नवरात्र मां की आराधना का पर्व है और धरती पर मानवमात्र को सादगीभरी बेहतर जीवनशैली के लिए भी प्रेरित करता है।वताओं पर घोर विपत्ति आई और उनको बड़े कष्टों का सामना करना पड़ा तो उन्होने देवी को प्रसन्न करने के लिए कई जतन किए और देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को दानवों पर विजय होने का आशीर्वाद दिया। इसलिए देवी की आराधना से भक्त को जो महत्वाकांक्षा होती है माता उसको पूरा करती है। देवी को ज्ञान की, बुद्धि की और सर्वकल्याण की देवी कहा जाता है। प्राचीनकाल में सिद्धपुरूषों ने माता की आराधना कर सिद्धि पाई थी और कालजयी ज्ञान के अनन्त भंडार की रचना की थी। ऐसी ही सर्वकल्याण की देवी उज्जैन में विराजमान है, जिनको गढ़कालिका के नाम से जाना जाता है।

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उज्जैन के कालीघाट स्थित कालिका माता के प्राचीन मंदिर को गढ़ कालिका के नाम से जाना जाता है। जो की अब वर्तमान में पिपलीनाका के नाम से जाना जाता है, ये प्राचीन मंदिर कई रोचक इतिहास समेटे हुए है। इस मंदिर में दूर-दूर से भक्त भी आते हैं जो किसी न किसी दुख से मुक्त होना चाहते हैं। इस मंदिर में तंत्र साधना के लिए भी तांत्रिक आते हैं और तंत्र मुक्ति से निजात पाते हैं। देवियों में कालिका को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस मंदिर को चमत्कारिक माना गया है। माना जाता है की इस मंदिर की स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है।

 

इस मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन ने किया था बाद में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। इस मंदिर में प्रवेश द्वार के आगे सिंह की प्रतिमा है और इसके आसपास धर्मशालाएं हें, जिसमें पुरातन समय में पथिक या तांत्रिक आकर मां की पूजा किया करते थे। धर्मशाला के बीच देवी मंदिर हैं। शक्ति-संगम-तंत्र में ‘अवन्ति संज्ञके देश कालिका तंत्र विष्ठति’ कालिका का उल्लेख भी है।

हुनमान जी से डर गई थीं कालिका माता


हालांकि गढ़ कालिका का मंदिर शक्तिपीठ में शामिल नहीं है,लेकिन उज्जैन क्षेत्र में मां हरसिद्धि शक्तिपीठ होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व बढ़ गया है। पुराणों में लिखा है कि उज्जैन में शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर मां भगवती सती के होंठ गिरे थे। वहीं लिंग पुराण में लिखा है कि रामचंद्रजी जब रावण का वध कर आयोध्या लौट रहे थे तो रात में रुद्र सागर तट पर रुके थे। उधर रात में भगवती कालिका अपने भोजन के तलाश में निकली थी तभी उनकी नजर ाने के लिए आगे बढ़ने लगी तभी अचानक हनुमान जी ने अपना विशाल रूप धारण कर लिया। यह देखते ही देवी वहां से डर का भागने लगीं। उस समय उनका अंश वहीं गिर गया और उसी स्थान पर बाद में कालिका मंदिर का निर्माण हुआ।

कालिदास की आराध्यदेवी है माता

मां गढ़कालिका महाकवि कालिदास की आराध्यदेवी मानी जाती है। माता के आर्शीवाद से ही कालिदास ने कालजयी ग्रंतों की रचना की थी। कालिदास रचित ‘श्यामला दंडक’ महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। उज्जैन में आयोजित होने वाले कालिदास समारोह में प्रतिवर्ष माँ कालिका की आराधना की जाती है।