मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य की ब्लड बैंक व्यवस्था में अहम बदलाव करते हुए स्पष्ट किया है कि अब बिना NAT जांच के रक्त चढ़ाने की अनुमति नहीं होगी। यह फैसला सतना में सामने आई घटना के बाद लिया गया है, जहां रक्त सुरक्षा और जांच प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। सरकार का कहना है कि नई नीति का लक्ष्य मरीजों के लिए सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना और ट्रांसफ्यूजन से जुड़ी जटिलताओं को कम करना है।
स्वास्थ्य तंत्र से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, नई ब्लड बैंक नीति में रक्त की स्क्रीनिंग को प्राथमिक स्तर पर रखा गया है। सामान्य जांच के साथ NAT टेस्ट को अनिवार्य करने का निर्णय इसी दिशा में लिया गया है। नीति का मूल संदेश यह है कि ट्रांसफ्यूजन से पहले रक्त की गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं होगा।
राज्य में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि ब्लड से फैलने वाले संक्रमणों के जोखिम को कम करने के लिए जांच व्यवस्था को अधिक आधुनिक बनाया जाए। NAT तकनीक को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह संक्रमण की पहचान अपेक्षाकृत शुरुआती चरण में करने में मदद करती है। सरकार का मानना है कि इस कदम से ब्लड ट्रांसफ्यूजन की सुरक्षा मानकों में सुधार होगा।
सतना घटना बनी नीति बदलाव की पृष्ठभूमि
सरकार के इस फैसले की पृष्ठभूमि में सतना की वह घटना है, जिसने ब्लड ट्रांसफ्यूजन सिस्टम पर बहस तेज कर दी थी। उस मामले के बाद रक्त की जांच, उपलब्धता और निगरानी से जुड़े कई सवाल सामने आए थे। अब राज्य स्तर पर यह संदेश दिया गया है कि रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया में तकनीकी जांच अनिवार्य मानक के तौर पर अपनाई जाएगी।
प्रशासनिक स्तर पर माना जा रहा है कि इस फैसले से अस्पतालों और ब्लड बैंकों की जवाबदेही भी बढ़ेगी। जांच से जुड़े रिकॉर्ड, ट्रेसबिलिटी और प्रक्रिया पालन को लेकर मॉनिटरिंग मजबूत करने की जरूरत भी रेखांकित की गई है। इससे भविष्य में विवादों और शिकायतों की गुंजाइश कम होने की उम्मीद जताई जा रही है।
NAT टेस्ट क्यों अहम माना जाता है
NAT यानी न्यूक्लिक एसिड टेस्टिंग, रक्त में संक्रमण से जुड़ी आशंकाओं की पहचान के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह HIV, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी जैसे संक्रमणों की पहचान में उपयोगी मानी जाती है, खासकर उस चरण में जब सामान्य जांच से संक्रमण पकड़ना कठिन हो सकता है। इसी वजह से कई जगह इसे ब्लड सेफ्टी के उन्नत मानक के रूप में अपनाया गया है।
मध्य प्रदेश में इसे अनिवार्य करने का निर्णय मरीज सुरक्षा की दृष्टि से बड़ा कदम माना जा रहा है। स्वास्थ्य संस्थानों के लिए अब यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि ट्रांसफ्यूजन के लिए जारी रक्त NAT स्क्रीनिंग से गुजरा हो। इससे सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराने की राज्य की नीति को स्पष्ट दिशा मिलेगी।
अस्पतालों और ब्लड बैंकों पर क्या असर
नई नीति लागू होने के बाद सरकारी और निजी दोनों तरह के अस्पतालों को अपनी ट्रांसफ्यूजन प्रक्रिया को अद्यतन करना होगा। ब्लड बैंक स्तर पर जांच की उपलब्धता, तकनीकी क्षमता और प्रक्रिया अनुपालन को लेकर तैयारियां बढ़ेंगी। जहां NAT सुविधा सीमित है, वहां समन्वय आधारित मॉडल या रेफरल व्यवस्था जैसे विकल्पों पर काम करना पड़ सकता है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, नीति का उद्देश्य केवल नियम जोड़ना नहीं बल्कि पूरी ट्रांसफ्यूजन चेन को सुरक्षित बनाना है। यानी रक्त संग्रह से लेकर जांच, भंडारण और मरीज तक पहुंचने के हर चरण में गुणवत्ता नियंत्रण पर जोर रहेगा।
रक्त सुरक्षा पर व्यापक संदेश
मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले को रक्त सुरक्षा पर सख्त रुख के तौर पर देखा जा रहा है। सतना घटना के बाद उठे सवालों का संस्थागत जवाब देने की कोशिश इस नीति में दिखाई देती है। आने वाले समय में इसके प्रभाव का आकलन इस आधार पर होगा कि अस्पतालों में सुरक्षित रक्त की उपलब्धता कितनी बेहतर होती है और ट्रांसफ्यूजन से जुड़े जोखिम कितने घटते हैं।
फिलहाल स्पष्ट संकेत यही है कि राज्य अब ब्लड ट्रांसफ्यूजन को सिर्फ उपचार प्रक्रिया नहीं, बल्कि हाई-प्रायोरिटी पब्लिक हेल्थ प्रोटोकॉल की तरह लागू करना चाहता है। NAT जांच की अनिवार्यता उसी दिशा में सबसे केंद्रीय बदलाव है।











