लीची-अमरूद की ‘दहशत’ और रोगों के प्रति लापरवाह फितरत…

0
36

अजय बोकिल

देश में इन ‘फलवाहक बीमारियों’ और उनसे होने वाली मौतों को देखकर लगता है कि हमे अब ‘फलने-फूलने’ जैसे मुहावरों का भी रिव्यू करना पड़ेगा। क्योंकि अब रसीले फल भी जानलेवा रोगों के वाहक बनने लगे हैं। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर इसकी सौ फीसदी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन लीची और अमरूद जैसे मौसमी स्वादिष्ट फलों को भी लोग संदेह की नजर से देखने लगे हैं। मामला एक दूसरे से करीब पौने तीन हजार किलोमीटर दूर बसे दो जिलों बिहार के मुजफ्फरपुर और केरल के एर्नाकुलम से जुड़ा है।

मुजफ्फरपुर में बीते एक पखवाड़े में ‘चमकी बुखार’ से करीब 47 लोग दम तोड़ चुके हैं तो एर्नाकुलम में फल चमगादड़ के जरिए फैलने वाले जानलेवा निपाह वायरस से पीडि़त इस साल का पहला मरीज अस्पताल में भर्ती हुआ है। पिछले राज्य में इसी निपाह वायरस के प्रकोप से 12 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थीं। इन जानलेवा बीमारियों के फैलने से देश में चिंता तो है, लेकिन वैसी नहीं है, जो किसी जानबूझकर उछाले गए राजनीतिक मुद्दे को लेकर रहती है। बिहार में चमकी बुखार से मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ रह रही है, लेकिन इसका कोई निश्चित इलाज भी सामने नहीं आया है। डाॅक्टरों का मानना है कि यह जिले में भारी मात्रा में होने वाले लीची फल के कारण है।

कहा जा रहा है कि अधपकी लीची को खाना जानलेवा साबित हो रहा है। ध्यान रहे कि लीची जैसा रसीला, मीठा और सुगंधित फल बारिश की बौछारों के पहले हमारे यहां दस्तक देता है और सावन के बाद तक ललचाता रहता है। लेकिन इसके रसभरे गूदे में एनसिफेलाइटिस ( मस्तिष्क ज्वर) जैसे कीटाणु भी पलते हैं, यह कम ही लोगों को मालूम होगा। चमकी बुखार के संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बिहार में बच्चों की मौत एक ऐसे जहरीले पदार्थ की वजह से हुई है, जो लीची में पाया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक मरने वाले सभी बच्चों में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम ( एईएस) के लगभग एक समान लक्षण पाए गए हैं। इस तरह असमय दम तोड़ते मासूमों की मांओं की चीत्कार दिल दहला देती है।

दरअसल मुजफ्फरपुर अपनी ‘शाही लीची’ के लिए मशहूर है। पूरा बिहार देश की कुल लीची उत्पादन का 40 फीसदी पैदा करता है। स्वादिष्ट लीची उत्पादन में हम विश्व में नंबर दो पर हैं। मुजफ्फारपुर में लोगों की आजीविका एक बड़ा साधन लीची अब मौत के परवाने में तब्दील होने लगी है। हालांकि चमकी बुखार की जड़ पूरी तरह रसवंती लीची ही है, यह अभी साफ नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल एर्नाकुलम में अमरूद का है।

फल चमगादड़ इन्हें खाकर जानलेवा निपाह वायरस फैला रहे हैं। निपाह की आमद तो फिर भी हमारे देश में नई है, लेकिन चमकी बुखार तो बीते 24 सालों से अपनी प्राणघातक ‘चमक’ दिखा रहा है। जिस बिहार में आरक्षण हटाने जैसे सतही बयान पर भी आग लग जाती हो, उसी बिहार के मुजफ्फरपुर में पांच साल पहले चमकी बुखार से 150 लोग प्रभावित हुए तो भी कोई खास हलचल नहीं हुई। अभी भी नीतीश सरकार ‘ ऐसा तो होता ही रहता है’ की मानसिकता से काम कर रही है। कहने को आईसीएमआर की टीम अब मुजफ्फरपुर कारणों की तलाश में पहुंची है। रिपोर्ट कब तक आएगी, पता नहीं। तब कितने मासूम इलाज के अभाव में चल बसे होंगे, कोई नहीं जानता। लेकिन चमकी बुखार मुजफ्फरपुर में राजनीति का स्थानीय मुद्दा जरूर बन गया है। सरकार का दावा है कि उसकी चिकित्सा व्यवस्थाएं चौकस हैं। इस सम्बन्ध में एडवायजरी भी जारी की गई है। अलबत्ता केरल के एर्नाकुलम में निपाह वायरस को लेकर जागरूकता ज्यादा है

यहां मुद्दा यह है कि ऐसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप भी हमारे यहां गंभीर चिंता का विषय क्यों नहीं बन पाते? दिमागी या चमकी बुखार से होने वाली मौतें हमे बहुत ज्यादा विचलित नहीं करती। क्योंकि इसका शिकार ज्यादातर समाज के उस तबके के लोग हैं, जहां जीने और मरने के बीच एक लीची भर का फासला है। वो सेह‍‍त के लिए भी फल खाएं तो उन्हें मौत मिलती है। इनमें भी मरने वालों में ज्यादा बच्चे और बच्चों में भी बेटियों की अधिकता है। ये वो लोग हैं जो पेटभर भोजन के अभाव में कच्ची लीची खाकर अपनी मौत को सींचने लगते हैं। चमकी बुखार और निपाह वायरस जैसी बीमारियों के कारण और इलाज पर गहरे और त्वरित शोध की जरूरत है, लेकिन इस देश में बीमारियों से मौतें भी मौसमी राजनीति का शर्तियां नुस्खा बन जाती हैं। बात यहां आकर टिकती है कि किसके राज में कितने मरे। जिस के राज में कम मरे, वह सरकार उतनी ही जन हितैषी.

हालांकि फलों से फैलने वाले इन रोगों की वजह से एक फल विरोधी और दहशत भरा परसेप्शन भी बन रहा है कि न जाने कौन से फल में किस रोग का बीज पल रहा हो। इसलिए फल खाने से बचा जाए। लेकिन यह सोच ज्यादा खतरनाक और नकारात्मक इसलिए है कि कुछ फल रोगवाहक हो सकते हैं, लेकिन फलों की सारी जमात ही बीमारियों की जड़ है, मान लेना गलत होगा। फल अपने आप में ही एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया का मीठा और सकारात्मक परिणाम होते हैं। हिंदी मुहावरे में भले फलना, फूलने के पहले आता हो, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से फलना, फूलने की ही अंतिम कड़ी है।

वह अमूमन ‘सुफल’ के भाव में ही आता है। फल अपने साथ विटामिनों का खजाना समेटे होते हैं। इसीलिए बूढ़ी दादी के आशीर्वाद में नव ब्याहता के लिए ‘सदा फलो फूलो’ की मंगल कामना बरसती है। उसे शायद ही किसी ने चमकी बुखार अथवा निपाह विषाणु के संदर्भ में बूझा होगा अथवा कोई ऐसा करना चाहेगा। अफसोस केवल इस बात का है कि रोग और चिकित्साशास्त्र की दुनिया में वो फल भी अब ‘डिसीज कॅरियर’ बनते जा रहे हैं, जिन फलों की रेंज ‘पुण्य फल’ से लेकर ‘निष्फलता’ तक है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here