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गर्भिणी हथिनी की क्रूर हत्या और इसमे छिपी सियासी चिंघाड़…!

अजय बोकिल

केरल में एक गर्भवती हथिनी की निर्मम हत्या की घटना समूचे देश को उतनी ही शर्मसार करने वाली है, जितनी कि माॅब लिंचिंग की आड़ में निर्दोष इंसानों की हत्या। पूरे देश में इसकी निंदा हुई। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि यह घटना गंभीर है और इसके लिए दोषियों को सख्तघ सजा दी जाएगी तो केरल के मुख्यकमंत्री पी. विजयन ने घटना की जांच के आदेश देते हुए कहा कि इस मामले में भी न्याय होगा।

इस बीच राज्य के कोल्लम जिले में भी ऐसी ही एक घटना और सामने आई है। इंसानो द्वारा मूक पशुओं  की इस तरह क्रूर हत्या की जितनी निंदा की जाए, उतनी कम है, लेकिन सहानुभूति और आक्रोश की सतह के नीचे दबी महीन सियासी चिंघाड़ को समझना भी जरूरी है। इसलिए भी क्योंकि घटना की प्रारंभिक जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उसके मुताबिक हथिनी की हत्या सुनियोजित न होकर दुर्घटनवश ज्यादा लगती है। लेकिन पूरा सच जांच के बाद ही सामने आएगा।

बहरहाल केरल में जो हुआ, उससे पूरा देश इसलिए भी हतप्रभ हुआ, क्योंकि हाथी न सिर्फ देश बल्कि केरल की वन्य जीव संपदा के साथ-साथ संस्कृति का भी अहम हिस्सा हैं। जो घटना रिपोर्ट हुई, उसके मुताबिक राज्य के पलक्कड जिले में साइलेंट वैली में एक गर्भवती हथिनी खाने की तलाश में भटकते हुए 25 मई को जंगल से पास के गांव में आ गई थी। किसी दुष्ट ने उसे पटाखों भरा अनन्नास खिला दिया। उसे खाते ही हथिनी के मुंह में विस्फोट हुआ। जिस कारण उसका जबड़ा बुरी तरह से फट गया और दांत भी टूट गए। दर्द से तड़पती ‍बेबस हथिनी वेलियार नदी में जा खड़ी हुई। दर्द कम करने वह बार-बार पानी पीती रही। दर्द से कराहते दिन बाद वह जिंदगी की जंग हार गई।

हथिनी के साथ उसके पेट में पल रहा नन्हा भ्रूण भी चल बसा। ये वीडियो जिसने भी देखा, वह गुस्से और आत्मग्लानि से भर उठा। हरेक के मन में यही सवाल उठा कि यह कैसी निकृष्ट हरकत और क्रूरता है। जल्द ही इस नाराजी ने एक ‘अभियान’ का रूप ले लिया और हथिनी की मौत की आड़ में सियासी दांत ‍भी दिखने लगे। इस घटना की जानकारी देश को एक फारेस्ट आफिसर मोहन कृष्णन ने फेसबुक पर दी थी। उसके मुताबिक वन कर्मियों ने हथिनी को बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। इस खबर के बाद पहली प्रतिक्रिया भाजपा सांसद और पूर्व मंत्री मेनका गांधी की आई। उन्होंने कहा कि मल्लप्पुरम में लोग इंसानों के साथ जानवरों को भी मार डालते हैं। मेनका का पशु प्रेम जगजाहिर है।

उधर वन्य जीव संरक्षण में लगे एनजीओ  में भी भारी आक्रोश दिखा। उनमें से कुछ ने तो हथिनी के हत्यारों को पकड़ने वालों को नकद इनाम देने का ऐलान भी कर दिया है। हथिनी की ‍दुष्टतापूर्ण हत्या के मामले की जांच केरल के वन अधिकारी कर रहे हैं। केरल के मुख्यजमंत्री ने कहा ‍कि दो तीन संदिग्धों पर हमारी नजर है। वैसे जांच में एक बात और सामने आ रही है कि हथिनी को किसी ने पटाखे भरा अनन्नास नहीं खिलाया था। जो विस्फोटक अनन्नास हथिनी ने खाया,वह दरअसल स्थानीय किसानों ने जंगली सूअरों को मारने के लिए रखा था। हो सकता है कि हथिनी भूख से तड़प रही हो और मजबूरी में उसने वह अनन्नास खा लिया हो।

यहां सवाल यह है कि गर्भवती हथिनी को वह विस्फोटक अनन्नास क्यों खाना पड़ा और दूसरे मूक प्राणियों की मौत ( या हत्या ?) पर सियासी हांका लगाने का मकसद क्या है? पहली बात तो यह है कि जिस तरह जंगलों पर इंसानों ने अतिक्रमण किया है, उससे हाथियों सहित तमाम वन्य जीवों के सामने भोजन और जीने का संकट खड़ा हो गया है। केरल में भी हर साल जंगली हाथी और सुअरों सहित कई वन्य जीवों द्वारा किसानों की फसलें नष्ट करने तथा मनुष्यों पर हमला करने की घटनाएं होती रहती है। ऐसी ही समस्या छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडशा, असम जैसे राज्यों की भी है। असम में तो वर्ष 2019 में ही मनुष्य और हाथी के बीच हुए संघर्ष में 62 हाथी और 63 इंसान मारे गए। ये आंकड़े वन विभाग के हैं।

केरल में उस गर्भवती हथिनी को किसी ने जानबूझकर मारा होगा, इसकी संभावना कम लगती है। क्योंकि हाथी केरल के सामाजिक आर्थिक और धार्मिक जीवन का अहम घटक हैं। वे वहां मंदिरों का जरूरी हिस्सा हैं। हालांकि राज्य में हाथियों के उत्पीड़न की भी शिकायतें हैं, लेकिन स्थानीय महावत इसका खंडन करते हैं। वैसे भी हिंदू धर्म और संस्कृति में हाथी का स्थान बहुत ऊंचा है। वह देवताओ के राजा इंद्र का वाहन है तो बुद्धि देवता गणेश स्वयं गजानन हैं। हाथी का होना मांगल्य, बुद्धिमत्ता और शक्ति का प्रतीक है। लिहाजा एक हथिनी का इस तरह मारा जाना कहीं से भी क्षम्य नहीं है।

दूसरा सवाल इस हथिनी की हत्या पर समाज के सेलेब्रिटीज के साथ राजनेताओ का इस तरह उग्र और विचलित होना है। सत्ताधारी नेता इतने मुखर तो उस वक्त भी नहीं हुए थे, जब महाराष्ट्र में 16 प्रवासी मजदूर पटरी पर सोते हुए मालगाड़ी से कट मरे थे। तब भी उस दर्दनाक घटना की आड़ में केन्द्र की मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया और देश में ‘सरकारी संवेदनहीनता’ के खिलाफ एक अभियान चला। लापरवाही वहां भी थी, लेकिन षड्यंत्र नहीं था। लगता है, उसी का जवाब अब हथिनी की हत्या पर ‘प्रति वार’ के रूप में दिया जा रहा है। निशाना सीधे तौर पर केरल की वामपंथी विजयन सरकार और दूसरी तरफ कांग्रेस है। गहराई से समझें तो केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओ के प्रवेश को लेकर जिस तरह एक पारंपरिक ‘अंधविश्वास’ को सही ठहराकर कर साल भर तक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश की गई, वह बहुत कामयाब नहीं हो सकी।

इस आंदोलन के बाद हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में केरल में भाजपा को मात्र 12.93 फीसदी वोट मिले। संतोष की बात इतनी थी कि यह वोट प्रतिशत राज्य में 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिले 10.6 फीसदी वोटों से थोड़ा ज्यादा था। जाहिर है कि सत्ता की मंजिल अभी बहुत दूर है। तमाम कोशिशों के बाद भी केरल में भाजपा के पैर उस तरीके से नहीं जम पा रहे हैं, जिसकी उसे चाहत है। ऐसे में ‘हथिनी की हत्या’ वो ताजा मुद्दा है, जिसके बहाने भाजपा वामपंथियों के साथ-साथ राज्य की वायनाड लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर भी निशाना साध रही है कि उन्होंने हथिनी की हत्या की निंदा क्यों नही की? भाजपा को उम्मीद है कि इसी ‘पशु संवेदना’ के जरिए वह न सिर्फ देश में मूक प्राणियों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता का संदेश दे सकती है बल्कि तथा केरल में हिंदू वोटों को एकजुट कर सकती है, ताकि जिसका राजनीतिक लाभ भविष्य में मिल सके।

इस दृष्टि से किसी हथिनी की हत्या का पाप भी किसी ‘ब्रह्म हत्या’ से कम नहीं है। संदेश यही देने की कोशिश है कि एक ऐसा राज्य, जो अपने पढ़े लिखे होने, स्वास्थ एवं सामाजिक सुरक्षा पर इतराता है, वहां मूक पशुओ के साथ कितनी क्रूरता बरती जाती है। राजनीति की चौपड़ पर हर कोई सिर्फ मोहरा होता है, जिसका मकसद सियासी एजेंडे को पूरा करना है। यहां सिलेक्टिव चुप्पी और सिलेक्टिव मुखरता अपना खास रोल अदा करती है। मकसद राजनीतिक रूप से एक दूसरे को घेरने और बेनकाब करने का होता है। पा‍त्र बदल जाते हैं, नाटक वही रहता है। लेकिन मूक प्राणी इसे नहीं समझते। उस हथिनी को भी पता नहीं होगा कि जिस व्यवस्था, विकास तथा तरक्की के दावों ने उसे विस्फोटक फल खाने को मजबूर किया, वही उसकी मौत के बाद राजनीतिक तेरहवीं करने से नहीं चूकेंगे।