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दिनेश निगम ‘त्यागी’

कमलनाथ का डर, चीन की एंट्री….

कमलनाथ अपनी पार्टी को संभाल नहीं पाए। सत्ता से बेदखल हो गए। अधिकांश सर्वे बोल रहे हैं, 24 विधानसभा सीटों के उप चुनाव में भाजपा को इतनी सीटें मिल जाएंगी, जितनी सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी हैं। बावजूद इसके भाजपा कमलनाथ से डरी दिखाई पड़ती है। आखिर, कमलनाथ ने 15 साल से जमी भाजपा सरकार को उखाड़ जो फेंका था। कमलनाथ एक बार फिर भाजपा के सामने हैं। भाजपा के अंदर पैदा डर का नतीजा है कि मप्र में चीन ने एंट्री मार दी। भाजपा ने एक पुराने मामले को लेकर कमलनाथ को घेरा। उन्हें चीन का दलाल कहा। प्रदेश भर में उनके पुतले जलाए। कांग्रेस चूंकि सिंधिया को देश का गद्दार ठहराने की कोशिश कर रही है, यह उसका जवाब भी है। कमलनाथ भी कम नहीं। कांग्रेस ने जवाब में शिवराज की चीन यात्रा निकाल ली। आरोप लगाया कि शिवराज की चीन यात्रा का खर्च वहां की कम्युनिष्ट पार्टी ने उठाया था। शिवराज की चीन परस्ती के और कई उदाहरण देकर जवाब मांगा गया और प्रदेश भर में शिवराज एवं भाजपा के पुतले जलाने की जवाबी धमकी दी गई। साफ है, चीन उप चुनावों में एक प्रमुख मुद्दा रहने वाला है।

 अब धोखा, गद्दारी और दगा मुद्दे….

चौबीस विधानसभा सीटों के उप चुनाव में इस बार विकास एवं तरक्की के मुद्दे गौंड़Þ होंगे। इनकी जगह धोखा, गद्दारी एवं दगाबाजी एजेंडे के केंद्र में होंगे। अपनों की दगा से चोट खाई कांग्रेस इन्हें लेकर आगे बढ़ने वाली है। शुरुआत दिग्विजय सिंह एवं उनके बेटे जयवर्धन सिंह ने की थी। जयवर्धन ने अपने एक ट्वीट में महारानी लक्ष्मीबाई की हत्या का दोषी सिंधिया घराने की देश से गद्दारी को ठहराया था। दिग्विजय ने भी बाद में इसे हवा दी। इसके बाद अन्य नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पर लक्ष्मीबाई का नाम लेकर देश के साथ गद्दारी का मामला उठाने लगे। वरिष्ठ विधायक डा. गोविंद सिंह ने सीधे सिंधिया का नाम लेकर कहा कि उन्होंने ‘जिस पत्तल में खाया उसी में छेद किया’। उप चुनाव में हैसियत पता चल जाएगी। पीसी शर्मा ने कहा, कांग्रेस के अंदर जो बिकाऊ थे, चले गए और जो टिकाऊ हैं वे पार्टी में हैं। प्रेमचंद गुड्डू ने इससे भी तीखे हमले सिंधिया पर किए। साफ है कांग्रेस सिंधिया सहित बागियों के धोखे, पार्टी के साथ गद्दारी एवं दगाबाजी को मुद्दा बनाकर मैदान में मोर्चा संभालने वाली है। आजादी के आंदोलन के समय सिंधिया घराने की भूमिका को कांग्रेस सिंधिया की कमजोर कड़ी मानती है।

भार्गव को लेकर कुआ-खाई की स्थिति….

भाजपा के दिग्गज नेता गोपाल भार्गव को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने कुआ एवं खाई को हालात हैं। वे चाहते हैं कि गोपाल के स्थान पर सागर से उनके खास भूपेंद्र सिंह को मंत्री बनाया जाए और भार्गव को विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी जाए। भार्गव के मिजाज को देखकर यह भी उन्हें जोखिम पूर्ण लगता है। एक ही सीट से लगातार 8 बार विधानसभा का चुनाव जीतने वाले भार्गव विधानसभा में सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं। वे 15 साल तक मंत्री रहे और डेढ़ वर्ष तक नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई। वरिष्ठता व अनुभव के लिहाज से वे विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त भी हैं। लेकिन भार्गव जिस तेवर व मिजाज के नेता हैं, उसे देखते हुए पूरी पार्टी डरी हुई है। यही वजह कि मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले विधायकों की जो सूची दिल्ली गई है, उसमें गोपाल एवं भूपेंद्र दोनों के नाम शामिल हैं। केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा कि भार्गव मंत्री बनें या विधानसभा अध्यक्ष। विधानसभा अध्यक्ष के लिए सीतासरन शर्मा एवं जगदीश देवड़ा भी दावेदार हैं। शर्मा पिछले कार्यकाल में विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं जबकि देवड़ा अभी प्रोटेम स्पीकर का दायित्व निभा रहे हैं।

कांग्रेस संभली, अब भाजपा को खतरा….

ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायकों के कांग्रेस छोड़ने के बाद कांग्रेस सरकार ही नहीं गिरी, समूची पार्टी का मनोबल गिरा था। संभावना थी, कांग्रेस अभी और टूटेगी। सिंधिया के भोपाल दौरे की सूचना के साथ यह खबर भी आई कि उनकी मौजूदगी में कांग्रेस की तीन और बड़े नेता भाजपा का दामन थामेंगे। पर सिंधिया आए नहीं और जिन नेताओं के कांग्रेस छोड़ने की चर्चा थी, उन्होंने खुद ऐसी खबरों को बकवास बताया। बागी पूर्व विधायकों के साथ कांग्रेस के छोटे नेताओं के भाजपा में शामिल होने का सिलसिला तो जारी रहा लेकिन किसी बड़े नेता ने कांग्रेस नहीं छोड़ी। अब बदल गए, कमलनाथ ने कांग्रेस को संभाल लिया जबकि खतरे में भाजपा आ गई। उसके नेता एक-एक कर पार्टी छोड़कर कांगे्रस में शामिल होने लगे। प्रेमचंद गुड्डू, बालेंदु शुक्ल, अजब सिंह भाजपा छोड़ कांग्रेस में आ चुके हैं। दीपक जोशी एवं भंवर सिंह शेखावत की भाजपा से नाराजगी सार्वजनिक है। चौधरी राकेश सिंह कांग्रेस में शामिल होने तैयार बैठे हैं। साफ है अब भाजपा नहीं संभल रही। उप चुनाव आने तक भाजपा में और कई विस्फोट हो सकते हैं। इसकी पटकथा कमलनाथ कैंम्प में लिखी जा चुकी है।

हैसियत से ज्यादा चाहत का नतीजा….

बसपा विधायक रामबाई पर एक कहावत फिट बैठती है, ‘आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’। दरअसल, तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उनकी भरपूर मदद की। हत्या जैसे मामले से उनके पति को बचाया। पोस्टिंग-ट्रांसफर में उनकी सुनी। 74 बंगले में सरकारी बंगला आवंटित किया। सरकारी हेलीकाप्टर उन्हें पथरिया छोड़ने जाता था। वे पहली बार की विधायक हैं, पर शुरू से उनके अंदर मंत्री बनने का भूत सवार है। पहले वे कमलनाथ सरकार पर मंत्री बनाने का दबाव बनाए थीं। भाजपा के सत्ता में आने पर पाला बदला और वहां भी मंत्री पद पाने की जोड़तोड़ में जुट गर्इं। कहा, भाजपा के प्रमुख नेताओं ने उन्हें आश्वासन दिया है। यहीं से उनके बुरे दिन शुरू हो गए। भाजपा में उनका विरोध शुरू हो गया। पार्टी के दिग्गज नेता जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ मलैया ने रामबाई के खिलाफ पत्रकार वार्ता की और प्रदर्शन भी किया। आपराधिक प्रकरणों की फेहरिस्त देखकर भाजपा नेता उनसे कन्नी काटने लगे हैं। अपने बड़बोलेपन के कारण वे कहीं की नहीं रहीं। बसपा से वे पहले ही बाहर की जा चुकी हैं। इसलिए कहते हैं, अपेक्षा अपनी हैसियत देखकर करनी चाहिए।