इंदौर के सहकारिता उपायुक्त तथा प्रमुख सचिव के बीच चल रहा है घमासान

सरकारी नौकरी में ऐसा कहा जाता है कि ईमानदारो का तो हर जगह जीना मुश्किल है लेकिन बेईमानों को बचाने के लिए सब खड़े हो जाते हैं ऐसा ही हुआ है

अर्जुन राठौर

सरकारी नौकरी में ऐसा कहा जाता है कि ईमानदारो का तो हर जगह जीना मुश्किल है लेकिन बेईमानों को बचाने के लिए सब खड़े हो जाते हैं ऐसा ही हुआ है इंदौर के सहकारिता विभाग में जहां दो रिश्वतखोर इंस्पेक्टर प्रमोद तोमर तथा संतोष जोशी को लोकायुक्त द्वारा रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ा गया । इसके बाद इनकी शिकायत भोपाल गई जहां प्रमुख सचिव केसी गुप्ता ने इन दोनों को इंदौर ऑफिस से रिलीव करने का आदेश दे दिया लेकिन इंदौर के सहकारिता उपायुक्त ने इनको सरंक्षण देते हुए दोनों को इस वजह से रिलीव नहीं किया कि भू माफियाओं के खिलाफ जांच चल रही है और इन दोनों के जाने से जांच प्रभावित हो सकती है इसलिए इन्हें रोक लिया जाए।

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सहकारिता उपायुक्त ने प्रमुख सचिव केसी गुप्ता के आदेश की धज्जियां उड़ा दी बाद में जब यह पूरा मामला प्रमुख सचिव को पता चला तो वे भी हैरान रह गए कि जो आदेश उन्होंने 1 साल पहले दिया था उसका तत्काल पालन क्यों नहीं हुआ ? जाहिर है कि सहकारिता उपायुक्त ने प्रमुख सचिव के आदेश को धता बताकर दोनों को रिलीव ही नहीं किया और अंदर की बात तो यह है कि भू माफियाओं के खिलाफ जांच करने की बजाय माफियाओं को मदद पहुंचाने के लिए इन दोनों रिश्वतखोरों को इंदौर में ही रखा गया।

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प्रमुख सचिव केसी गुप्ता ने भी इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट आदेश जारी कर दिया है कि इन दोनों के वेतन अब इंदौर कार्यालय से जारी नहीं किए जाएंगे और इन्हें तत्काल वहां से रिलीव कर दिया जाए इन दोनों इंस्पेक्टरों के अलावा कई अन्य इंस्पेक्टरों को भी यहां से हटाने के लिए आदेश दिए गए थे अब उनके मामले में भी सहकारिता उपायुक्त इंदौर का यह कहना है कि वे स्वास्थ्य कारणों से रुक गए थे तो क्या पूरे 1 साल तक यह सभी अस्पताल में भर्ती रहे? इसीलिए इन्हें रिलीव नहीं किया गया। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि इंदौर के सहकारिता उपायुक्त अपने आप को प्रमुख सचिव से भी ऊपर मानते हैं।