इंदौर। देश भर में प्रख्यात हिमाचल प्रदेश के सेब (सेंवफल) इस साल अपनी कम गुणवत्ता के कारण किसानों से ले कर खरीदारों और मंडियों से ले कर कॉर्पोरेट व्यवसाइयों तक सबकी निराशा का कारण बनते जा रहे हैं। हर साल की तरह इस बार भी सेब के व्यापार को लेकर हिमाचल प्रदेश में काफी उम्मीद थी लेकिन ख़राब मौसम की वजह से क्वालिटी में आयी गिरावट ने इस व्यवसाय से जुड़े सभी लोगों को काफी नुक्सान पहुंचाया है। विशेषज्ञों की मानें तो इस साल मौसम उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा और सेब की खेती से जुड़ी सारी प्रक्रिया बेतरतीब तरीके से होती रही।

गौरतलब है कि शुरूआती सीजन – मई – जून के महीने में जब पेड़ों पर फूल लगते हैं, तब हिमाचल में औसत से ज्यादा गर्मी पड़ रही थी, और हवा में नमी करीब-करीब ना के बराबर थी। लेकिन जून-जुलाई के महीने में जब पेड़ों में फल आने शुरू हुए तो अप्रत्याशित बारिश ने रंग में भंग डाल दिया। हालत कुछ ऐसे हो गए की बिना पूरी साइज और रंग में आये बगैर फसल पकनी शुरू हो गयी। मौसम के उलट-फेर की वजह से किसान फसलों में खाद इत्यादि की ठीक से डाल नहीं पाए।

इसी वजह से तुड़ाई का सीजन भी इस साल अगस्त के आखिरी महीने की जगह जुलाई के आखिरी महीने से शुरू करना पड़ा। जहाँ एक तरफ सेब की कम गुणवत्ता वाली फसल पहले तैयार हो रही थी, वहीँ दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश में अर्थव्यवस्था की कमियां हालात को और ख़राब करने में लगी हुई थी। बारिश से टूटी सड़कों की वजह से सेब के परिवहन में किसानों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

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उल्लेखनीय है कि मंडियों और कंट्रोल्ड-अट्मॉस्फेअर स्टोर में आने वाले सेब पहले से ही गुणवत्ता में कम आंके गए थे। कुछ कमियां जो की आम तौर पर देखी गयी उनमे से सेबों का काम लाल होना, मिठास की कमी, साइज छोटे होना इत्यादि थे। परिणाम ये रहा की पूरा बज़ार कम गुणवत्ता वाले सेबों से भर गया। जो उम्मीद कोल्ड-स्टोरेज में रखे सेबों से थी, उनकी हालत ऐसी हो गयी है की करीब-करीब सारे ही स्टोर्स ने मार्च-अप्रैल की जगह दिसंबर से ही अपने माल मार्किट में भेजने शुरू कर दिए हैं।