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हमसे का भूल भई जो ये सजा हमको मिली

दिनेश निगम ‘त्यागी’

निगम-मंडलों में नियुक्तियों के मामले में कुछ की लाटरी लगी तो कुछ मायूस हैं। हर स्तर पर दोहरा रवैया देखने को मिला। भाजपा के संभागीय संगठन मंत्री रहे नेताओं को ही लें, इनके साथ भी एक जैसा व्यवहार नहीं हुआ। जब दायित्व से मुक्त किया गया था तब से ही खबर थी कि संगठन मंत्रियों को निगम-मंंडलों में जगह दी जाएगी। ऐसा हुआ भी, लेकिन आधा अधूरा। संभागीय संगठन मंत्री रहे शैलेंद्र बरुआ, जितेंद्र लटोरिया एवं आशुतोष तिवारी को जगह मिल गई लेकिन चंबल-ग्वालियर, सागर एवं रीवा संभागों का दायित्व संभालने वाले केशव सिंह भदौरिया एवं श्याम महाजन को बाहर रखा गया। ये पार्टी नेतृत्व से कहते फिर रहे हैं कि ‘हमसे का भूल भई जो ये सजा हमको मिली’।

इन्हें आश्वासन मिल रहा है कि धैर्य रखें, आगे मौका दिया जाएगा। ऐसा सिर्फ संगठन मंत्रियों के साथ नहीं हुआ। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों एवं भाजपा नेताओं की भी यही स्थिति है। सिंधिया के कई समर्थक नियुक्ति न मिलने के कारण असंतुष्ट हैं। भाजपा में एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री का एक भी समर्थक सूची में जगह नहीं पा सका। मुख्यमंत्री के समर्थकों में भी असंतोष के बीज अंकुरित हैं। भाजपा नेतृत्व इस असंतोष से कैसे पार पाता है, देखने लायक होगा।

मन बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है….

आयोजन था पत्रकारों के एक संगठन द्वारा नए वर्ष पर आयोजित ‘गेट टू गेदर’ का। इसमें कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, पीसी शर्मा एवं नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता भी पहुंचे थे। वहां फुग्गे पर गन से निशाना लगाने की भी व्यवस्था थी। संयोग ऐसा हुआ कि कई नेताओं के निशाने चूक गए लेकिन कमलनाथ ने एक ही निशाने पर फुग्गे को फोड़ दिया। बस क्या था, कांग्रेस समर्थक उछल पड़े। वे कहने लगे कि कमलनाथ का निशाना अचूक होता है। लगे हाथ कांग्रेस की सत्ता में वापसी के कयास लगाए जाने लगे। इसे ही कहते हैं ‘मन बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है’। कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस दो फाड़ हो गई और सत्ता से बेदखल भी।

इसके बाद हुए उप चुनावों में कांग्रेस को लगातार पराजय का सामना करना पड़ रहा है। बावजूद इसके कमलनाथ अब भी कांग्रेस के सभी प्रमुख पदों पर काबिज हैं। इसमें वे पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के नजदीक होने और वरिष्ठ होने का लाभ उठा रहे हैं। असफलताओं के बीच एक फुग्गे पर निशाना लग गया तो कहा जाने लगा कि कमलनाथ का निशाना अचूक होता है। कार्यकर्ता करें भी तो क्या, ‘उम्मीद है कि टूटती नहीं’ की तर्ज पर वे अब भी सत्ता में वापस आने का सपना देखते हैं। ऐसे में कोई छोटी घटना भी उन्हें उत्साहित कर देती है।

भक्ति है कि कम होने का नाम नहीं लेती….

भक्त मतलब नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक। ये विपक्ष के निशाने पर रहते हैं। सोशल मीडिया में इन्हें लेकर तरह-तरह के कार्टून बनते हैं, मजाक उड़ाया जाता है। बावजूद इसके ‘भक्ति है कि कम होने का नाम नहीं लेती’। यह मोदी की लोकप्रियता का पैमाना भी है। पंडित जवाहर लाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी, ऐसी भक्ति कभी किसी नेता के प्रति नहीं देखी गई। कौन कितना बड़ा मोदी भक्त है, इसे लेकर काम्पटीशन के हालात रहते हैं। पंजाब में घटी ताजा घटना को ही लीजिए। निश्चित तौर पर यह सुरक्षा में चूक का बड़ा मामला है और इसके लिए जो अफसर दोषी हों, उनके खिलाफ कार्रवाई होना चाहिए।

लेकिन भाजपा में तो सबसे बड़ा भक्त कौन, यह दिखाने की होड़ छिड़ गई। महामृत्यंजय जाप होने लगा, मौन धरना शुरू हो गया, मशाल जुलूस निकाले जाने लगे, हस्ताक्षर अभियान चल पड़ा। अर्थात खुद को सबसे बड़ा मोदी भक्त साबित करने के लिए जो कुछ किया जा सकता है, उससे ज्यादा किया जा रहा है। एक नेता ने बोल दिया कि ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, इतना दबाव बढ़ा कि अगले ही दिन उन्हें सफाई में लेख लिखना पड़ गया। यह मोदी के प्रति भक्ति भी है और उनका डर भी। सच यह है कि इससे मोदी की लोकप्रियता में चार चांद लग रहे हैं।

इन तीन कद्दावर नेताओं का अलग अंदाज….

इस हफ्ते प्रदेश में भाजपा के तीन कद्दावर नेता अपने अलग अंदाज के कारण चर्चा में रहे। ये हैं प्रदेश सरकार के मंत्री गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय। भार्गव की गिनती सच बोलने वाले नेता के रूप में होती है। इस बार उनसे नरोत्तम मिश्रा के अचानक दिल्ली जाने पर सवाल किया गया। उन्होंने कह दिया कि नेताओं को बार-बार दिल्ली के चक्कर नहीं लगाना चाहिए। इससे कुछ नहीं होता। इसकी बजाय अपने विभाग और लोगों के काम पर ध्यान देना चाहिए। भार्गव ने कहा कि मैं तो दिल्लीवादी नहीं हूं।

नरोत्तम के बारे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डा. गोविंद सिंह तक कह चुके हैं कि विपक्ष के साथ सबंध रखना नरोत्तम से सीखना चाहिए। अपने अलग अंदाज के कारण ही नरोत्तम दिल्ली से लौटे और सीधे गोपाल भार्गव के बंगले जा कर सभी को चौंका दिया। कैलाश विजयवर्गीय यारों के यार हैं लेकिन कई बार अपने बयानों के कारण आलोचना का शिकार हो जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब घटना को लेकर उन्होंने बोल दिया कि यह कोई बड़ी बात नहीं, ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। यह कह विजयवर्गीय चर्चा में आ गए। इन तीनों ने अपने पुरुषार्थ के बदौलत राजनीति में मजबूत जगह बनाई है।

सुर्खियों में कांग्रेस का यह असरदार सरदार….

कांग्रेस का एक असरदार सरदार सुर्खियों में है। ये और कोई नहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा हैं। सलूजा की जितनी चर्चा कांग्रेस में है, इससे कहीं ज्यादा भाजपा में। वजह सलूजा का अपने दायित्व के प्रति समर्पण और मुद्दों को बिना देर किए लपकना है। जैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कार्यक्रम में भोपाल आने वाले थे तो कुछ कुर्सियां खाली थीं। बात उठी इन्हें संभालो वर्ना सलूजा का ट्वीट आ जाएगा, इसे संभालते उससे पहले ट्वीट आ भी गया। इसी प्रकार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक दौरे के दौरान एक ग्रामीण के घर चूल्हें में बना खाना खाने वाले थे, अचानक उज्वला योजना पर व्यंग करता सलूजा का ट्वीट आ टपका।

मास्क पर पाबंदियों के बीच भाजपा नेताओं के भीड़ के बीच होने के फोटो लगातार ट्वीट के जरिए शेयर हो रहे हैं। कांग्रेस में यह कोई और नहीं, सलूजा ही कर रहे हैं। इस तरह शायद ही कोई ऐसा मुद्दा हो, जिसे लेकर भाजपा को घेरने में सलूजा देर करते हों। यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा की मौजूदगी में एक नेता ने कहा कि कॉश! भाजपा में भी सलूजा जैसा एक सरदार होता, जो बिना देर किए असरदार निशाना साधने में माहिर है।

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