महिला मतदाताओं से तय होगा, इस बार का जनादेश!

महिला मतदाताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ‘कुटुंब’ केन्द्रित योजनाओं के वशीभूत भाजपा को वोट दिया है तो सब कुछ अनुकूल होगा, अन्यथा उनकी नाव डगमगाने लगेगी!

निरुक्त भार्गव: इस बार के नगरीय निकाय चुनावों के परिणामों को 2023 में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. पूर्वानुमान लगाए जा रहे हैं कि इन स्थानीय निकायों में जो दल स्पष्ट रूप से बढ़त ले लेगा, विधानसभा चुनावों में उसकी जीत की संभावनाएं उतनी ही प्रबल हो जाएंगी! वानप्रस्थी की तरफ अग्रसर कांग्रेस पार्टी क्या ‘खोया-क्या पाया’ वाली मानसिकता में दिखाई देती है, लेकिन भाजपा के लिए तो ‘करो अथवा मरो’ जैसे हालात हैं! नए-नए स्लोगन रचने में माहिर भाजपा नेताओं ने इन चुनावों को फतह करने के लिए अपने स्तर पर काफी सारी तैय्यारियां की थीं: बूथ लेवल तक ‘त्रिदेव’ नाम से अलंकृत समर्पित कार्यकर्ताओं की प्रशिक्षित और दीक्षित टीम भी उनमें शामिल थी, लेकिन मतदान के जो प्रतिशत सामने आए हैं, उससे पार्टी का श्रेष्ठी वर्ग ‘बैकफुट’ पर है! उनके मुकाबले कांग्रेस पार्टी की व्यूरचना भले-ही मुकम्मल नहीं थी, पर मतदान के रुझान सभी को हैरत में डाले हुए हैं! 17 जुलाई को पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी, किन्तु मतों की गिनती के एक दिन पहले दोनों दल पशोपेश में हैं, परिणामों को लेकर! भाजपा के कर्णधारों में तो घबराहट चरम पर है! इन सब उतार-चढ़ाव के बीच ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ लोगों का ये अनुमान है कि अगर महिला मतदाताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ‘कुटुंब’ केन्द्रित योजनाओं के वशीभूत भाजपा को वोट दिया है तो सब कुछ अनुकूल होगा, अन्यथा उनकी नाव डगमगाने लगेगी!…..

सीधे उज्जैन नगर निगम निर्वाचन को सन्दर्भ में लेते हैं: 21वीं सदी के बीते दो दशकों में पांच साल छोड़ दें तो 2000 से आज तक भाजपा के महापौर और उनके दल के पार्षद प्रभावी संख्या में चुन कर आते रहे हैं. पर मौजूदा चुनावों में तो भाजपा की गुल्ली फंसी हुई है, स्पष्ट बहुमत मिलने के बीच! इसके कई कारण हैं, जिनका विश्लेषण आगामी दिनों में होगा. मगर, इस बात का उल्लेख तो यहीं कर दिया जाना जरूरी है कि पूरे विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा जिसकी मध्यप्रदेश इकाई सबसे कारगर मानी जाती है देश-भर में और इस राज्य में उज्जैन में संगठन की जड़ें सबसे मजबूत बताई जाती हैं—उसकी असलियत एक-दो दिन में उभरकर आ ही जाएगी!

पार्टी के अंदरखाने निराशा और हताशा का जो वातावरण घर कर गया है पिछले कुछ दिनों से, उसकी परतें भी खुल रही हैं! जिन कार्यकर्ताओं ने 30 से 40 सालों के दौरान भाजपा को अपने परिश्रम से सींचा और सतह एवं क्षितिज पर परिणाममूलक विस्तार दिया, वो आज कराह रहे हैं! आरएसएस के अनुशासन और प्रखर राष्ट्रवाद को आदर्श मानकर जिन कार्यकर्ताओं ने अपना पूरा जीवन और परिवार तक झोंक दिया, उनका दुखड़ा सारे ‘सत्ताई  तिलिस्म’ को उधेड़कर प्रकट कर देता है! उज्जैन से ही भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने ‘बूथ के त्रिदेव’ कांसेप्ट का अंकुरण किया था, इसी 2022 की शुरूआत में: इस ब्रह्माण्ड में ‘त्रिदेव’ कहलाने की पात्रता और महत्ता सिर्फ ब्रह्मा, विष्णु और महेश को है, लेकिन पार्टी ने इसको भी प्रयुक्त कर लिया! बूथ अध्यक्ष, बूथ महामंत्री और बीएलए को ‘त्रिदेव’ की संज्ञा दे दी गई!

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उज्जैन में 4.61 लाख से अधिक लोगों को मतदान का अख्तियार था, मगर भाजपा के ‘त्रिदेव’ अपने-अपने आसनों पर ही टिके रहे! वो ना तो ये समझ पाए कि मतदाता सूची में शामिल लगभग 35 हजार मतदाता असल में अस्तित्व में ही नहीं हैं और और ना वो इस बात का भौतिक सत्यापन कर पाए कि कोई 25 हज़ार मतदाताओं के नाम ही उनके मतदान केन्द्रों से गायब हैं! अब जब सारी चिड़ियाएं खेतों को चुग गई हैं तो वो ढोल पीट रहे हैं कि सरकारी मुलाजिमों ने बहुत ग़दर ढहाया, भाजपा समर्थित मतदाताओं को वोट से वंचित करने के लिए! ये भी एक खुला प्रमाण है कि जितनी टेबल भाजपा ने अलग-अलग बूथों पर लगाई थीं और अपने कार्यकर्ताओं को वहां तैनात किया था, उससे कम पैमाने कांग्रेस पार्टी के भी नहीं थे! असल में ये तय करना भी मुश्किल था कि मतदान करने जाने वाले लोग इनकी टेबल पर अधिक संख्या में पूछताछ कर रहे थे अथवा उनकी!

कुछ और पहलू हैं, जिनको तफ़सील से बताया जाना चाहिए, मगर अब मुझे संकेतों का सहारा लेना पड़ रहा है: (1) उज्जैन नगर निगम के 54 वार्डों में से कोई 14 वार्डों में भाजपा के ‘अनाधिकृत’ प्रत्याशी मैदान में थे और उन्होंने पूरी दीदारी के साथ चुनाव लड़ा. पार्टी ने ऐसे 30 जाने-पहचाने कार्यकर्ताओं को मतदान से पहले ही छ: वर्ष के लिए टाटा-टाटा, बाय-बाय कह दिया, (2) जो शेष उम्मीदवार थे, उनको हतोत्साहित किया गया, (3) जिन-जिन वार्डों में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व है, वहां-वहां भाजपा ने डमी प्रत्याशी खड़े नहीं किए, (4) शिवराज जी का रोड-शो उन इलाकों में नहीं करवाया गया, जहां सेंधमारी की गुन्जायिश थी, (5) ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे मारक प्रचारक को भू-माफियाओं के प्लान के तहत ऊपरी तौर पर इस्तेमाल किया गया तथा (6) विपरीत परिस्थितियों के मद्देनज़र आरएसएस से जुड़े भिन्न-भिन्न संगठनों की पुकार की गई…

उज्जैन से निकला जनादेश बहुत ऊंचा और लम्बा जाता है: मैं इस बात को दोहराना चाहता हूं कि पूर्वानुमान की शत-प्रतिशत गारंटी नहीं रहती, बावज़ूद इसके एक बात डंके की चोट पर कही जा सकती है: नाली-सड़क-पानी-बिजली और मोहल्ले का चुनाव होने पर भी सबसे ज्यादा ‘अंडर करंट’ मोदी और शिवराज का था! कोई 2.75 लाख मतदाता निकले थे अपने नुमाइन्दों को चुनने: बैरवा, बलाई, रविदास/कबीरदास/ मुस्लिम-बोहरा, माली-नाई-तेली-कुम्हार वगैरह और फिर जैन, ब्राह्मण, बनिया-ठाकुर, सिन्धी/पंजाबी तक सभी शामिल थे! इन्होंने किसको और क्यों वोट किया, अतिशीघ्र पता चल जाएगा!

जो संकेत मिले हैं उसके अनुसार कांग्रेस के महेश परमार ने पुरुष वर्ग में खासी लोकप्रियता अर्जित की है! लेकिन आज के आधुनिक और खुले युग में पुरुषों के भरोसे बात नहीं संभलती! ये तो दरअसल, स्त्रियों की सत्ता का युग है: कहा जा रहा है कि स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों/युवतियों, घरों और किचन में कार्य करने वाली महिलाओं और इनके अलावा भी जो महिला वर्ग है, जनसंख्या का कोई 48-49 फीसद, वो मोदी और शिवराज का मुरीद है! वो अपने घर के फैसले अपने अनुसार लेती हैं और मतदान करने में पुरुषों के दबावों को नहीं मानतीं! 1.30 लाख महिला मतदाताओं ने वोटिंग की है और अगर वो वाकई अपनी इच्छा से वोट करके आई हैं, तो शायद भाजपा का पलड़ा भारी हो सकता है!