moreआर्टिकल

लाहुल-स्फीति की बाईक यात्रा का रोमांचकारी वर्णन, हम पहुंच गए देवभूमि

घुमक्कड़ गिरीश सारस्वत तथा श्रीकांत कलमकर 

दूसरी किश्त (तीसरा-चौथा दिन)

कल दुसरे ही दिन हमारी गाडियों ने काम मांग लिया। मेरी , बाइक के कैरिएर की वेल्डिंग उखड गई थी और गिरीश के बाईक का सेल्फ और उस से भी जरुरी हॉर्न काम नहीं कर रहा सो इस सब को ठीक करवाने में हमारा देहरादून पहुचने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ । सो हम सहारनपुर मे ही रूक गए, सहारनपुर उत्तरप्रदेश के आम नगरो जैसा ही खूब भीड़ और धुल भरा था । परंतु यहाँ के आमो ने मन मोह लिया । हर तरफ आमो की बहार थी,एकसे एक मीठे और रसीले आम।आज का रात्रि विश्राम यही पर।

अगली सुबह,कुछ ठंड लग रही है। सहारनपुर पार करते ही देवभूमि का अहसास होने लग गया। आज देहरादून,मसूरी,उत्तरकाशी होते हुए हर्षिल पहुंचना है।आज लगभग 290 किलोमीटर गाडी चलानी है।देवभूमि उत्तराखंड का क्या कहना,प्रकृति यहां सदैव, प्रसन्नता और ऊर्जा का संचार करते रहती है। ना कोई थकान और ना कोई फिक्र बस मां प्रकृति की गोद मे आनंद ही आनंद।

हमे पहाड़ो के नजदीक पहुचते ही चारो और धुंध .ठंडी हवा महसूस होने लगी है।लग ही नहीं रहा था की,एक दिन पहले ही हम कैसे 45 डिग्री की लू का सामना कर रहे थे।खैर शानदार आमो से लदे पड़े बागो का नजरा देखते हुए 8  बजे हम देहरादून उत्तराखंड की राजधानी पहुंच गए। बड़ा ही खुबसूरत हराभरा नगर है यह,ओर अब शुरू हुआ पहाड़ी रास्तो का सफ़र ।

पहाड़ो की रानी मसूरी के रास्ते मे सुबह की पहली चाय और गरमगरम पकोड़ो का आनद लेने के बाद,पता चला की गिरीश की बाइक के,पिछले टायर में हवा नहीं हे।दूर दूर तक कोई मेकेनिक नहीं था। शुक्र बस यही था की हमारे पास पंप है,ओर हम जैसे तैसे उसमे हवा भर कर,भागे ताकि हवा निकलने से पहले किसी मेकेनिक तक पहुच सके और हम पहुच भी गए परंतु इस गड़बड़ ने हमारा एक कीमती घंटा ले लिया  सो पहाड़ो की रानी मसूरी की,बाहर से ही परिक्रमा करते हुए हम चल पड़े उत्तरकाशी की ओर।
आज का हमारा लक्ष्य था  पवित्र गंगा का मूल गंगोत्री पहुंचने का बेसकैंप हर्सिल,पर असली यात्रा तो अब शुरू हुई थी ,पहाड़ी ट्राफिक से बचने के लिए हमने लोकल सडको का सहारा लिया परंतु उनपर यात्रा करना तो ओर भी टेडी खीर है। दोपहर 3.30 बजे हम उत्तरकाशी पहुचे,खाने के बाद आलस और गर्मी से आगे जाने का मन ही नहीं हो रहा था। लग रहा था यही गंगा किनारे रुक जाओ पर अभी भी मंजिल बहुत दूर थी,आगे हाईवे था,चारधाम यात्रा के भारी ट्रेफिक ने,ओर भी थका दिया और डरा भी दिया,कब किस मोड़ पर कौनसी गाड़ी,किस रफ़्तार से आ जाये ,पता ही नही चलता,फिर साथ साथ गहरे खड्ड में, बहती गंगा देखने में भी डर लगता,बार बार यही ख्याल आता,की यदि इस में टपक गए तो,कहा कहा ढूढूगे,घर वाले,लाश भी नसीब नहीं होगी, खैर अँधेरा होते होते हम हर्सिल गांव तक पहुच ही गए  गंगोत्री से २५ km पहले,यह चारो ओर ऊँचे ऊँचे पहाड़ो से घिरा,एक बहुत ही खुबसूरत गाँव है। ढलती शाम में गंगा के चमकीले रेतीले तट पर,गर्म चाय ने आनद ला दिया, गंगा के बर्फीले पानी में,हाथ मुह धोकर ही सारी थकान उतर गई,पर यहाँ ठण्ड भी अच्छी खासी है।आज का विश्राम यही पर।

30 मई की सुबह 4.30 पर उठकर हम 5 बजे तो गंगोत्री के लिए चल पड़े,मित्रो वैसे तो उत्तराखंड देवभूमि पर ज्यादातर,तीर्थाटक ही आते है,परंतु हमारी प्राथमिकता तो, पर्यटन होती है। गंगोत्री मंदिर पंहुचकर,दर्शन किये,आज मौसम बहुत ठंडा है,कुछ समय के बाद वापस हो लिए। गौमुख जाना अभी संभव नहीं हुआ है,परंतु भविष्य की योजना मे,वह शामिल है।  गंगोत्री के सुंदर और पवित्र वातावरण ने,मन मोह लिया,पर यह देख कर बड़ा दुःख, हुआ की इस बार गंगा में पानी काफी कम है,इस साल हुई कम बर्फ़बारी के कारण  गंगाजी अपने किनारे छोड़ अंदर ही सिमट गई थी। परंतु ऊपर गोमुख पर,अभी भी काफी बर्फ थी इसलिए हम ने गोमुख जाने का इरादा त्याग कर वापसी का रास्ता पकड़ा।

आज हमाँरी मंजिल पवित्र यमुना का उद्गम यमुनोत्री धाम था।वापसी मे उत्तरकाशी,धारासू होते हुए बरकोट पहुंचना है। आज लगभग 220 किलोमीटर गाडी चलनी है।पूरे रास्ते पहाड़ों मे से है,हर पल सावधान रहना पड़ता है,एक तरफ गहरी खाई दूसरी ओर ऊंचे पहाड़, कभी दायीं ओर कभी बायीं ओर घने जंगल मे बहती नदियां,अद्भुत रोमांचक दृश्य,आंखें पलक झपकती नहीं ओर झपका भी नहीं सकते। परंतू जैसे जैसे आगे बड़े मालूम हुआ की गूगल पर हमने जो रास्ते देखे वह तो,यहां के गांव वालो को भी नहीं पता है। अतः लम्बे रास्ते से होते हुए,हम यमुनोत्री के बेसकैंप,बरकोट पंहुच गए। आज का रात्रि विश्राम यही पर है।