आर्टिकल

भारत और चीन का खूनी संघर्ष- इतिहास के झरोखे से आज तक

एन के त्रिपाठी

20अक्टूबर, 1962 को 8 बजे सुबह आकाशवाणी रेडियो से देवकी नंदन पाण्डेय की गंभीर आवाज़ में मैंने सुना,’ चीन ने भारत पर हमला कर दिया है।’ उस समय मैं आठवीं कक्षा का छात्र था और रेडियो पर समाचार मेरे पिताजी सुना करते थे। युद्ध प्रारंभ होते ही मेरे स्कूल और मेरे तत्कालीन शहर बनारस में देश के प्रति समर्पण की एक भावना मैंने देखी। हमें बताया गया कि हर भारतीय सैनिक दस चीनी सैनिकों को मार रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए पैसा एकत्र करने के लिए अभिनेत्री नरगिस का प्रोग्राम बनारस में हुआ जिसमें उनके द्वारा फैलाये गये शॉल में मैंने अपनी अंगूठी डाल दी थी।

1962 के युद्ध में भारत को करारी हार का सामना और अपमान का घूँट पीना पड़ा था। एक बार फिर सीमा पर अत्यधिक गंभीर स्थिति उत्पन्न होने के कारण इस विवाद की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।

चीन भारत का युद्ध स्पष्ट सीमाओं के चिन्हांकन के न होने का परिणाम है। यह समस्या अंग्रेज़ हमें विरासत में दे गए थे। वर्तमान स्थिति को देखते हुए मैं केवल लद्दाख क्षेत्र की बात करूँगा क्योंकि पूर्वोत्तर अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में स्थिति फ़िलहाल शांत है। लद्दाख के आक्साईचिन क्षेत्र के नक़्शे पर ध्यान दीजिए। इसमें जॉनसन डॉटेड लाइन सबसे पूरब में है तथा सबसे बड़ा क्षेत्र भारत का बनाती है। यह लाइन कुनलुन पर्वत को छूते हुए बनायी गई थी और आज भी भारत के नक़्शे में हम इसी को देखते हैं। 1925 में चीन की सरकार ने इस लाइन को मान भी लिया था। रूस के प्रभाव से दूर रहने के लिए ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने भारत (अर्थात् जम्मू कश्मीर रियासत) का क्षेत्र अनेक बार छोटा कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से कुल मिलाकर 11 बार सीमारेखा बदली गई। प्रमुख लाइने अलग अलग रंग में इस नक्शे में दिखाई गई है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद इस क्षेत्र से होकर पीली लाइन पर एक सड़क चीन ने तिब्बत और ज़िंगजियांग को जोड़ते हुए बना दी। 1957 में इसका पता चलने पर भारत की ओर से इस क्षेत्र में कमज़ोर होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1959 में चीन ने हरे रंग की मैकार्टनी मैक्डॉनल्ड लाइन को अपनी तरफ़ से स्वीकार कर लिया। 1960 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने एक नई सीमा स्वीकार करने का प्रस्ताव नेहरू के सामने रखा जिसे नेहरू ने अस्वीकार कर दिया और कहा कि हम चीन को पूरे आक्साइचिन से बाहर निकाल कर जॉनसन लाइन तक का भारतीय क्षेत्र ख़ाली करा लेंगे।

नेहरू ने चीन के सभी दावों को ख़ारिज तो कर दिया लेकिन नेहरू में सैन्य संगठन करने की कोई क्षमता नहीं थी। उन्होंने एक ऐसा रक्षा मंत्री बना रखा था जो घोर वामपंथी था और चीन को प्रेम करता था। उसने भारतीय जनरलों और सेना की बेहद उपेक्षा की। चीन की अर्थव्यवस्था हम से कमज़ोर थी परन्तु उसकी सैन्य शक्ति अधिक संगठित थी। चीन को विश्वास था कि भारत उसके प्रस्ताव को मान जाएगा और युद्ध करने की उसकी कोई मंशा नहीं थी। भारत का भी आंकलन था कि चीन किसी भी स्थिति में हमला नहीं कर सकता है। नेहरू ने फॉरवर्ड पॉलिसी लागू की जिसके अंतर्गत पूर्व में मैकमोहन लाइन के उस पार तथा लद्दाख में चीन के दावे के क्षेत्र में जाकर अनेक बॉर्डर पोस्ट बनायी गई। ये बिखरी हुई बॉर्डर पोस्ट बिना किसी मिलिट्री सपोर्ट के थीं और इन्होंने केवल चीन को उत्तेजित करने का काम किया। दलाई लामा को शरण देना भी चीन को पसंद नहीं आया। सीमा पर लगातार छिटपुट झड़पे भी होती रहीं। अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में हुई झड़पों से चीन ने अचानक भारत पर हमला करने का निर्णय ले लिया।
19 और 20 अक्टूबर, 1962 की रात्रि को चीन ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश दोनों पर एक साथ हमला करदिया। लद्दाख के अक्साईचिन क्षेत्र का बड़ा भूभाग चीन के पास पहले से ही क़ब्ज़े में था और 20 तारीख़ को ही उसने चिप चेप क्षेत्र,गलवान घाटी और पेंगोंग झील को क़ब्ज़े में ले लिया। 22 अक्टूबर तक चुशूल के उत्तर का पूरा इलाक़ा चीन के क़ब्ज़े में आ गया। 24 अक्टूबर को चीन ने युद्ध रोक दिया। इसके बाद कूटनीतिक स्तर पर बातचीत चलती रही और चीन ने एक बार फिर नेहरू के सामने उसके द्वारा बतायी गई सीमा को मान लेने का प्रस्ताव रखा। नेहरू ने फिर वो प्रस्ताव अस्वीकृत कर भारतीय क्षेत्र को ख़ाली कर देने का अपना प्रस्ताव रखा। इसके फलस्वरूप चीन ने नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को दुबारा हमला कर दिया। 18 नवंबर को चुशुल के रिज़ांग ला पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह क्षेत्र मेजर शैतान सिंह के अदम्य पराक्रम का था जिसमें उनके साथ पूरी प्लाटून ने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। 19 नवंबर को चीन ने फिर एक तरफ़ा युद्धविराम घोषित कर दिया।

चीन ने युद्ध के बाद अरुणाचल प्रदेश का पूरा क्षेत्र ख़ाली कर दिया और पुरानी सीमाओं पर चला गया। परन्तु लद्दाख में वह उन स्थानों पर बैठा रहा जहाँ तक वह पहुँच गया था। वह रेखा LAC के नाम से जानी जाती है। इस युद्ध के बाद केवल 1967 और 1975 में दोनों देशों के बीच में भारी गोलाबारी हुई, परंतु उसके बाद से आज तक कभी गोलीबारी नहीं हुई। आपसी समझौते के तहत दोनों देश बिना हथियार के पेट्रोलिंग करते हैं।

वर्तमान में चीन पूरे विश्व को चुनौती देने की मुद्रा में आ गया है और लद्दाख के साथ साथ हांगकांग, ताइवान, साउथ चाइना सी में आक्रामक रुख़ अपनाए हुए है।भारत को विश्व मंच पर अपनी नीति पर चलने से हतोत्साहित करना चीन का मुख्य उद्देश्य है।इसके साथ उसने वर्तमान अतिक्रमण में सामरिक महत्व के कुछ क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा भी कर लिया है। सेना वापसी के निर्णय के बाद पीछे हटने की कार्रवाई करने के स्थान पर चीन ने जिस बर्बरता के साथ भारतीय सेना के 20 लोगों की हत्या की है वह अक्षम्य है। यद्यपि चीन के पास अक्साई चिन का 37,244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पहले से क़ब्ज़े में है लेकिन अभी क़ब्ज़ा किया गया केवल लगभग 30 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र का अपना अलग महत्व है।

भारत के पास गलवान और पेंगोंग क्षेत्र के वर्तमान अतिक्रमण को ख़ाली कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इसे ख़ाली कराने के लिए भारत को राजनयिक स्तर पर कोई भी प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए। भारत को विश्व जनमत का दबाव भी चीन पर डलवाना चाहिए।हालाँकि इस समय अमेरिका को छोड़कर अधिकांश देश चीन से भयाक्रान्त है और उनके खुल कर भारत के साथ आने की संभावना बहुत कम है। इन कूटनीतिक प्रयासों में भारत को दो टूक शब्दों में चीन को यह संदेश देना चाहिए कि भारत इस क्षेत्र को ख़ाली कराने के लिए शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है। सेना को सभी प्रकार की रणनीति के लिए तैयार रहना चाहिए। सेना को LAC के उस पार जाकर अपने सामरिक महत्व के कुछ अन्य स्थानों पर क़ब्ज़ा कर लेने की योजना पर काम करना चाहिए जिससे समझौते की मेज़ पर भारत को ताक़त मिल सके।

पिछले सात दशकों से भारत की सभी सरकारें चीन के सामने घुटने टेकती आईं हैं। अब समय आ गया है कि भारत अपने साहस और पराक्रम का प्रदर्शन करे। मोदी को इस साहस का परिचय ठंडे मस्तिष्क से देना है और दुनिया को बता देना है कि यह 2020 का भारत है 1962 वाला नहीं।

भारत के पास गलवान और पेंगोंग क्षेत्र के वर्तमान अतिक्रमण को ख़ाली कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इसे ख़ाली कराने के लिए भारत को राजनयिक स्तर पर कोई भी प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए। भारत को विश्व जनमत का दबाव भी चीन पर डलवाना चाहिए।हालाँकि इस समय अमेरिका को छोड़कर अधिकांश देश चीन से भयाक्रान्त है और उनके खुल कर भारत के साथ आने की संभावना बहुत कम है। इन कूटनीतिक प्रयासों में भारत को दो टूक शब्दों में चीन को यह संदेश देना चाहिए कि भारत इस क्षेत्र को ख़ाली कराने के लिए शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है। सेना को सभी प्रकार की रणनीति के लिए तैयार रहना चाहिए। सेना को LAC के उस पार जाकर अपने सामरिक महत्व के कुछ अन्य स्थानों पर क़ब्ज़ा कर लेने की योजना पर काम करना चाहिए जिससे समझौते की मेज़ पर भारत को ताक़त मिल सके।

पिछले सात दशकों से भारत की सभी सरकारें चीन के सामने घुटने टेकती आईं हैं। अब समय आ गया है कि भारत अपने साहस और पराक्रम का प्रदर्शन करे। मोदी को इस साहस का परिचय ठंडे मस्तिष्क से देना है और दुनिया को बता देना है कि यह 2020 का भारत है 1962 वाला नहीं।