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शेर का बुढ़ापा.सन्दर्भ डॉ.मुरली जोशी का इंदौर आगमन

Posted on: 22 May 2018 05:40 by Munmun Verma
शेर का बुढ़ापा.सन्दर्भ डॉ.मुरली जोशी का इंदौर आगमन

अधिकतर वाइल्ड लाइफ थ्योरी कहती हैं कि शेर शारीरिक अक्षमता के कारण आखिरी वक्त में शिकार नहीं कर पाते हैं। अतत: भूख के मारे उनकी मौत हो जाती है। मुझे लगता है थ्योरी शेर की सिर्फ शारीरिक जरूरतों पर आधारित है। हकीकत में शेर भूख से पहले स्वाभिमान पर पडऩे वाली चोटों से आहत होकर ही मर जाते होंगे। कोई शेर अपने ही इलाके में किसी और की सल्तन कैसे बर्दाश्त कर पाता होगा। शिकार को आंखों के सामने दौड़ लगाते हुए और अपने सामने बड़े हुए बच्चों को हुकूमत करते देखना शेर की सहनशीलता की सबसे कड़ी कसौटी होती होगी। उसका दम तब घुुटता होगा जब उसकी दहाड़ पर भी बंदिश लग जाती होगी। आखिर कसमसाहट की भी कोई सीमा होती है।

इंदौर में कल सियासत के एक पुराने शेर से मुलाकात हुई, तब से ये कहानी मन में घूम रही है। क्योंकि जब शेर सियासत का हो तब भी कहानी कुछ यूं ही चलती है। बावजूद इसके कि दोनों में बुनियादी स्तर पर बहुत बड़ा फर्क है। जंगल के शेर को तो ईश्वर ही शेर बनाकर भेजते हैं। जंगल की आग, हवा-आंधी, पानी और कुनबे के शेरों से बच गया तो फिर एक इलाके में उसका राज सुनिश्चित है। सियासत में तो शेर बनने के लिए एडिय़ां रगडऩी होती है। कितने उतार-चढ़ाव देखने होते हैं। अगर किसी बड़े घराने से ताल्लुक न हो तो संघर्ष की कोई सीमा ही नहीं रहती। दरी उठाने से लेकर मसनद तक पहुंचने में ही अच्छे-अच्छों का दम निकल जाता है। कितने धरने-प्रदर्शन, लाठियां, आंसू गैस और जेल की सींखचों से होकर कोई वहां तक पहुंचता है। सियासत में कोई शेर होता नहीं, तमाम बाधाओं और जोखिम पारकर बनता है।

कहते हैं, जंगल के शेर की उम्र 10 से लेकर 26 बरस तक होती है। चिडिय़ाघर में 26 तक जी लेता है, लेकिन जंगल की चुनौतियों के बीच अधिकतर 10 बरस में ही दम तोड़ देते हैं। 18 महीने की उम्र वह शिकार करने के लायक हो जाता है और ढाई बरस की उम्र में मां का साथ छोडक़र अपना इलाका बना लेता है। इसके उलट सियासत के शेर की उम्र का अंदाजा लगाना बड़ा मुश्किल है। लंबे संघर्ष के बाद हर कोई चाहता है कि कुछ पल तो वह मसनद पर सिर रखकर सुस्ता सके। रसूख के आभामंडल को महसूस कर सके। ऐलान कर पाए, अपने आदेशों को अंजाम तक पहुंचता देख पाए।

और जब लीला कुछ ही पलों में समेट ली जाए उस वक्त उसकी छटपटाहट का अंदाजा लगाना मुश्किल है। एक पल के लिए विचार कीजिए कि वह अपनी आंखों के सामने अपनी कुर्सी पर किसी की ओर बढ़ते हुए किसी को कैसे बर्दाश्त करता होगा। कुर्सी पर बने रहने की ख्वाहिश को तार-तार होते देखने से बड़ी जिल्लत उसके लिए क्या होती होगी। सत्ता के शीर्ष से हाशिए का सफर कितना पीड़ादायी होता होगा। और इसके बाद भी अगर सांसें और चेतना साथ देती रहे तो उससे भद्दा मजाक नियती उसके और क्या कर सकती है।

आंखों के सामने सत्ता के रसूख का नंगा नाच देखने को मिले। लोकतंत्र मुजरा करे और सियासत हाथों में गजरा बांधे लाल आंखों से उस पर डोरे डालते दिखाई दे। अच्छे और बुरे के सारे भेद मिट जाएं और सिर्फ सत्ता ही एकमात्र ध्येय हो जाए। सीने पर चलती वक्त की इन आरियों के बीच कोई सवाल पूछे कि जनाब ये क्या चल रहा है उस वक्त उसका मौन ही सबकुछ कह जाता है। आंखों की गहराई और चेहरे के भाव क्या पढ़ेंगे एक-एक क्षण गवाही देने लगता है उस बेचैनी की जो उसने अपने भीतर बांध रखी है।

आप मौजूदा दौर में इन शेरों में कई चेहरे रख सकते हैं। वे लालकृष्ण आडवाणी हो, मुरलीमनोहर जोशी हो, यशवंत सिन्हा हो या कोई और नाम। हर कहानी इस वक्त इसी मोड़ पर खड़ी नजर आती है। जिंदगी जैसे एक घड़ी है, जिसका पेंडुलम रुक गया है। टूटा-ठहरा, और छिन्न-भिन्न वक्त दिखाती है, लेकिन आवाज नहीं करती। समय को महसूस करती है, लेकिन इजहार नहीं कर सकती। मुंह पर पट्टी और हाथ-पैर बांधकर जिसे किसी खंदक में फेंक दिया गया है। जहां से सब दिखाई देता है, सुनाई देता है, समझ भी आता है, लेकिन बदलने की तो ठीक बोलने की भी इजाजत नहीं है।

इनके चेहरे देखकर समझ आता है कि ज्वालामुखी कैसे होते हैं और जब तक नहीं फटते तब तक भीतर कैसे उबलते हैं। इन्हें बस एक बात कहने का मन करता है, अब क्या बाकी रह गया है। कभी तो फट पड़ो।
#अमितमण्डलोई

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