Breaking News

विवादों का पर्याय ही बन गया है साध्वी प्रज्ञा का नाम

Posted on: 30 Apr 2019 18:05 by rubi panchal
विवादों का पर्याय ही बन गया है साध्वी प्रज्ञा का नाम

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर यानी भोपाल संसदीय क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार, उग्र हिंदुत्व की प्रतीक, देवास के संघ प्रचारक हत्याकांड और मालेगांव बम विस्फोट कांड में बमुश्किल बरी हुई दृढ़ महिला आदि। यदि इतना सब न कहना हो तो चंद शब्दों में उनकी शख्सियत बयां की जा सकती है। वह है विवादित बयानों या विवादों की जीती जागती प्रतिमा। जबसे उनका नाम बतौर प्रत्याशी तय हुआ है वे या तो ऐसा कोई बयान दे डालती है जो विवादित हो जाए या फिर उनकी हरकत सुर्खियां बन जाती हैं, लेकिन नकारात्मक नतीजों के साथ।

मुंबई आतंकी हमले में मारे गए एटीएस चीफ शहीद हेमंत करकरे को लेकर यह कहना कि मैंने उसे श्राप दिया था तेरा सर्वनाश होगा औऱ वह मारा गया। उनके सामने चुनाव लड़ रहे कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजयसिंह को आतंकी कह डालना या भाजपा की केंद्रीय मंत्री उमा भारती को कह देना कि वे मुझसे बहुत बड़ी हैं, वे मुझसे आशीर्वाद न मांगा करें। उन्हें हर बार बैकफुट पर जाना पड़ता है, लेकिन उससे क्या। मसलन दिग्विजयसिंह ने सीधा मोर्चा लिया औऱ कह डाला हिंदुत्व के मामले में मुझसे बहस कर लें।

वे पिछले साल ही 3300 किलोमीटर की पैदल नर्मदा परिक्रमा से निवृत्त हुए हैं। उमा भारती से हुआ विवाद सुर्खियों में आया तो उनके पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वय्ं सेवक संघ का सक्रियता बताना पड़ी। विवाद और बढ़ता इससे पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भोपाल में उमा भारती के बंगले पर पहुंच गई। सारा तमाशा चूंकि मीडिया के लिए था, लिहाजा दोनों एक-दूजे के गले लिपट कर रोईं, बड़ी देर तक हलुआ खिलाते और आशीर्वाद लुटाने के पोज देती रही औऱ वह विवाद किसी तरह शांत किया।

इस बीच एक नया विवाद भी सामने आया। संघ के नंबर दो यानी सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी का एक पत्र मीडिया में नुमायां हो गया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को संबोधित इस पत्र में साध्वी प्रज्ञा का टिकट काटने की सिफारिश की गई है। चिट्ठी सोशल मीडिया पर वाइरल होने के बाद विवाद बढ़ा तो लगे हाथ यह सफाई भी सामने आई कि यह चिट्ठी फर्जी है। संघ की ओर से भाजपा को इस तरह की चिट्ठी लिखने की तो कोई परंपरा ही नहीं है। हालांकि चिट्ठी में दोनों आला नेताओं की ग्वालियर में हुई किसी मुलाकात का संदर्भ भी था, लेकिन संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार की ओर से औपचारिक खंडन के बाद विवाद किसी तरह शांत हो गया।

गुमनाम सी हो गई मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी सीट

उम्मीदवारों की हेरफेर का प्रताप देखिए मध्यप्रदेश के सबसे बड़े महानगर इंदौर की संसदीय सीट इस बार गुमनाम सी हो गई। कभी यहां राष्ट्रीय स्तर के राजनेता या तो चुनाव लड़ते थे या जो लड़ते थे वे राष्ट्रीय हो जाया करते थे। आजादी के आंदोलन के दौरान खादी बेच-बेचकर खादीवाला का विशेषण पाने वाले कन्हैयालाल व्यास हमेशा के लिए खादीवाला ही हो गए। उनकी मौजूदा पीढ़़ी भी इस विशेषण को बतौर सरनेम प्रयोग कर रही है। इसी सीट ने कांग्रेस की ट्रेड यूनियन इंटक के दिग्गज रामसिंह भाई वर्मा को भी चुनकर लोकसभा में भेजा। वामपंथी नेतृत्व और एटक में शीर्ष पदों पर पहुंचे अपनी वक्तृत्व कला से नेहरूजी तक को रिझाने वाले कामरेड होमी दाजी भी यहीं से जीतकर लोकसभा तक पहुंचे थे।

जनता पार्टी की लहर में इंदौर ने समाजवादी युवा तुर्क कल्याण जैन को चुना था। वे मुलायमसिंह की समाजवादी पार्टी में भी राष्ट्रीय महामंत्री और अनुशासन समिति प्रमुख तक रहे। कल्याण जैन से चुनाव हारने वाले कांग्रेसी नंदकिशोर भट्ट भी इंटक की राजनीति में गहरा दखल रखते थे। इसके बाद दौर आया प्रकाशचंद सेठी का। उज्जैन से इंदौर आए सेठी ने घर-घर जनसंपर्क का रिवाज छेड़कर अपनी खास पहचान बनाई और चार बार यहीं से संसद में पहुंचे। देश के शीर्ष नेताओं में शुमार हुए। अनेक केंद्रीय मंत्रालयों को संभाला और इंदिरा गांधी की हत्या के  बाद  प्रधानमंत्री पद के लिए भी नाम चला।

उनकी लंबी राजनीतिक पारी तीन दशक पहले इंदौर में ही समाप्त हुई जब वे भाजपा की युवा नेता सुमित्रा महाजन से लोकसभा का चुनाव हर गए। राम मंदिर आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव औऱ उससे कुछ पहले ही हुए सांप्रदायिक दंगों की छाया में हुए मत विभाजन ने सेठीजी को परास्त कर दिया। ऐसा हराया कि वे उसके बाद न पार्टी में उठ सके, न ही कोई चुनाव ही लड़ पाए। इसके बाद के तीन दशक सुमित्रा महाजन के नाम रहे। वे पार्टी में महामंत्री-उपाध्यक्ष तक रहीं तो केंद्र सरकार में अनेक मंत्रालय संभाले।

सोलहवीं लोकसभा में नरेंद्र मोदी की टीम ने उन्हें स्पीकर चुना। उन्होंने विभिन्न चुनाव मुकाललबों में कांग्रेसी दिग्गज महेश जोशी, इंदौर के मेयर मधुकर वर्मा, दिवंगत प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री आदि को हराया। अंततः पार्टी ने उन्हें बगैर बताए ही ७५ पार आयु के फार्मूले के तहत टिकट काट दिया। सत्रहवीं लोकसभा के लिए इंदौर सीट से कांग्रेस के पंकज संघवी और भाजपा के शंकर लालवानी के बीच मुकाबला है। दोनों का स्थानीय वजन जितना भी हो देश-प्रदेश की राजनीति में कोई खास असर नहीं है। लिहाजा इंदौर के चुनाव स्थानीय बनकर ही रह गए हैं।

Read more : ढाई किलो का हाथ और राजनीति की बिसात

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com