क्या SC के इन फैसलों में बदलते समाज की आहट है? अजय बोकिल की कलम से

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वर्ष 2018 का सितंबर माह इतिहास में दो ऐसे ‘क्रांतिकारी’ फैसलों के लिए जाना जाएगा, जो पूरे भारतीय समाज के बदलाव की बुनियाद बन सकते हैं। बनेंगे। हालांकि इन संवेदनशील मसलों और मान्यताअों पर देश की सर्वोच्च अदालत के इन फैसलों को कुछ लोग मजाक में ‘खुल्ला खेल फर्रूख्खाबादी’ की मानसिकता से जोड़कर भी देख रहे हैं, लेकिन अपने तमाम पारंपरिक मूल्यों, मान्यताअों, संस्कारों और सामाजिक-धार्मिक पूर्वाग्रहों के बावजूद इन फैसलों को नई रोशनी और बदलते समय के संदर्भ में समझना जरूरी है। राजनीति से हटकर जो ये दो फैसले हमारे सामाजिक ढांचे को हिलाने वाले हैं, वो है 6 सितंबर को आया भारतीय दंड संहिता ( आईपीसी) की धारा 377 को अवैध ठहराना और 27‍ सितंबर को आईपीसी की धारा 497 को रद्द करना। पहले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश में समलैंगिकता को वैध माना। दूसरे में किसी विवाहित पुरूष द्वारा किसी विवाहित महिला से संम्बन्ध बनाने को अपराध मानने को खारिज किया। अर्थात विवाहेतर सम्बन्धों को मान्य किया।

यहां उल्लेखनीय है कि भारतीय दंड संतहिता ( इंडियन पीनल कोड) की रचना अंग्रेजों ने करीब डेढ़ सौ साल पहले की थी। इसका उद्देश्य गुलाम भारतीय समाज पर राज करना था। आईपीसी का प्रारूप इंग्लैंड में पारित 1833 के चार्टर एक्ट के तहत तैयार किया गया था। उस वक्त ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल पर शासन कर रही थी। प्रारूप तैयार करने के लिए टी. डब्लू. मैकाले की अध्यक्षता में 1834 में भारत का पहला न्यायिक अायोग बना। आयोग ने तीन साल में अपनी रिपोर्ट दी। आयोग का काम आसान नहीं था, क्योंकि उसे एक ऐसे देश में आपराधिक कानून बनाने थे, जहां कोई एक निश्चित दंड संहिता नहीं थी। ज्यादातर मामलों में अपराध धार्मिक नियमों, परंपराअोंके उल्लंघन अथवा राजा की मर्जी के हिसाब से तय किए जाते थे। वहां दलील और वकील की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। अपराध का दंड भी राजा की मर्जी से तय होता था। अधिकांश मामलों में कठोर शारीरिक दंड दिए जाते थे ताकि समाज में भय पैदा हो। आईपीसी कानून भी तत्काल लागू नहीं हुआ। उसमें भी कई संशोधन हुए। 1857 की क्रांति के बाद सीधे ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन अपने हाथ में लिया। उसके बाद 1860 में आईपीसी कानून प‍ारित हुआ तथा 1 जनवरी 1862 को ब्रिटिश भारत में लागू हुआ। तब से अब तक इसमें 76 बार संशोधन हो चुका है।

आईपीसी मुख्यइत: उस तत्कालीन भारतीय सामाजिक -धार्मिक मान्यताअोंऔर ब्रिटिश नैतिकताअों के आधार पर तैयार हुआ था। इसी के तहत माना गया कि भारतीय समाज में समलैंगिकता ( धारा 377) और पुरूष द्वारा ‍िकसी अन्य विवाहित महिला के साथ शारीरिक सम्बन्धम रखना ( धारा 497) अपराध है। भारत में अंग्रेजों के सत्ता संभालने के पहले तक हमारे यहां समलैंगिकता बहुमान्य भले न हो, लेकिन अपराध भी नहीं थी। वात्सायन के ‘कामसूत्र’ में समलैंगिकता पर ‘औपरिष्टक’ नामक पूरा अध्याय है। इसका अर्थ यही है कि समलैंगिकता समाज में विरल थी, लेकिन वर्जित नहीं थी। कामसूत्र की रचना लगभग दो हजार वर्ष पूर्व हुई थी। भारतीय समाज में बहु विवाह भी असामान्य बात नहीं थी। खासकर सम्पन्न और सत्ताधारियों में तो बहुविवाह सामाजिक प्रतिष्ठा और मर्दानगी का विषय था। हालांकि परस्त्रीगमन को अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। अगर धारा 377 को रद्द करने की बात है तो इसी धारा की वजह से भारतीय समाज में समलै‍ंगिकता को घृणा, उपहास अौर अपराध की नजर से देखा जाने लगा। समलैंिगक सम्बन्धों के प्रति इसी दृष्टिकोण ने हमारी गालियों का शब्दकोश जरूर समृद्ध किया। व्यक्ति की सेक्सुअल चाॅइस की वैधता को कानून की नजर से सही या गलत ठहराया जाने लगा। जब कि सुश्रुत संहिता में ही समलैंगिकता को जन्मगत दोष माना गया है। निश्च य ही ऐसे लोग ( जिन्हे आजकल एलजीबीटी समुदाय कहा जाता है) समाज में आज भी अल्पसंख्ययक हैं। लेकिन उन्हें भी सम्मान से जीने का उतना ही अधिकार है, यह कोर्ट ने माना।

धारा 497 या व्यभिचार कानून को खत्म करने के कई अर्थ हैं। इसके खिलाफ कोर्ट में इटली में रहने वाले प्रवासी भारतीय जोसेफ़ शाइन ने जनहित याचिका दायर की थी। इस पर कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी क़ानून जो ‘व्यक्ति की गरिमा’ और ‘महिलाओं के साथ समान व्यवहार’ को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, वह संविधान के ख़िलाफ़ है। कोर्ट ने कहा कि ‘अब यह कहने का वक़्त आ गया है कि शादी में पति, पत्नी का मालिक नहीं होता है। स्त्री या पुरुष में से किसी की भी एक की दूसरे पर क़ानूनी सम्प्रभुता सिरे से ग़लत है।‘ कोर्ट के फैसले के पहले तक कोई पत्नी अपने पति पर दूसरी विवाहित स्त्री से सम्बन्ध बनाने पर आपराधिक मुकदमा दायर कर सकती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा। फर्क यह है ‍िक पहले के कानून में ऐसे सम्बन्धों के ‍िलए पूरी तरह पुरूष को ही दोषी माना गया, साथ ही यह भी माना गया कि महिलाएं ऐसे सम्बन्धों के ‍िलए पुरूषों को नहीं उकसा सकतीं। शाइन का तर्क था ‍िक यदि दोनो में सम्बन्ध राजी-खुशी से बना है तो स्त्री को भी समान रूप से दोषी माना जाए। उसे भी सजा दी जाए।

हालांकि सरकार ने विरोध में अपनी दलील में कहा था कि धारा 497 को कायम रखना ‘विवाह संस्था को बचाने’ के लिए जरूरी है। इस कानून को रद्द करना ‘परिवार और शादी की पवित्रता’ तथा भारतीय नैतिक मूल्यों को चोट पहुंचाएगा। जबकि वादी पक्ष का कहना था कि शादी और शारीरिक सम्बन्ध दो वयस्कों के बीच का निजी मामला है, इसमें राज्य और सरकार को नहीं पड़ना चाहिए। कोर्ट ने माना‍ कि सेक्स सम्बन्धों की पहल केवल पुरूष ही नहीं करता, स्त्री को भी ऐसा करने का अधिकार है और इसे मान्य ‍किया जाना चाहिए। शाइन के तर्क को पश्चिमी सोच से प्रेरित माना जा सकता है, लेकिन यही वह ‘क्रांतिकारी’ बात है, जो परंपराअोंऔर आधुनिक तथा व्यावहािरक सोच के बीच हिचकोले खा रहे भारतीय समाज को भीतर से हिला सकती है। क्योंकि हमारे समाज में अभी भी स्त्री की हैसियत ‘अनुचर’ की ही है।

उसकी सर्वांगीण सत्ता और संपूर्ण स्वतंत्रता हमारे सामाजिक सोच के ढांचे में फिट नहीं बैठती। परंपरावादियों और भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वालों को डर इस बात का है कि यदि इस तरह का खुलापन समाज में आ गया तो सामाजिक मर्यादा का क्या होगा? उन संस्थाअो, संस्कारों और मान्यताअोंका क्या होगा, जो अभी भी परिवार और विवाह संस्थाअों के बने रहने का मुख्यव सीमेंट रहा है या बनाए रखा गया है। ये आशंकाएं गलत नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि हमने बहुत सोचे-समझे तरीके से सेक्स और समलैंगिकता के मामले में ‘मीठा-मीठा गप और कडुवा-कडुवा थू’ का वरण कर रखा है। ज्यादातर वे ही सामाजिक परंपराएं हमे मान्य और मर्यादारक्षक लगती हैं, जो पुरूष सत्ता को पोषित करती हैं। निश्चय ही कोर्ट के फैसलों इन फैसलो से भारतीय समाज में बड़ी सामाजिक उथल-पुथल शुरू होगी। सेक्स और सामाजिक सम्बन्धों का ‘खुला खेल फर्रूख्खाबादी’ भी शुरू हो सकता है।

व्यभिचार, लोकाचार का रूप ले सकता है और समलैंगिकता जबरिया भी हो सकती है। इनसे हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक मान्यताएं ध्वस्त भी हो सकती हैं। लेकिन हमे यह भी समझना होगा कि समाज 21 वीं सदी में आगे बढ़ रहा है। समाज स्त्री पुरूष की ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को भी अनमनेपन से ही स्वीकार करने लगा है। अनचाहे ही सही ‘पोर्न क्रांति’ ने भीतर ही भीतर हमारी कई पारंपरिक मान्यताअो को खोखला साबित कर दिया है। एक नई सोच और समाज आकार ले रहा है। यह आज के हिसाब से कितना सही, कितना नैतिक और शाश्वत होगा, अभी नहीं कहा जा सकता। तो क्या कोर्ट ने बदलते समाज की आहट सुन ली है? या फिर समाज ने ही कोर्ट को अपना मानस बदलने पर मजबूर कर ‍दिया है? इन सवालों के उत्तर हमे परीक्षा गाइड की तरह आसानी से नहीं मिलेंगे। लेकिन यह तय है ‍िकसमाज बदल रहा है और अपनी प्राथमिकताअो के हिसाब से बदल रहा है। कोर्ट के ये दो फैसले भावी सदी के भारतीय समाज की झलक दिखाने वाले हैं।

अजय बोकिल

 

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