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“पिता”

पिता सब जानता है,
सब समझता है ,
अनजान बनकर भी….

सभी से वाकिफ है वो,
तुम्हारे आने जाने से लेकर ,
तुम्हारी आदतो तक ,
सब पता है उसे
पर फिर भी अनजान रहता है….

वो जानता है तुम्हारी जिम्मेदारियां भी,
वो जानता है तुम्हारी मजबूरियां भी,
वो जानता है किस राह चल रहे हो तुम,
पर फिर भी अनजान रहता है….

वो जानता है तुम्हारा अतीत भी,
वो जानता है तुम्हारा वर्तमान भी,
कल्पना में है उसके तुम्हारा भविष्य भी,
पर फिर भी अनजान रहता है

वो समझता है कैसे चल रहे हो तुम,
वो जानता है कैसे बदल रहे हो तुम,
वो मन में टोकता भी है वो रोकता भी है,
वो ये सब मन में सोचता भी है,
पर फिर भी अनजान रहता है…

वो हर पल महसूस करता है तुमको,
तुम्हारे बचपन से लेकर अपने बुढ़ापे तक,
तुम्हारी अठखेलियों से लेकर,
तुम्हारे नकारने तक
वो सब महसूस करता है,
पर फिर भी अनजान रहता है….

वो रहता है जब अकेला ,
तो तुम्हारा बचपन याद करता है,
तुम्हारे बच्चों को प्यार कर
तुम्हारी यादो को आबाद करता है,
मूल से चाहे ब्याज अच्छा लगता है,
पर फिर भी अनजान रहता है….

वो दिल में जरूर बसाये रखता है,
कई जरूरते
कई चाहते
कई उम्मीदे
पूरी करने वास्ते.
पर फिर भी अनजान रहता है

क्योंकि वो गुजर चूका है तुम्हारे दौर से,
तुम्हारी परिस्थितियों से,
तुम्हारी जवानी के शोर से,
इसीलिए जानकर भी अनजान रहता है

क्योंकि वो जानता है,
कि इक दिन तुम भी इस दौर में आओगे,
और पिता क्या होता है,
तभी समझ पाओगे….
तभी जान पाओगे….