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जूते में जलेबीे् खाने और ‘जूते खाने’ का राष्ट्रीय फर्क ! वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 10 May 2018 05:06 by Ravindra Singh Rana
जूते में जलेबीे् खाने और ‘जूते खाने’ का राष्ट्रीय फर्क ! वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की टिप्पणी

यूं यह मेहमाननवाजी का नवाचार था, कुछ अलग करने और दिखने की चाहत थी, फिर भी वह मिठाई ही क्यों न हो, जूते में परोसना जरा ज्यादती ही थी। इसे जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की शराफत कहिए कि इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के घर पर आयोजित इस ‘पादुका पार्टी’ को उन्होने केवल शिष्टाचार के चलते ही ‘सहन’ किया।

कारण जूतों को लेकर इजराइलियों और जापानियों के नजरिए में काफी फर्क है। यहूदियों की नजर में जूता, जूता भी है तो जापानियों की निगाह में जूता, जूता ही है। इजराइलियों की दृष्टि से जूते में मिष्ठान्न परोसना अतिथि का विशेष सम्मान है तो जापानियों की दृष्टिि में यह मेहमान का अपमान है।

कुल मिलाकर दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच आतिथ्य का यह अनोखा तरीका काफी कुछ बयान करता है। इजराइली पीएम नेतन्याहू चाहते थे कि जापानी प्रधानमंत्री का स्वागत कुछ अलग ढंग ( पान पराग से नहीं) से किया जाए। इसे ध्यान में रखते हुए उनके निजी और सेलिब्रिटी शेफ़ मोशे सेगेव ने नया आइडिया खोजा और डिनर के अंत में डेजर्ट ( मिष्ठान्न) डिश चाॅकलेट व धातु के बने ‘जूते’ में रखकर पेश की।

यह जूते की इज्जत अफजाई भी थी। खुद शेफ और पीएम नेतन्याहू ने सोचा होगा कि जूतों में पेश इस मिठाई को खाकर आबे खुश होंगे। लेकिन मेहमाननवाजी का नया अंदाज देख आबे मुंह कड़वा हो गया। फिर भी शिष्टाचार की खातिर उन्होने मिठाई खा ली। लेकिन खुद जापान के लोगों ने इसे ‘अशिष्ट’तरीका माना। लोगों को लगा कि यह उनके राजनेता को जूतों में खाना पेश करने की असभ्यता है।

इसका कारण यह शायद यह है कि जापानी जूतों को लेकर क्या सोचते हैं, यह इजराइलियों को ठीक से पता होगा और इजरालियों का जूतों को लेकर क्या सोच है, इसका जापानियों को अंदाजा नहीं होगा। यहां तक कि जापान में लंबे समय तक राजनयिक रहे एक इजराइली ने कहा कि ‘यह एक असंवेदनशील और बेवकूफ़ी से भरा फैसला था।जापानी संस्कृति में जूते से ज़्यादा तुच्छ कुछ भी नहीं है।

जापानी न सिर्फ़ अपने घरों में बल्कि दफ़्तरों में भी जूते बाहर निकालकर जाते हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री, अन्य मंत्री और सांसद भी अपने दफ़्तरों में जूते पहनकर नहीं जाते हैं। ये तो ऐसा ही है जैसे किसी यहूदी मेहमान को सुअर की शक़्ल में खाना परोसा जाए।‘ उधर जापानी राजनयिक की तल्ख प्रतिक्रिया थी ‍िक ‘कोई भी संस्कृति जूतों को मेज़ पर नहीं रखती। अगर ये मज़ाक भी था तो हमें ये मज़ेदार नहीं लगा। हम अपने प्रधानमंत्री के साथ हुए इस व्यवहार को लेकर नाराज़ हैं।‘

यह सही है कि जापानी जूतों को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं। वहां घर के भीतर चलने और टाॅयलेट के लिए भी अलग चप्पलें होती हैं। हर घर की देहरी के अंदर एक स्थाचन नियत होता है, जिसे जेनाकान कहते हैं। यहीं बाहर पहने जूते उतारने होते हैं और घर के भीतर के लिए चप्पलें पहननी होती हैं। कहा जाता है कि जापानी होटलों और रेस्तरांअों में भी ग्राहकों को भीतर आने के लिए अलग चप्पलें मुहैया कराई जाती हैं। जूतों को लेकर इतना संवेदनशील होने के पीछे मुख्यंत: स्वच्छता का आग्रह और जूते को जूता मानना है। जापानी में जूते को ‘कुत्सु’ कहा जाता है और इसके पहनने और उतारने का भी एक एटीकेट है।

दूसरी तरफ इजराइल, जहां मुख्य रूप से यहूदी रहते हैं, जूतों को थोड़ी अलग नजर से देखते हैं। हालांकि धर्मस्थल पर वे भी जूते बाहर उतारते हैं। यहूदियों में कहावत है कि ‘यदि जूता फिट है तो उसे जरूर पहनना चाहिए।‘ यहां भी जूता पहनने और उतारने का एटीकेट है। मसलन पहनते समय दायां जूता पहले पहनें और उतारते वक्त बायां जूता पहले उतारें। दायां पहले इसलिए पहना जाए, क्योंकि ‘दायां’, बाएं से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यहूदी जूतों को आध्यात्मिक दृष्टि से भी देखते हैं। वे मानव शरीर को ‘आत्मा के जूते’ (आवरण) की संज्ञा देते हैं। उनकी नजर में जूता केवल पैरों का रक्षा कवच भर नहीं है, वह एक समझौते का प्रतीक भी है।

जब जूते को लेकर इतनी ऊंची सोच हो तो शेफ सेगेव ने भी उसमें डेजर्ट सर्व करते समय कुछ ऐसा ही सोचा होगा। लेकिन दिक्कत यह है कि जूतों के बारे में हर सभ्यता, समाज और समुदाय की अलग दृष्टि है। मशहूर चित्रकार स्व. विष्णु ‍चिंचालकर ने एक बेहद खूबसूरत राजस्थानी जूती को अपने घर में कलमदान बना रखा था। उनका तर्क था कि यह जूती इतनी सुंदर है कि इसमें तो केवल पेन और ब्रश ही रखे जा सकते है।

अमूमन हर चीज की तरह हम भारतीय जूते को भी दो तरीकों से देखते हैं। भारतीय संस्कृति में जूता पैरों का आवरण है तो पादुका के रूप में वह पूजनीय भी है। भिड़ंत के दौरान एक अस्त्र भी है और आपसी हाथापाई और वैचारिक घमासान को ‘जूते चलने’ के रूप में देखना मौलिक भारतीय सोच का उदाहरण है। यही नहीं, इंसान की लाचारी को ‘जूते घिसने’ के रूप में हम भारतीय ही देख सकते हैं। अपना अहित खुद करने पर ‘मियां की जूती, मियां के भी यहीं हो सकती है।

हमारे यहां तो भक्त अपने स्वामी की जूतियां सीने से लगाकर सो सकते हैं। भरत ने राम का खड़ाऊं राज इसी तरह चलाया था। यहां जूता, जूता नहीं रह जाता। वह स्वामीभक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन इसी के साथ सफलता का एक शाॅर्ट मकट ‘जूते चाटने’ के रूप में हमारे यहां है।

कुछ लोग इसे तलुए चाटना भी कहते हैं। कृपाकांक्षियों का यह सिद्ध सूत्र है। आपसी लड़ाई झगड़े के लिए भी जूता ही प्रतीक है। इसे ‘जूते में दाल बंटना’ कहते हैं। हमारे यहां जूते ‘खाए’ भी जाते हैं और यह दावत बिन मांगे मिलती है। ‘जूते खाने’ और ‘देने’ का एक राष्ट्रीय चरित्र है। डिनर के दौरान जूते में डेजर्ट परोसे जाने से दुखी आबे इसके मर्म को कभी समझ नहीं पाएंगे।

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