अजय बोकिल। कोई माने न माने, लेकिन राहुल गांधी की चार माह से जारी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ अपने अंतिम चरण में कुछ असर तो दिखाने लगी है, भले ही कांग्रेस को इसका तत्काल कोई राजनीतिक लाभ न मिले। यह असर एक तरफ राहुल की यात्रा की सामाजिक स्वीकृति का है तो दूसरी तरफ उससे उपजी राजनीतिक आशंकाओं का भी है।

विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष एवं राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय द्वारा राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की सार्वजनिक रूप से की गई तारीफ के बाद यात्रा को लेकर भाजपा द्वारा जब-तब किए जाते रहे तंजिया हमलों पर भी अस्थायी ही सही, लेकिन ब्रेक लगा है। संघ द्वारा की गई राहुल की इस तारीफ के निहितार्थ को पढ़ने की कोशिश जारी है, जबकि इस यात्रा के मध्य और उत्तर भारत में प्रवेश के बाद कांग्रेस से इतर तमाम विपक्षी दल में यात्रा में हिस्सेदारी को लेकर सफाई से कन्नी काटते दिख रहे हैं।

यह ‘डर’ दक्षिण भारत में वैसा नहीं दिखा। इसका कारण शायद यह है कि दक्षिण के ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस अब दूसरे गैर भाजपाई दलों की बैसाखी के भरोसे है, लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के कुछ राज्यों में वो आज भी अपने दम पर खड़ी है।

राहुल की यात्रा को ‘संतों का आशीर्वाद’

यहां उल्लेखनीय है कि बीते मंगलवार उत्तर प्रदेश के अयोध्या सर्किट हाउस राम मंदिर न्यास की बैठक में शामिल होने के बाद चंपत राय पत्रकारों से मुखातिब थे। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को लेकर किए गए एक सवाल के जवाब में चंपत राय ने कहा-

देश में पैदल चल रहे एक युवक का मैं आभार व्यक्त करता हूं, मैं उसके इस कदम की सराहना करता हूं।” उन्होंने यह भी कहा कि ‘इसमें कुछ भी गलत नहीं है, मैं आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का कार्यकर्ता हूं और आरएसएस कभी भी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की निंदा नहीं करता।चंपत राय ने कहा कि ‘‘वह (राहुल गांधी) इस खराब मौसम में चल रहा है, इसकी सराहना की जानी चाहिए, मुझे कहना होगा कि हर किसी को देश की यात्रा करनी चाहिए।

इसके पहले राम मंदिर न्यास के एक अन्य वरिष्ठ न्यासी गोविंद देवगिरि ने भी राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की सराहना करते हुए कहा था, ‘मैं भगवान राम से प्रार्थना करता हूं कि वह उन्हें आशीर्वाद दें ताकि राष्ट्र एकजुट, मजबूत और सामंजस्यपूर्ण बना रहे। भारत जोड़ो अच्छा नारा है और भारत को एकजुट होना चाहिए।

इसके भी पहले राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने भी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को अपना आशीर्वाद दिया था। सत्येंद्र दास ने गांधी को भेजे एक पत्र में लिखा, ‘मैं आशा करता हूं और प्रार्थना करता हूं कि जिस मिशन के लिए आप लड़ रहे हैं, वह सफल हो। मैं आपको आपके लंबे जीवन का आशीर्वाद देता हूं।’

यहां सवाल उठ सकता है कि राहुल की यात्रा को लेकर कौन सही है? भाजपा या आरएसएस? या फिर दोनों?

यात्रा के लिए तारीफ के स्वर

दरअसल राहुल की 7 सितम्बर 2022 से प्रारंभ हुई तीन हजार किमी. लंबी पैदल यात्रा का अंतिम पड़ाव आते-आते उस वैचारिक खेमे से तारीफ के स्वर आना, जिसके खिलाफ राहुल समूची यात्रा में बोलते रहे हैं, इस बात का संकेत है कि इस यात्रा का आकलन अब कई कोणों से हो रहा है। इसके सामाजिक राजनीतिक हानि-लाभ आंके जा रहे हैं। एक नए राहुल के व्यक्तित्व की संभावनाओं को देखा-परखा जा रहा है, और वो ये कि इस यात्रा ने राहुल की ‘पप्पू’ छवि को किस हद तक धोया है, उसे किस इमेज में रूपांतरित किया है।

क्या यह बदली छवि हाशिए पर कांग्रेस के लिए एक दमदार संजीवनी बन सकती है या नहीं? अगर बनेगी तो उसका असर कितना व्यापक और गहरा होगा? या फिर यह यात्रा भी अंतत: चार माह का ‘रोड शो’ बनकर बिसरा दी जाएगी। देश फिर अपनी चाल चलने लगेगा।

चंपत राय ने की राहुल गांधी की तारीफ

इन तमाम सवालों की बुनियाद में वो अंदाजे और पूर्वाग्रह हैं, जो यात्रा को लेकर शुरू में बांधे गए थे। मसलन यह यात्रा महज एक ‘राजनीतिक शौक’ को पूरा करने के लिए निकाली जा रही है या फिर साढ़े 3 हजार किमी पैदल चलना कोई हंसी-खेल नहीं है। जो राहुल (तब तक) किसी भी काम को निरंतरता और गंभीरता से करते नजर नहीं आ रहे थे, वो इतना पैदल क्या खाक चलेंगे? चल भी लेंगे तो उन पर लगा कुलीनता का ठप्पा कैसे हटेगा?

यात्रा के उद्देश्यों पर भी उंगलियां उठ रही थीं कि भारत टूटा ही कहां है, जो जोड़ने की जरूरत आन पड़ी। जो पार्टी (कांग्रेस) खुद ही एक नहीं है, वो क्या खाकर भारत जोड़ेगी? वगैरह।

राहुल की यात्रा को लेकर हमलावर रही है भाजपा

भाजपा तो शुरू से ही यात्रा को लेकर हमलावर रही, क्योंकि साफ संकेत था कि यह यात्रा दरअसल भाजपा सरकार और उसकी राजनीतिक शैली के विरोध में है। हालांकि राहुल की यात्रा पर ये हमले मुख्य रूप से भाजपा प्रवक्ताओं और दूसरी पंक्ति के नेताओं द्वारा ही किए जाते रहे हैं। ये हमले कभी राहुल की टी-शर्ट तो कभी टुकड़े टुकड़े गैंग के कुछ लोगों के यात्रा में सहयात्री बनने को लेकर किए गए।

कभी यह कहा गया कि राहुल को ठंड क्यों नहीं लगती तो कभी कहा गया कि उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव हिमालय है। कभी उनकी इस यात्रा को ‘बिना पायलट का जहाज’ निरूपित किया गया। उत्तर प्रदेश के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी ने तो अजब सवाल किया कि क्या राहुल पीओके भी जाएंगे? जबकि यात्रा 26 जनवरी को श्रीनगर में ही खत्म होने वाली है।

अगर यात्रा के लक्ष्य की ही बात की जाए तो कौन नहीं चाहेगा कि भारत न जुड़े या फिर जुड़ा न रहे। यह एक समान बुनियादी विचार और संकल्प है, हर उस भारतीय से अपेक्षित है, जो देश से प्यार करता है। इस मुद्दे पर राहुल से संघ भी असहमत नहीं हो सकता। जो लोग समय-समय पर यात्रा से जुड़े, उनके निजी आग्रह और विचार जो भी हों, सदाशयता तो यही हो सकती है।

लोग इतना तो मान रहे हैं कि अमूमन सुनाई देने वाले आत्म श्लाघा के कर्कश स्वरों में एक अलग मद्धम सुर भी कहीं सुनाई पड़ा है। जिसमें असहमति तो है, लेकिन दुराग्रह नहीं है और ऐसी असहमति की लोकतंत्र में शाश्वत जगह है। इस अर्थ में अगर चपंत राय, जो कि संघ की हिंदुत्ववादी विचारधारा के निष्ठावान साधक हैं, द्वारा राहुल की यात्रा की तारीफ करना कोई अनहोनी नहीं है। बल्कि खुद राहुल ने ही यात्रा के दौरान एक बार कहा था कि भाजपा और संघ मेरे गुरू हैं।

कांग्रेस में राहुल की भूमिका पर अब भी सवालिया घेरा

लेकिन राहुल की यात्रा को लेकर जिस बात का डर है, वो असल में राजनीतिक है। अभी यह तय नहीं है कि इस यात्रा के बाद राहुल कांग्रेस में किस भूमिका में होंगे, केवल एक ऊर्जा केन्द्र के रूप में या एक जवाबदेह राजनेता के रूप में। अगर वो केवल कांग्रेस के ऊर्जा केन्द्र और प्रेरणा स्रोत की भूमिका में रहना चाहें तो वर्तमान राजनीति में इसकी सफलता की कितनी गुंजाइश है?

यदि वो पूर्णकालिक राजनेता के रूप में कांग्रेस की कमान संभालते हैं तो देश का नया राजनीतिक परिदृश्य क्या बनेगा? इसी को लेकर बाकी दल चिंतित हैं। भाजपा तो यही चाहती है कि राहुल की छवि का किसी तरह कायाकल्प न हो पाए, क्योंकि उनके ‘पप्पू’ रहने में ही भाजपा के राजनीतिक हित ज्यादा सुरक्षित हैं। जबकि उत्तर भारत में दूसरे गैर भाजपाई दल भी इस यात्रा से दूरी इस वजह से बनाए हुए हैं कि इससे कहीं कांग्रेस मजबूत हुई तो उन्हें अपना सामान समेटना पड़ सकता है।

संभव है कि समूचे उत्तर भारत में भाजपा और कांग्रेस के बीच फिर ध्रुवीकरण होने लगे और तीसरी शक्ति की जगह ही न बचे। यही वजह है कि यूपी में न तो अखिलेश और न ही मायावती इस यात्रा में शामिल हुए और बिहार में महागठबंधन में रहते हुए भी नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने यह कहकर दूरी बनाए रखी कि यह तो राहुल के भेस में कांग्रेस की यात्रा है। एक हलचल यह भी है कि भारत जुड़े या न जुड़े लेकिन चार दशकों से बिखरा गांधी परिवार शायद एक हो सकता है।

राहुल के चचेरे भाई वरुण भाजपा में उपेक्षा झेलने के बाद अपने घर लौट सकते हैं। कुल मिलाकर राहुल के प्रति देश के लोगों में नए सिरे से कौतुहल जागा है। और किसी नेता को नए सिरे से पढ़ने की जिज्ञासा भी भविष्य में नेतृत्व की टैक्स्ट फाइल तैयार कर सकती है।

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हालांकि राहुल ने परस्पर सदभाव और सौहार्द की इबारत दोहराते रहने के अलावा अपना कोई भावी रोड मैप पेश नहीं किया है। जबकि उसकी दरकार भी उतनी ही अहम है। जनता यह जानना चाहती है कि अगर जो हो रहा है, वह गलत है तो वैकल्पिक सही रास्ता आपके पास क्या है? ये प्रतिप्रश्न तो उठते ही रहेंगे। फिलहाल इस यात्रा ने समय की धारा में एक कंकर जरूर फेंका है और वक्त की लहरों में असंभव कुछ भी नहीं है।