर विकसित किया जा रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य यात्रा समय कम करना, माल परिवहन को सुगम बनाना और आर्थिक गतिविधियों को गति देना है।
बीओटी मॉडल पर होगा निर्माण
परियोजना को बीओटी मॉडल पर विकसित किया जाएगा। इसके तहत कुल लागत का 20 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 20 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार वहन करेगी। शेष 60 प्रतिशत निवेश निर्माण एजेंसी या ठेकेदार द्वारा किया जाएगा।
निवेश की भरपाई के लिए निर्माण एजेंसी को निर्धारित अवधि तक मार्ग पर टोल टैक्स वसूलने का अधिकार दिया जाएगा। इस व्यवस्था से सरकार पर वित्तीय बोझ कम होगा और परियोजना को तेजी से पूरा किया जा सकेगा।











