मजदूरों के परिश्रम, पुरुषार्थ और पसीने से फिर जीवंत हुई मालवा की परंपरा

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नितिनमोहन शर्मा। हुजूर, बनेटी घुमा लेने देना जी भरकर। थोड़े कुर्राटे मारने देना। पटेबाजी के करतब दिखा लेने देना। थोड़ा दंड-पट पर खम भी ठोकने देना। उस्ताद खलीफाओं को आदर-अदब देना। धकीयाना मत। सीटियां मत बजाने लग जाना। बड़ी मेहनत की है पहलवानों ने मालवा के इस सालाना जलसे के लिए। उनको अपनी कला के प्रदर्शन का वक्त देना। दो तीन बरस का इंतजार भी किया है। आखिर अखाड़े ही तो “सनातन” की आन बान शान है। इन अखाड़ो को उसी शान से चलने देना। अखाड़ो के आगे पीछे पुलिसबल लगवाकर उनको दुड़वाना मत। बनने देना बेहतरीन गोल घेरा। चलने देना पटा-बनेटी का खेल। लेजिम की झंकार ओर ढोल की थाप गूंजने देना। आख़िर ये अखाड़े ही तो इस रतजगे की रात में झांकियों की शान है। हमारा मान-अभिमान है।

 

साहब बहादुर, जल्दी मत करना घर जाकर आराम करने की। अहिल्या नगरी का ये सालाना उत्सव ” भुनसारे ” तक चलता है। ये शहर की पहचान से जुड़ा उत्सव है। 90 बरस से ज्यादा हो गए है। यू ही कोई परंपरा इतने बरस जिंदा नही रहती है। उत्सवधर्मी शहर का जज्बा इसमे पहले दिन से शामिल है। मजदूरों के पसीने से सिंचित कलाकारी नयनाभिराम झांकियों के काँरवे के साथ शहर की सड़कों पर होगी। झिलमिल झिलमिल, रोशनी से नहाई इन झांकियों के साथ शहर को रतजगे की बरसो बरस पुरानी आदत है। ये आदत अब रिवायत हो गई है। कभी इस उत्सव के लिए शहर में अगल बगल के नगर कस्बों और गांवों से “टुल्लर के टुल्लर” चले आते थे। तब दो तीन दिन तक ये उत्सव ओर इसके बंदोबस्त चलते थे। कोई अफसर, कारिंदा थकता नही था। आप भी उसी जज्बे को जीते हुए झांकियों वाली रात में “इंदौर की झांकी” जमाने मे मददगार बनना। कोई तकनीकी कारणों से झांकी अटक भी जाए तो उसे एक तरफ मत करना। मजदूरों के साथ उसकी मरम्मत में जुट जाना और झांकी को फिर चल समारोह के कारवे में शामिल कर देना। मजदूरों का उत्साह दूना हो जाएगा साहब जी।

इंदोरियो, सदल-बल आना। सपरिवार आना। बाल-गोपालो को लाना। कंजूसी मत करना। दाद देने में। पीठ थपथपाने में। उस जज्बे को प्रणाम भी करना जो मिल से जुड़े मजदूर…बरस दर बरस आपके सामने पेश करते है। न उनके पास कोई रुपया पैसा, न कोई संसाधन है। झांकी बनाने की जगह तक नही। न तार। न बिजली। न छत। न जमीन। पटिया। लकड़ी। टाट। मिट्टी। गारा भी नही। फिर भी आपके लिए, आपके शहर के लिए, आपकी परम्परा को जीवित रखने के लिए तिल तिल कर रोज मर रहे मजदूर फिर उठ खड़े हुए है। अपने परिश्रम और पुरुषार्थ से उन्होंने दो दर्जन सुंदर झांकियो का संसार रचा बसा दिया है। माटी के पुतलों में प्राण फूंक दिए है। इन झांकियों में देव दानव यक्ष गन्धर्व के साथ सामाजिक विषयों का ऐसा सुंदर संसार रचा है की हजारों हजार आंखे अपलक निहारती रह जायेगी।

दिन ढलने देना, ये रतजगे की रात है। समूचा उत्सव दिन ढलने ओर आसमान पर अंधेरे का शामियाना तनने के बाद शुरू होता है। झिलमिल रोशनी का संसार तभी तो सजता सँवरता है। आप 6 बजे से झांकी चिमनबाग पर लाकर खड़ी मत करना। कर दो तो आगे बढ़ाने की जल्दी मत करना। आपको नही पता क्या 6 बजे शहर उत्सव के लिए तैयार ही नही होता। स्वागत मंच भी तब तक तो अधूरे रहते है। और वो कद्रदान तो रहते ही नही, जिनके लिए उत्सव है। जब दर्शक ही नही तो झांकियों के कारवे को 6 बजे से आगे बढ़ाने की हर बरस हायतोबा क्यो? बाद में होता वो ही है जो गजानन चाहते है। फिर सूरज की रोशनी में चांद जैसी सुंदर झांकियों की सुंदरता नजर आती है क्या?? आपकी जल्दबाजी में पूरा कारवां फिर बिखर जाता है। आप सरकारी झांकी तो फ़टाफ़ट रवाना कर देते है। मिलो की झाँकिया ओर सरकारी झांकियों के बीच मील दो मील का फासला हो जाता है। ये फ़ासला उत्सव का मजा फीका कर देता है और आपकी व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगाता है। इसलिए साहब, दिन ढलने का इंतजार करना।

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खाने-कमाने देना
शहर के सबसे बड़े उत्सव की रात रोज खाने कमाने वालों के नाम भी रहती है। कोई 10 किलो पोहे गला लेगा तो कोई 20 लीटर दूध लेकर बैठेगा। फुग्गे-पुंगी, बंसी-बाजे, पिपडी बेचने वाले भी बड़ी उम्मीद से आते है इस जलसे में। ये एक रात उनको आने वाली दो चार दस रात भरपेट सुलाती है। खाने कमाने देना इन लोगो को। भगाना मत। लतियाना मत। धकियाना मत। जो लाये है..वो खुट जाए… बस ये ही इनका उत्सव रहता है। ध्यान रखना…!!

मदद
अगले बरस आर्थिक मदद महीने पंद्रह दिन पहले कर देना। नगर निगम प्राधिकरण ओर जिलाधीश के साथ उन सबका आभार जिन्होंने परंपरा को जिंदा रखने के लिए सहायता दी। बस ये मदद पहले हो जाये तो मजदूरों का कलेजा भी खुल जायेगा और वो बेफिक्र हो झांकी निर्माण करेंगे। वादा भी याद रखना। आप सबने अगले बरस मदद का आंकड़ा दूना करने का वचन दिया है।

जय गजानन
अलविदा लम्बोदर
अगले बरस जल्दी आना…!!